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जब उन्होंने पूछा– सचिन तेंदुलकर... ये कौन है?

प्रसिद्ध गायिका रेशमा कहती थीं कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान मेरी दो आंखें हैं.

Shailesh Chaturvedi Updated On: May 28, 2017 05:02 PM IST

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जब उन्होंने पूछा– सचिन तेंदुलकर... ये कौन है?

साल 2004 की बात है. भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान के दौरे पर गई थी, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का संदेश लेकर कि खेल ही नहीं, दिल भी जीतिए. उस दौरे पर एक रिपोर्टर को अचानक अपना टिकट बदलवाने लाहौर एयरपोर्ट जाना पड़ा.

एयरपोर्ट पर जब इंडियन एयरलाइंस के ऑफिस में रिपोर्टर दिनेश चोपड़ा गए, तो उन्हें एक जाना-पहचाना सा चेहरा दिखा. वो रेशमा थीं. वही रेशमा, जिन्हें भारत में लंबी जुदाई  गाने के लिए जाना जाता है.

जाहिर है, रेशमा सामने हों, तो कोई कैसे इंटरव्यू का मौका छोड़ सकता है. वो इंटरव्यू हुआ. क्रिकेट की बात थी, तो सवाल क्रिकेट पर भी था. सचिन तेंदुलकर पर भी. उसमें रेशमा ने अपने सीधे-सादे अंदाज में रिपोर्टर से ही पूछ लिया कि कौन है सचिन तेंदुलकर, मैं उसको नहीं जानती. मैं तो सिर्फ एक क्रिकेटर को जानती हूं– इमरान खान.

कुछ समय पहले मारिया शारापोवा ने कहा था कि सचिन तेंदुलकर को नहीं जानतीं. इस पर भारत में तमाम सचिन प्रेमियों ने खासा बवाल किया था.

फिर भी उन्हें दिल से पता था कि ऐसे मुल्क में जहां क्रिकेट नहीं खेला जाता, वहां सचिन को न जानने वालों का होना बड़ी बात नहीं है. लेकिन हिंदुस्तान में जन्मा कोई शख्स अगर यह बात कहे तो... उस पर कोई बवाल नहीं हुआ क्योंकि वो सोशल मीडिया का दौर नहीं था.

लेकिन उस एक सवाल में रेशमा की शख्सियत उभर कर आती है. सीधी-सादी महिला, जो हो मुंह पर बोल देना. जिंदगी को संगीत के नाम कर देने वाली गायिका, जिसे बाहरी दुनिया की तमाम चीजों के बारे में कुछ नहीं पता था.

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भारत की आजादी से चंद महीने पहले हुआ था जन्म

रेशमा की जन्मतिथि क्या थी, इसका उन्हें भी नहीं पता था. जन्मवर्ष जरूर 1947 कहा जाता है, लेकिन पूरे विश्वास के साथ नहीं. इतना तय है कि जन्म गुलाम भारत में हुआ. राजस्थान में जन्मी थीं. गांव था लोहा, जो चुरू के नजदीक रतनगढ़ तहसील में है.

जिन्हें चुरू नहीं पता है, उनकी जानकारी के लिए यह जगह जयपुर से करीब 200 और बीकानेर से करीब 180 किलोमीटर दूर है. एक कहानी के मुताबिक वो नोमाड राजपूत थीं. लेकिन एक और जानकारी के मुताबिक उनके पिता का नाम हाजी मुहम्मद मुश्ताक था. हाजी साहब घोड़े और ऊंटों का व्यापार करते थे.

इससे यह लगता है कि रेशमा जी से कुछ पीढ़ी पहले परिवार ने इस्लाम अपना लिया था. दरअसल, बंजारों का परिवार था, जो बीकानेर से ऊंट लेकर पाकिस्तान जाते थे बेचने के लिए. रास्ते में टेंट लगाकर सो जाते थे. लोकगीतों का दौर चलता था.

पाकिस्तान से घोड़े लाते थे, जो भारत में बेचते थे. इस कारोबार के बीच भारत आजाद हुआ, तो वो पाकिस्तान चली गईं. बल्कि कहा जाता है कि पूरा कुनबा या कबीला या दल पाकिस्तान चला गया. लोक संगीत से उनका ताल्लुक रहा. वो सितारा ए इम्तियाज़ बनीं.

रेशमा जी विभाजन के बाद कराची चली गई थीं. जाहिर है, वो तो चंद महीने की ही थीं, तो परिवार उन्हें कराची ले गया था. रेशमा जी स्कूल नहीं गईं. ज्यादातर समय वो मजार पर गाती थीं.

मजार पर गाने से शुरू हुआ था करियर

रेशमा को शाहबाज कलंदर की मजार पर गाते हुए पाकिस्तान टीवी और रेडियो प्रोड्यूसर सलीम गिलानी ने सुना. उन्होंने रेडियो पाकिस्तान के लिए लाल मेरी... रिकॉर्ड करवाया. इसके बाद तो रेशमा जी की डिमांड बढ़ती गई.

