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लीला सैमसन: आज के समय नृत्‍य चुनौती भरा काम

भरतनाट्यम नृत्‍यांगना लीला सैमसन पद्मश्री से सम्‍मानित एक जानी-मानी हस्‍ती हैं...

Deepa Gupta | Published On: Nov 17, 2016 07:15 AM IST | Updated On: Nov 18, 2016 04:19 PM IST

लीला सैमसन: आज के समय नृत्‍य चुनौती भरा काम

भरतनाट्यम नृत्‍यांगना लीला सैमसन पद्मश्री से सम्‍मानित एक जानी-मानी हस्‍ती हैं।

कलाक्षेत्र से प्रशिक्षित लीला मुंबई में 20 से 23 अक्‍टूबर के बीच आयोजित हो रहे नेशनल सेंटर ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स (एनसीपीए) के आठवें नक्षत्र नृत्‍य महोत्‍सव में हिस्‍सा लेने के लिए पहुंची थीं. यहां उन्होंने अपने समूह स्‍पंद के साथ प्रस्तुति दी और एक कार्यशाला का आयोजन भी किया.

फर्स्‍टपोस्‍ट को दिए एक साक्षात्‍कार में सैमसन ने अपने समूह स्‍पंद के बारे में बात की, बताया कि समय के साथ कलाओं को क्‍यों विकसित होते रहना चाहिए और मणि रत्‍नम की फिल्‍म ओके कदल कनमणि में काम करने के दौरान अपने अनुभव साझा किए.

नृत्‍यांगना, नृत्‍य निर्देशक, प्रशिक्षक, लेखक- यह पूछना बेमानी होगा कि कौन सी भूमिका में आपको सबसे ज्‍यादा संतोष मिलता है. इन तमाम क्षेत्रों में अपनी आकांक्षा के अनुरूप उपलब्धियां हासिल कर लेने के बाद क्‍या और कुछ बचा है जिसे आप पूरा करने की ख्‍वाहिश रखती हैं?

इन सभी भूमिकाओं में करने को काफी काम बचा है- विशेष तौर पर एक नृत्‍यांगना के रूप में. मुझे लगता है कि ये सारे क्षेत्र में आपस में जुड़े हुए हैं. शिक्षक बनना नृत्‍यांगना होने का ही स्‍वाभाविक नतीजा है. जब आप युवाओं को नृत्‍य करता देखते हैं, तब आपको लगता है कि उनकी रुचि को जि़ंदा रखने और दर्शकों को आकर्षित करते रहने के लिए अच्‍छे नृत्‍य निर्देशन की ज़रूरत है. इसके अलावा शैली की समूची संभावना की भी तलाश की जानी होती है. नृत्‍य निर्देशन उत्‍साहजनक है. नृत्‍य हमेशा से, खासकर आज, एक चुनौती है. जब आप युवा होते हैं तो आपके भीतर ज्‍यादा ऊर्जा और संभावना होती है, लेकिन समझ की परिपक्‍वता नहीं होती. उम्र बढ़ने के साथ परिपक्‍वता तो आती है, लेकिन ऊर्जा नहीं रह जाती.

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एक साक्षात्‍कार में आपने कहा था कि आप सर्जन बनना चाहती थीं. क्‍या अब भी कभी-कभार लगता है कि ऐसा हो सकता था? या ऐसा कि अगर आपने वह राह चुनी होती, तब भी आप नृत्‍यांगना बनी रह सकती थीं?

मैंने बेशक किसी न किसी क्षेत्र में ज़रूर हाथ आजमाया होता- मैं सर्जन हो सकती थी, एक किसान भी हो सकती थी. अपने हाथों का इस्‍तेमाल लोगों के इलाज के लिए करना अच्‍छा अहसास होता. मुझे लगता है कि मुझ में उतनी मेधा नहीं थी. इतना तय है कि अगर मैं सर्जन बन जाती, तो नृत्‍य नहीं कर पाती. दोनों ही काम आपकी पूरी ऊर्जा और समय की मांग करते हैं. दोनों विशेषज्ञता वाले क्षेत्र हैं और खुद को उसमें समर्पित करना होता है.

एक कलाकार के बतौर आप परंपरागत कलाओं के प्रति पश्चिम और भारत के दर्शकों की प्रतिक्रिया में कैसा फर्क पाती हैं?

दुनिया भर में लोग एक जैसे ही होते हैं. कुछ जागरूक होते हैं, कुछ दूसरों के मुकाबले ज्‍यादा संजीदा होते हैं और कुछ केवल आलोचना करते हैं. यह इस पर निर्भर करता है कि दर्शकों की अपसे उम्‍मीद क्‍या है. कुछ को मनोरंजन की आस होती है, कुछ चमक-दमक देखना चाहते हैं, कुछ दूसरे नाटकीयता और चरित्र-चित्रण में दिलचस्‍पी लेते हैं तो कुछ अन्‍य ऐसे होते हैं जो किसी भी प्रदर्शन में केवल अमूर्त्‍त की तलाश करते है. एक कलाकार सभी को खुश नहीं कर सकता. इस लिहाज से मैं कह सकती हूं कि दुनिया भर में कहीं भी दर्शक की सकारात्‍मक या नकारात्‍मक प्रतिक्रिया उसकी नजर का मामला होती है.

