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इतिहास के पन्ने खोलता ‘लाहौर इन द टाइम ऑफ द राज’

इयान टैलब‌‍ॉट और ताहिर कामरान की नई किताब ‘लाहौर इन द टाइम ऑफ राज’ 28 दिसंबर को प्रकाशित हो रही है.

FP Staff | Published On: Dec 24, 2016 09:36 PM IST | Updated On: Dec 24, 2016 09:36 PM IST

इतिहास के पन्ने खोलता ‘लाहौर इन द टाइम ऑफ द राज’

इयान टैलब‌‍ॉट और ताहिर कामरान की नई किताब ‘लाहौर इन द टाइम ऑफ द राज’ 28 दिसंबर को पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया से प्रकाशित हो रही है. टैलब‌‍ॉट आधुनिक ब्रिटिश इतिहास के प्रोफेसर हैं और यूनिवर्सिटी ऑफ साउथम्प्टन के इतिहास विभाग के प्रमुख भी रह चुके हैं. कामरान भी लाहौर के जीसी यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ाते हैं.

यह किताब ब्रिटिश राज के दौरान इस शहर के बारे में कई जानकारी देती है. यह किताब इस शहर के अतीत के बारे में ब्रिटिशों द्वारा बनाए गई तस्वीर और ब्रिटिश शासन के दौरान इस शहर के ‘आधुनिकीकरण’, दोनों पर सवाल खड़ा करती है.

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लाहौर की पोस्टकार्ड तस्वीर (तस्वीर साभार : 'लाहौर इन द टाइम ऑफ द राज' किताब से)

मुगलों और अंग्रेजों के लिए खास था यह शहर 

लेखकों के मुताबिक ब्रिटिश राज के दौरान लाहौर एक खुशहाल और कॉस्मोपॉलिटन शहर था. यहां कई समुदाय के लोग एक साथ रहते थे. यह लोगों, सामानों और विचारों के आदान-प्रदान का मुख्य अड्डा था.

मुगल काल में यह शहर रणनीतिक तौर पर बहुत ही खास था. यह शहर काबुल, मुलतान, कश्मीर और दिल्ली को जोड़ता था. इस वजह से यह सत्ता का मुख्य केंद्र था. उस दौर में यहां शाही शासन से कवियों, कलाकारों और व्यापारियों को सरपरस्ती दी जाती थी.

लाहौर में जीपीओ, हाईकोर्ट और म्यूजियम ब्रिटिश राज के आर्किटेक्चर के मुख्य नमूने हैं. सांस्कृतिक और राजनीतिक सर्जनात्मकता के 1930 और 1940 के दौर में यहां कई बड़े लेखक और कलाकार रहते थे. एफसी कॉलेज और गवर्नमेंट कॉलेज सीखने और जानने के मुख्य अड्डे थे. लाहौर और उस समय उभरते हुए बॉलीवुड के बीच काफी आदान-प्रदान था. विभाजन की त्रासदी ने यह सब खत्म कर दिया.

ऐतिहासिक जानकारी ही नहीं ऐतिहासिक तस्वीर भी  

ऐतिहासिक जानकारियों के साथ-साथ इस किताब में पाठकों के लिए उस दौर की कई तस्वीरें भी दी गई हैं. इसमें से कुछ तस्वीरें यहां दी जा रही हैं:

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लाहौर में ट्रिब्यून का ऑफिस (तस्वीर साभार : 'लाहौर इन द टाइम ऑफ द राज' किताब से)

‘द ट्रिब्यून’ दैनिक अंग्रेजी अखबार की शुरुआत 1881 में लाहौर के एक बड़े व्यापारी, जमींदार और समाजसेवी दयाल सिंह मजीठिया ने की थी. यह किसी भी पंजाबी द्वारा शुरू किया गया पहला अंग्रेजी अखबार था. इस अखबार का ऑफिस मेयो अस्पताल से बिल्कुल सटा हुआ था.