अब एक दिलचस्प कहानी. दरअसल वो गायिका हेमलता की रिश्तेदार थीं. हेमलता जी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पिता बाया बुआ से यानी अपनी बहन से मिलना चाहते थे, जो पाकिस्तान में रहती थीं.

पिता की मौत हो गई. ख्वाहिश अधूरी रह गई. हेमलता जी चाहती थीं कि पिता की ख्वाहिश बुआ को बताएं. 1994 में वो पाकिस्तान गईं. उन्होंने रेशमा जी के साथ शो किया. उन्होंने रेशमा जी से इसका जिक्र किया. पता चला कि उनकी बुआ तो रेशमा जी की रिश्तेदार हैं.

रेशमा जी ने उनकी बुआ को डेरा इस्माइल खां से बुलवाया. हेमलता जी की बुआ के बेटे की शादी रेशमा जी की बहन से हुई थी. यानी हिंदुस्तान के साथ रिश्ता जन्म के बाद और भी वजहों से बना रहा.

वेजीटेरियन रेशमा के खास नामों वाले बर्तनों की कहानी

पाकिस्तान गए लोग इस बात को मानेंगे कि वेजीटेरियन खाना मिलना वहां आसान नहीं होता. लेकिन रेशमा जी हमेशा वेजीटेरियन रहीं. उन्हें सरसों का साग और मक्का, बाजरा या मिस्सी रोटी बहुत पसंद थी.

उनके पास कुछ बरतन थे. उनके नाम उन्होंने रखे थे अल्लाह रखी, अल्लाह माफी और अल्लाह शफी. लाहौर के उनके घर में किसी को भी इन बरतनों को हाथ लगाने की इजाजत नहीं थी. उनके दोनों बेटों, बहुओं और पोते-पोतियों को भी नहीं. वजह थी कि इसमें सिर्फ वेजीटेरियन खाना पकता था और खाया जाता था.

रेशमा का सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल था.

उनके सेंस ऑफ ह्यूमर की बड़ी कहानियां हैं. एक बार विजयपत सिंघानिया को उन्होंने कह दिया था कि ये मेरे हीरो हैं, मैं इनकी हीरोइन. इस पर सिंघानिया साहब ने शर्म से गर्दन झुका ली थी.

अपनी आवाज के लिए कहा करती थीं कि मेरी तो आवाज बुलडोजर जैसी है, उसके बावजूद आपको पसंद आ जाती है. उन्हें भारत में बनने वाला नींबू का मीठा अचार बहुत पसंद था.

उनसे पूछा गया कि गायकों को तो अचार खाने से मना किया जाता है. उनका जवाब था- वो पतली आवाज वाले गायक होते हैं. मेरी आवाज तो पहले ही भारी है. खराब होगी, तो और बुलंद हो जाएगी.

मैं अचार तो नहीं छोड़ सकती. सादगी का आलम ये कि एक टीवी इंटरव्यू के लिए कुर्ते में माइक लगाते हुए उन्होंने रिपोर्टर से पूछ लिया था कि इससे मुझे करंट तो नहीं लगेगा.

राज कपूर ने उनके गाने को लता जी की आवाज में गवाया

भारत में ही एक इवेंट था, जिसमें राज कपूर ने रेशमा जी को गाते सुना था. राज कपूर ने उनका गाया गाना फिल्म बॉबी में इस्तेमाल किया, जो फिल्म में लता मंगेशकर की आवाज में था– अंखियों को रहने दे...

भारत को हमेशा अपना दूसरा घर मानती रहीं. हमेशा वो कहती थीं कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान मेरी दो आंखें हैं. उनके लिए दोनों मुल्कों में कोई फर्क नहीं है. हिंदुस्तान की तमाम यादें उनके साथ थीं. वो भारत आईं, तो राजस्थान गईं अपना घर देखने.

बंबई (अब मुंबई) में आईं, तो दिलीप कुमार की मेहमान बनकर उनके घर में रुकीं. तभी सुभाष घई ने उन्हें एक गाने के लिए मनाया था. लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत था.

सुभाष घई ने एक इंटरव्यू में कहा है कि रेशमा जी से ज्यादा ईमानदार इंसान ढूंढना मुश्किल है. उनमें किसी तरह का लगावट नहीं थी. बातचीत में गालियों की भरमार होती थी. हां, उन्हें बीयर पीना बहुत पसंद था.

रेशमा जी को गले का कैंसर हो गया था. सेहत बिगड़ती गई. पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने भी उनकी आर्थिक मदद की. लाहौर के अस्पताल में भर्ती थीं, काफी कमजोर हो गई थीं.

कोई उनसे कहता कि बड़ी कमजोर हो गई हो, तो जवाब देती थीं, अब मैं स्लिम और स्मार्ट हो गई हूं. ये भी उनकी जिंदादिली को ही दिखाता है. रेशमा जी अक्टूबर 2013 में कोमा में चली गईं और 3 नवंबर को उनका निधन हो गया.

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