ओके कदल कनमणि में काम करने का अनुभव कैसा रहा?

इस फिल्‍म में काम करना शानदार अनुभव था. मणि रत्‍नम ने जिस सहजता से मुझसे काम कराया, वह मुझे पसंद आया. उन्‍होंने कभी भी इस बात का अहसास मुझे नहीं होने दिया कि मैं अभिनेता नहीं हूं. सिनेमटोग्राफर के बतौर पी सी श्रीराम और संगीतकार के बतौर ए आर रहमान शानदार थे. अलजाइमर से ग्रस्‍त एक महिला का किरदार निभाना मेरे ख्याल से उसके किरदार के प्रति संवेदनशील होने की मांग करता है और सूक्ष्‍म तरीके से उसे जाहिर करना होता है. किरदार की जटिलता के चलते यह भूमिका संक्षिप्‍त लेकिन प्रभावशाली रही और एक चुनौती की तरह थी. मुझे यह प्रक्रिया, उसमें शामिल लोग और वह दुनिया पसंद आई. इस फिल्‍म का हिंदी संस्‍करण ओके जानू भी तैयार है और मैं उसमें भी अपनी भूमिका से खुश हूं. उसका निर्देशन शाद अली ने किया है. इसमें नसीरुद्दीन शाह, श्रद्धा कपूर और आदित्‍य रॉय कपूर ने अभिनय किया है. धर्मा प्रोडक्‍शन के बैनर तले यह रिलीज़ होने को तैयार है.

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आपने कई एकल और समूह प्रस्‍तुतियों का नृत्‍य निर्देशन किया है. आपके दिल के करीब कौन सा काम है? और क्‍यों?

स्‍पंद में किए सारे एकल निर्देशन मेरे दिल के करीब हैं. लोगों की अपनी पसंद हो सकती है, लेकिन मुझे तो सब पसंद हैं. हर प्रस्‍तुति दूसरे से भिन्‍न है. मुझे पुराने काम भी उतने ही पसंद हैं जितने नए. हर काम में कुछ न कुछ शोध करना होता है और हरेक रचना अगले के लिए सबक का काम करती है.  

समय के साथ कलाओं को विकसित होते रहना चाहिए. स्‍पंद में आपने समकालीन और पारंपरिक नृत्‍यरूपों का सम्मिश्रण किया है. आने वाले वक्‍त में यह फ्यूज़न कितना अहम होगा?

मैं अपने काम को 'फ्यूज़न' कहना पसंद नहीं करूंगी, हालांकि इस शब्‍द का इस्‍तेमाल दिलचस्‍प है. भरतनाट्यम की शास्‍त्रीय शैली लगातार समकालीनता में ढलती जा रहा है. मेरे गुरु ने यह काम चालीस और पचास के दशक में किया था. मैं तमाम नर्तकों के किए काम को केवल आगे बढ़ा रही हूं. हमारी भाषा बदल रही है. हम एक ऐसी शब्‍दावली का प्रयोग कर रहे हैं जो युवाओं के ज्‍यादा समझ में आती हो. नृत्‍य का विकास ऐसे होना चाहिए जो युवाओं के साथ जुड़ सके. कहने को तो बहुत से युवा नृत्‍य कर रहे हैं. ऐसी कोई भी शैली नहीं है जो आपसे अनुशासन और प्रतिबद्धता की मांग न करती हो. यह बेहद ज़रूरी है क्‍योंकि इससे देह और दिमाग में ऊर्जा का संचार होता है. यह शरीर, मस्तिष्‍क और भावनाओं के बीच एक संतुलन और सद्भाव को पैदा करता है. नृत्‍य के माध्‍यम से यह संतुलन हासिल किया जा सकता है.

एनसीपीए के नक्षत्र नृत्‍य महोत्‍सव में स्‍पंद के साथ आपकी प्रस्‍तुति 'पास्‍ट फॉरवर्ड' रही. इस प्रस्‍तुति में क्‍या है?

'पास्‍ट फॉरवर्ड' आत्‍मा की आंतरिक यात्रा की एक प्रस्‍तुति है जिसे व्‍यक्ति व समूह की देह के माध्‍यम से दर्शाया गया है. इसमें अंतर की एक तलाश भी है. यह प्रकाश और सत्‍य की तलाश है जो हर मनुष्‍य का अंतिम लक्ष्‍य है.

चाहे अमूर्त्‍त हो या प्रतीकात्‍मक, पारंपरिक हो या समकालीन, स्‍पंद की हर प्रस्‍तुति ऐसे विषयों को चुनती है जिनकी अहमियत सार्वभौमिक हो और जिसमें भरतनाट्यम के व्‍याकरण को संजोये रखा जा सके.    

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