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16 साल की रोहिणी, जिसने महाराष्ट्र के एक गांव की सूरत बदल दी

रोहिणी ने न स्वच्छता के लिए आवाज उठाई बल्कि पूरे गांव को भी जगाया.

Deeksha Upadhyay Updated On: Feb 19, 2017 03:54 PM IST

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16 साल की रोहिणी, जिसने महाराष्ट्र के एक गांव की सूरत बदल दी

लड़कियां चाहे मेट्रो शहरों की हों या फिर कस्बों या गांवों की, जिंदगी उनके लिए लड़कों की तरह आसान नहीं होती है. खास तौर पर तब, जब उनके शरीर में बदलाव शुरू होते हैं.

ये उम्र टीनएज की होती है. अमूमन लड़कियां इस उम्र में घर से बाहर निकलना शुरू करती हैं. घर के बाहर उनको कुछ और ज्यादा घूरा जाने लगता है और घर के अंदर उन पर ज्यादा रोक-टोक होने लगती है.

पीरियड्स की मुश्किलों ने किया मजबूर

मुंबई के पास करजत के नंदगांव की रोहिणी जब 16 साल की हुई तो उसकी जिंदगी भी उन तमाम परेशानियों से दो-चार हुई, जो हर लड़की को झेलनी पड़ती है.

उसके घर में शौचालय नहीं था. उसके घर में क्या पूरे गांव में शौचालय नहीं था. उसको पीरियड्स आना शुरू हुए तो ये दिन उसके लिए और भी ज्यादा कठिन हो गए.

ये कोई अनोखी बात नहीं थी और इस गांव की हर लड़की और औरत इस कष्ट को झेलती थी. पर जो बात रोहिणी को अनोखा बनाती है वो ये कि उसने इस समस्या के खिलाफ आवाज उठाई. अपने पिता और पूरे गांव की औरतों के गुस्से को झेलने के बाद भी.

बड़े लोगों के घरों में था टॉयलेट

रोहिणी जब 16 की हुई तो उसकी मां-दादी ने भी उसे सिखाया कि उन दिनों में दिक्कत चाहे जितनी हो लड़की दिन में शौच के लिए नहीं जा सकतीं और घर में शौचालय केवल बड़े लोगों के घरों में होता है.

इसका मतलब था कि रोहिणी केवल अंधेरे में ही शौचालय जा सकती थी. दूसरी महिलाओं के साथ सुबह छह बजे के पहले या शाम सात के बाद अंधेरे में. रोहिणी को अपने घर और गांव की दूसरी महिलाओं की तरह सुबह 5 बजे उठकर शौच जाना नामंजूर था.

अपनी शुरुआती मुश्किलों के बारे में रोहिणी झिझकते हुए फ़र्स्टपोस्ट को बताती है कि उनकी मां भी दूसरी मांओं की तरह डरती थीं. दिन में बाहर शौच के लिए जाने का मतलब बाहर पुरुषों के देख लेने का खतरा था.

जब रोहिणी ने बहुत जिद की तो उसकी मां ने उसके पिता को घर में शौचालय बनवाने के लिए बोला. पिता को रोहिणी के मांग में कोई तुक नजर नहीं आया. उन्होंने कहा कि दूसरी महिलाओं की तरह उसे भी काम चलाना चाहिए.

लेकिन दब्बू सी दिखने वाली रोहिणी दबी नहीं, रुकी नहीं, पिता से हारने के बाद उसने अपने दादा जी से मदद मांगी. दादा जी भी पहले उसकी बात सुनकर चुप रह गए और उन्होंने ने भी उसे पिता वाली सलाह ही दी. लेकिन रोहिणी अड़ी रही.

आखिर सबको झुकना ही पड़ा

आखिरकार दादा जी, जो किसी जमाने में गांव के सरपंच रह चुके थे, उसे लेकर सरपंच के पास गए. सरपंच के लिए भी ये एक नई समस्या थी. लेकिन रेडियो-टीवी पर चल रहे विज्ञापनों के चलते उन्होंने हिम्मत जुटाई और कुछ एनजीओ के पास जा पहुंचे.

इस बीच रोहिणी की पहल ने दूसरी लड़कियों को भी आवाज उठाने की हिम्मत दी. देखते ही देखते इस सदियों पुरानी समस्या जिससे कि गांव का हर पुरुष अनजान था और हर आदमी पीड़ित, वो पूरे गांव की समस्या बन गई.

रोहिणी की इस पहल पर हैबिटैट इंडिया का कहना है कि बच्चों के प्रयास से बड़ों को बदलना आसान और प्रभावशाली होता है. रोहिणी इस बदलाव का सटीक उदाहरण हैं, जिसने न स्वच्छता के लिए आवाज उठाई बल्कि पूरे गांव को भी जगाया.

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