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जन्मदिन विशेष: नजरुल के बिना अधूरा ही रहेगा भारतीयता का विचार

नजरुल इस्लाम ने सारी सीमाओं से परे आग उगलती हुई कविताएं लिखीं.

Avinash Dwivedi | Published On: May 24, 2017 12:43 PM IST | Updated On: May 24, 2017 01:31 PM IST

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जन्मदिन विशेष: नजरुल के बिना अधूरा ही रहेगा भारतीयता का विचार

काजी नजरुल इस्लाम, आजादी के दौर में सामाजिक भेदभाव और धार्मिक कट्टरता के खिलाफ सबसे मुखर लोगों में से एक थे. पर दुर्भाग्य ही था कि उन्हें अपनी जिंदगी के आखिरी तीन दशक शांति में गुजारने पड़े.

1942 में जब नजरुल बस 43 साल के थे और अपनी क्रिएटिविटी के चरम पर थे, उन्हें एक रहस्यमय रोग हो गया. जिससे उनकी आवाज और याद्दाश्त चली गई. उस वक्त ये अफवाह उड़ी कि ब्रिटिश सरकार ने उन्हें स्लो प्वाइजन दिया है. पर बाद में पता चला, उन्हें एक लाइलाज (न्यूरो सिस्टम से जुड़ी) बीमारी है.

आरंभ से कहें तो 1899 में बंगाल के बर्धमान जिले के चुरुलिया नाम के गांव में पैदा हुए नजरूल इस्लाम ने धार्मिक शिक्षा एक मस्जिद में पाई और जल्द ही वहीं काम करना शुरू कर दिया. फिर वो 'लेतोर दल' में शामिल हो गए. ये एक गांव का ही नाट्य समूह था. यहां से उनकी साहित्यिक और संगीतिक यात्रा की शुरुआत हुई.

इसके बाद वो ब्रिटिश आर्मी में भर्ती होने को प्रेरित हुए और पहले विश्व युद्ध में मध्य पूर्व में उन्होंने लड़ाई भी की. आर्मी ने उन्हें बड़े स्तर पर गाने और विश्व के दूसरे हिस्सों के संगीत से परिचित कराया.

जन्मा 'विद्रोही' कवि

वापस कलकत्ता लौटकर नजरूल इस्लाम अंग्रेजी शासन, कट्टरता, सांप्रदायिकता और शोषण के खिलाफ अपनी कलम के माध्यम से लड़ने लगे. उन्होंने अपने लेखन के जरिए अंग्रेजों की बहुत आलोचना की और भारत की आजादी की लड़ाई में जोर-शोर से भाग लिया. जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने उनकी किताबों और अखबार के लेखों पर बैन लगा दिया. ये बातें आगे चलकर उनकी जेलयात्रा का कारण भी बनीं.

नजरुल को आज भी एक विद्रोही कवि के रूप में जाना जाता है. जिसकी कविताओं में आग है और जिसने जिंदगी के हर पहलू में हो रहे अन्याय के प्रति अपनी आवाज उठाई. 'विद्रोही' उनकी एक प्रसिद्ध कविता भी है -

मैं विद्रोही, मैं चिर अधीर! मैं शास्ति शांति का नाश, त्रास मैं क्रांतिरूप मैं रणकामी, चिर सजग वीर मैं महाविश्व के महाकाश का वक्ष तोड़ मैं रवि शशि ग्रह उपग्रह पीछे नक्षत्र छोड़ मैं महर्लोक स्वर्लोक भेद शतकोटि लोक पहुंचा आलोक के लोक, त्रस्त प्रभु को शंकित करता सशोक मैं वसुंधरा का उर विदार मैं चिर विस्मय निकला उसमें से चमत्कार है अग्नि शिखाओं का पहनाया जिसे रुद्र ने कंठहार मैं चिर गर्वोन्नत शीश, हेर नतशीश जिसे उत्तुंग हिमालय श्रृंग धीर मैं विद्रोही, मैं चिर अधीर

( मूल कविता बांग्ला भाषा में )

बोलो बीर... बोलो उन्नत मम शिर! शिर निहारि आमार, नत शिर! अए शिखर हिमाद्रिर बोलो महाविश्र्वेर महाकाश फाड़ि चन्द्र, सूर्य, ग्रह, तारा छाड़ि भूलोग, दूयलोक, गोलोक भेदिया खुदार आसन 'आरस' छेदिया उठियाछि चिर-विस्मय आमि विधात्रीर! मम ललाटे रुद्र भगवान ज्वाले राज-राजटीका दीप्त जयश्रीर! बोलो बीर...