बाद के ब्रिटिश राज के दौर में इसका व्यापक प्रसार पंजाब और उत्तर भारत में हुआ. इसकी मुख्य वजह था, इसके बंगाली मूल के संपादक कालीनाथ रे का निर्भीक लेखन. इस वजह से उन्हें मुश्किल हालात का भी सामना करना पड़ा. खासकर 1919 के मार्शल लॉ के समय. उन्होंने करीब 3 दशकों तक ‘द ट्रिब्यून’ से उत्सुक भारतीय पाठकों को बांधे रखा.

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वजीर खान मस्जिद (तस्वीर साभार : 'लाहौर इन द टाइम ऑफ द राज' किताब से)

बेहद खूबसूरत ‘वजीर खान मस्जिद’ को 1631 में पंजाब के तत्कालीन मुगल गवर्नर वजीर खान ने दिल्ली गेट के भीतर बनवाया था. उसका परिवार झांग जिले के चिनिओत से संबंधित था. जहां से वह मुगल प्रशासन के शीर्ष पद तक पहुंचा.

1920 के दशक के शुरुआत में भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल एच.ए. नेवेल ने लाहौर शहर के कई गाइडबुक छपवाए. उन्होंने वजीर खान की मस्जिद के बारे में लिखा ‘यह लाहौर की सबसे खूबसूरत इमारत है और यह सुंदर पच्चीकारी (मोजेक) का बेजोड़ नमूना है, जिसका पूरे भारत में कोई जोड़ नहीं.’

रेलवे का मुख्य केंद्र था लाहौर 

नार्थ-वेस्टर्न रेलवे का हेडक्वार्टर पहले लाहौर के मुख्य रेलवे स्टेशन में था. इस वजह से इंजनों, गाड़ियों और रेल डिब्बों की मरम्मत की जरूरत पड़ती थी. इसके लिए नौलखा में 126 एकड़ में पहला वर्क्स बनाया गया. यह पंजाब के 9 वोर्कशोपों में सबसे बड़ा था.

लाहौर का रेलवे हेडक्वार्टर

लाहौर का रेलवे हेडक्वार्टर (तस्वीर साभार : 'लाहौर इन द टाइम ऑफ द राज' किताब से)

1880 के दशक की शुरुआत में यहां करीब 2000 लोग काम करते थे. इनमें से अधिकतर मुगल दौर के कारीगर वर्ग के प्रवासी थे.

30 सालों के भीतर ही यहां इतना काम होने लगा कि इसे यहां से हटाकर शहर के पूर्वी कोने में मोगुलपुरा में 1000 एकड़ के क्षेत्र में स्थापित कर दिया गया. यहां 4500 कर्मचारी 4000 मील से अधिक के क्षेत्र पर अधिकार वाली नार्थ-वेस्टर्न रेलवे नेटवर्क के लिए मरम्मत और निर्माण का कार्य करते थे. प्रथम विश्व युद्ध के समय कर्मचारियों की यह संख्या 6,500 तक पहुंच गई.

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लाहौर रेलवे स्टेशन (तस्वीर साभार : 'लाहौर इन द टाइम ऑफ द राज' किताब से)

लाहौर रेलवे स्टेशन ब्रिटिश हितों की पूर्ति के लिए लाहौर में बनाया गया शुरुआती औपनिवेशिक संरचनाओं में से एक था. इसकी नींव पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सर जॉन लारेंस ने फरवरी 1859 में रखी थी. इसे बनाने में 3 साल और 5 लाख रुपए लगे.

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नेदोउस होटल (तस्वीर साभार : 'लाहौर इन द टाइम ऑफ द राज' किताब से)

स्विस द्वारा संचालित नेदोउस होटल के आगे का हिस्सा इंडो-अरबी शैली में बना था. इसके इस हिस्से का नाम लुइस डेन के नाम पर रखा गया था. डेन 1898 में पंजाब सरकार के सेक्रेटरी थे. इस होटल को 1970 में गिरा दिया गया. इस होटल में भारतीय उपमहाद्वीप की यात्रा करने वाले भारतीय पर्यटकों के साथ-साथ थॉमस कुक और उनका बेटा भी ठहरा करते थे.

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