खास बात ये है कि अभी आपने ऊपर जो हिंदी में 'विद्रोही' का ये स्वतंत्र रूपांतर पढ़ा, ये 1937 में हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक 'रामविलास शर्मा' द्वारा किया गया था.

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आज भी नजरुल के गीत के बिना ईद पूरी नहीं होती

नजरुल की कलम को दबाने की अंग्रेजों ने लाख कोशिशें कीं. फिर भी न दबाए जा सकने वाले नजरुल ने महान साहित्य लिखने के साथ-साथ शोषित लोगों और सांप्रदायिकता के खिलाफ काम जारी रखा. उन्होंने भारत की गंगा-जमुनी तहजीब से प्रेरणा ली. नजरुल फारसी और हिंदू दोनों ही धर्मों से अच्छी तरह परिचित थे.

उन्होंने स्वयं एक हिंदू महिला से शादी की, जिनका नाम प्रोमिला था. ध्यान से देखें तो उनकी रचनाओं में संस्कृत, अरबी और बांग्ला तीनों ही संस्कृतियों का प्रभाव दिखाई पड़ता है. काजी नजरुल उत्सवधर्मी भी थे. कहा जाता है कि बंगाल और बांग्लादेश में उनके लिखे इस गीत के बजे बिना ईद पूरी ही नहीं होती.

(मूल) ओह मोर रमजानेर ओई रोजार शेषे, एलो खुशीर ईद तुई अपनाके आज बिलिए दे शोन, आसमाने तागीद

(अनुवाद) ओ मन रमजान के बाद रोजे के बाद आई है मुबारक ईद तुम अपने-अपने बैर भूल जाओ सुनो ऊपरवाले का संदेश

मशहूर गायिका रूना लैला की आवाज में सुनें ये गीत -

सभी तरह के संगीत और साहित्य के महारथी

बस 20 सालों के छोटे से रचनात्मक काल में उन्होंने कई प्रमुख रागों पर गीत रचे. जिनकी संख्या 4 हजार से ज्यादा है. 'नजरुल गीति' नाम से नजरुल के गीतों का संकलन है.

उनकी गजलों ने बांग्ला को समृद्ध तो किया ही है. अरबी/ फारसी शब्दों को लेखन में अपनाकर एक नई तरह की संस्कृति की नींव भी डाली. जितने वक्त उन्होंने कलकत्ता में ऑल इंडिया रेडियो में काम किया, उन्होंने कई संगीतकारों को गढ़ा. जिन्होंने आगे चलकर बहुत नाम किया.

अधिकांश महान साहित्यकारों की तरह बच्चों के लिए भी उन्होंने कई कविताएं, गीत और लोरियां लिखी हैं. उनकी लिखी ये छोटी सी बाल कविता पढ़ें, जो आज भी 'पश्चिम बंगाल' और 'बांग्लादेश' में हर बच्चे के बचपन का हिस्सा होती है -

(अनुवाद )

भोर हुई द्वार खुले छोटे बच्चे जागो रे सुबह-सुबह जुही की शाख पर छोटे फूल खिल रहे सूरज मामा चलते बकैयां आसमान लाल रंग रहे चौकीदार गीत गा रहा हे राम! तुम भी सुनो रे

( मूल कविता बांग्ला भाषा में )

भोर होलो दोर खोलो खुकुमणि उठे रे ऐ डाके जुई शाखे फूल खुकी छोट रे खुकुमणि उठ रे रवि मामा देय हामा गाए रांगा जामा ऐ दारोयान गाय गान शोनो ऐ, रामा हे

मुजीबुर्रहमान नजरूल को सहारा देते हुए

दो साल के अंदर ही बंगाल ने अपने दो महान साहित्यिक रत्न खो दिए

रबींद्रनाथ टैगोर की मौत को अभी एक साल भी नहीं हुए थे कि 1942 में काजी नजरूल इस्लाम बुरी तरह से बीमार पड़े और अपनी बोलने की क्षमता खो दी. और ये हालत उनके देहांत तक रही.

उनके प्रशंसक 'नजरूल ट्रीटमेंट सोसाइटी' के प्रयास से एक बार उन्हें 1952 में रांची में इलाज के लिए लाये थे. भारत में इलाज कराने में कई बड़े लोगों का प्रयास भी था. जिनमें से श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी एक थे. बाद में उन्हें और उनकी पत्नी प्रोमिला को इलाज के लिए लंदन भी भेजा गया, फिर वहां से वो वियना भी गए. जहां पता चला कि नजरूल को 'पिक डिजीज' नाम की बीमारी है. जो लाइलाज होती है. फिर वे लोग वापस बांग्लादेश लौट आए.

बांग्लादेश में ही रहते हुए 29 अगस्त, 1976 को उनका देहांत हो गया. जैसा कि उन्होंने अपनी एक कविता में इच्छा जाहिर की थी, उन्हें ढाका यूनिवर्सिटी के कैंपस में एक मस्जिद के बगल में दफनाया गया.

काजी नजरूल इस्लाम भारत रूपी पौधे की एक ही शाख के दो फूल 'हिंदू' और 'मुसलमानों' को बताया करते थे. काजी नजरुल इस्लाम कवि की सह्रदयता पर जोर देते थे पर उनकी कविताएं इतनी भी आदर्शवादी नहीं थीं. दरअसल नजरूल सहअस्तित्व, सौहार्द और प्रेम के समर्थक एक भावुक कवि थे. इस बात को पुष्ट करती एक एक कविता देखिए-

नेताओं को चंदा चाहिए और गरीब लोग भोजन के लिए बचाया हुआ पैसा लाकर दे देते हैं बच्चे भूख से रोने बिलबिलाने लगते हैं. उनकी मां कहती है: 'अरे अभागों, चुप हो जाओ! देखते नहीं, वह स्वराज्य चला आ रहा है!'

पर भूख से व्याकुल बच्चा स्वराज्य नहीं चाहता, उसे चाहिए पेट में डालने के लिए थोड़ा सा चावल और नमक दिन बीतता जाता है, बेचारे बच्चे ने कुछ नहीं खाया है, उसके सुकुमार पेट में आग जल रही है. देखकर, आंखों में आंसू भरकर, मैं पागलों की तरह दौड़ जाता हूं, स्वराज्य का नशा तब न जाने कहां गायब हो जाता है.

ढाका में 1975 के आस-पास

भूपेन हजारिका का ये गीत सुनें और रबींद्रनाथ से नजरुल की तुलना का अंत करें

नजरुल का प्रभाव और पहुंच इतनी व्यापक थी कि नजरुल का करियर खत्म होने के बहुत बाद 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में नजरूल की कविताएं विद्रोहियों के लिए महान प्रेरणा का स्त्रोत बनीं. नजरुल इस्लाम से बांग्लादेश का मानस इतना प्रभावित था कि नजरुल को बांग्लादेश का राष्ट्रीय कवि बना दिया गया.

रबींद्रनाथ टैगोर भी नजरुल की आग उगलती लेखनी से बहुत प्रभावित थे. उन्होंने खुद से लगभग 40 साल छोटे नजरुल को अपनी एक किताब समर्पित की थी. कुछ लोगों का मानना है कि रवींद्रनाथ के व्यक्तित्व और लेखन के नीचे उनका लेखन पॉलिटिकल कारणों से दब जाता है.

कुछ तर्क देते हैं कि नजरूल के लिखे हुए गीतों की संख्या रबींद्रनाथ टैगोर से ज्यादा है. कुछ दोनों के संगीत का जानकार होने के कारण दोनों की तुलना करते हैं. पर काजी नजरुल इस्लाम की गुरुदेव से तुलना का जवाब देने को 'भूपेन हजारिका' का ये गीत अपने आप में काफी है -

सबके ह्रदय में रबींद्रनाथ, चेतना में नजरूल हों जब भी कोई रोग, विघ्न, विपत्ति पड़े या हवा प्रतिकूल हो हाथ में हो अग्निवीणा* और मुंह पर गीतांजली हजार सूरज, लाखों तारे इसी रास्ते पर चलेंगे सबके ह्रदय में रबींद्रनाथ, चेतना में नजरूल हों

साबार ह्रदय रोबिन्द्रनाथ चेतोनाटे नजरूल जोतोई अशुक बिघ्नो बिपोद हावा होक प्रोतिकूल अएक हाते बाजे अग्निबिना कोंथे गीतानजोली हाजार सुरजो चोखेर ताराई अमरा जे पोथ चोली साबार ह्रदय रोबिन्द्रनाथ चेतोनाटे नजरूल

*'अग्निवीणा' नजरूल इस्लाम का काव्य संग्रह है.

पूरा गीत भूपेन हजारिका की आवाज में सुनिए -

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