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कैफ़ी आज़मी पुण्यतिथि विशेष: जीत ही लेंगे बाजी हम-तुम, खेल अधूरा छूटे ना...

कैफ़ी आज़मी शायर और गीतकार से ज्यादा आजाद-ख्याल, जुनूनी और बराबरी पसंद शख्सियत थे

Pawas Kumar | Published On: May 10, 2017 09:40 AM IST | Updated On: May 10, 2017 11:51 AM IST

कैफ़ी आज़मी पुण्यतिथि विशेष: जीत ही लेंगे बाजी हम-तुम, खेल अधूरा छूटे ना...

'तुम न होते तो जाने क्या होता

तुम न होते तो इस सितारे में देवता राक्षस ग़ुलाम इमाम पारसा रिंद रहबर रहज़न बिरहमन शैख़ पादरी भिक्षु सभी होते मगर हमारे लिये कौन चढ़ता ख़ुशी से सूली पर'

कैफ़ी आज़मी न हुए होते क्या होता?

कैफ़ी आज़मी एक शायर और गीतकार से ज्यादा एक आजाद-खयाल, जुनूनी और बराबरी पसंद शख्सियत थे.

कुछ समय पहले एक इंटरव्यू के दौरान अपने पिता के बारे में बात करते हुए शबाना आज़मी ने कहा था, उनके कथनी और करनी में कभी कोई अंतर नहीं रहा. अगर वो महिलाओं के हक की बात लिखते थे तो वो घर-परिवार, समाज की महिलाओं को भी बराबरी का दर्जा देते थे. मौत की दहलीज पर खड़े कैफ़ी ने जब अपने गांव की खराब हालत देखी तो इसके बदलाव के लिए कोशिश की. कैफ़ी आज़मी जीवन भर अपने लिए एक घर नहीं बना सके लेकिन कई घरों में उजाला उनकी बदौलत ही हुआ.

बदलाव की चाहत और विद्रोह की भावना तो बचपन से ही थी. सेमिनरी में खराब सिस्टम के खिलाफ छात्र संघ बनाया और हड़ताल की. धरना करीब डेढ़ साल तक चला लेकिन इसके बाद कैफ़ी सेमिनरी से निकाल दिए गए. फिर उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भी हिस्सा लिया. आजादी के बाद उनके पिता और भाई पाकिस्तान चले गए लेकिन कैफ़ी ने हिंदुस्तान में ही रहने का फैसला किया.

शबाना आज़मी ने इसी इंटरव्यू में बताया था कि कैफ़ी साहब को पेन जमा करने का शौक था. 'मोर्बलांग' पेन उनका फेवरेट था. वो बड़े प्यार से उन्हें संभाल कर रखते थे.

घर का खर्च चलाने के लिए लिखना शुरू किया

कहते हैं कि शुरू-शुरू में कैफ़ी जब मुशायरों में गजल पढ़ते तो लोगों को शक होता कि वह खुद की नहीं बल्कि अपने बड़े भाई की गजलें सुनाते हैं. एक बार उनके पिता ने परीक्षा लेने के लिए गाने की एक पंक्ति दी और गजल लिखने को कहा. कैफी आज़मी ने गजल लिखी- 'इतना तो जिंदगी में किसी की खलल पड़े, न हंसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े.'

अपनी राजनीतिक सक्रियता के बीच भी मुशायरों मे कैफ़ी की शिरकत जारी रहती. 1947 में एक मुशायरे में ही शौकत आज़मी से मुलाकात हुई. जल्द ही दोनों ने शादी कर ली. इस बीच उनकी पहली नज्म लखनऊ के ‘सरफराज’ में छपी. घर के खर्च के लिए अखबारों में लिखना शुरू कर दिया. लेकिन अपने घर के बढ़ते खर्चों को देख कैफी आज़मी ने फिल्मी गीत लिखने का फैसला किया.

उन्होंने सबसे पहले शाहिद लतीफ की फिल्म 'बुजदिल' के लिए दो गीत लिखे. इसके बाद 1959 की 'कागज के फूल' के लिए लिखे गए 'वक्त ने किया क्या हसीं सितम, तुम रहे न तुम हम रहे न हम' लिखा.

1965 की 'हकीकत' का गीत 'कर चले हम फिदा जानो तन साथियो, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो' उनके सबसे कामयाब गीतों में था. गीतकार के रूप में कैफ़ी आज़मी की कुछ प्रमुख फिल्में- शमा, गरम हवा, शोला और शबनम, कागज के फूल, आखिरी खत, हकीकत, रजिया सुल्तान, नौनिहाल, सात हिंदुस्तानी, अनुपमा, कोहरा, हिंदुस्तान की कसम, पाकीजा, हीर रांझा, उसकी कहानी, सत्यकाम, हंसते ज़ख्म, अनोखी रात, बावर्ची, अर्थ, फिर तेरी कहानी याद आई.

कैफ़ी साहब उन कुछेक शायरों में थे जिन्हें साहित्य में दाद के साथ सिनेमा में भी सफलता और शोहरत मिली. कैफ़ी आज़मी ने फिल्म 'गरम हवा' की कहानी, डायलॉग्स और स्क्रीनप्ले भी लिखे. इसके लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार मिला. उन्होंने फिल्म हीर-रांझा में डायलॉग्स लिखे और श्याम बेनेगल की फिल्म 'मंथन' की पटकथा भी लिखी.

कलम की धार थी या तलवार थी

कैफ़ी फिल्मी दुनिया के बड़े गीतकार के रूप में फेमस होने के बाद भी अपने वक्त के मुद्दों से कभी अछूते नहीं हुए. बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद लिखी उनकी कविता 'दूसरा बनबास' इसी की बानगी है.

राम बन-बास से जब लौट के घर में आए याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए

रक़्स-ए-दीवानगी आँगन में जो देखा होगा छे दिसम्बर को श्री राम ने सोचा होगा इतने दीवाने कहाँ से मिरे घर में आए

जगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशाँ प्यार की काहकशाँ लेती थी अंगड़ाई जहाँ मोड़ नफ़रत के उसी राहगुज़र में आए

धर्म क्या उन का था, क्या ज़ात थी, ये जानता कौन घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन घर जलाने को मिरा लोग जो घर में आए

शाकाहारी थे मेरे दोस्त तुम्हारे ख़ंजर तुम ने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर है मिरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आए

पाँव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे कि नज़र आए वहाँ ख़ून के गहरे धब्बे पाँव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे राम ये कहते हुए अपने द्वारे से उठे

राजधानी की फ़ज़ा आई नहीं रास मुझे छे दिसम्बर को मिला दूसरा बनबास मुझे

14 जनवरी 1919 को आजमगढ़ के मिजवां में जन्मे कैफ़ी आज़मी को जब ब्रेन हेमरेज और पैरालिटिक अटैक हुआ तो वह वापस अपने गांव लौटे. 10 मई 2002 को उनका निधन हो गया. खैर, कैफ़ी आज़मी के जाने के बाद भी उनके शब्द तो हमेशा रहेंगे ही.

उन्हीं के शब्दों में:

जीत ही लेंगे बाज़ी हम-तुम, खेल अधूरा छूटे ना प्यार का बन्धन, जन्म का बन्धन, जन्म का बन्धन टूटे ना

मिलता है जहाँ धरती से गगन, आओ वहीं हम जाएँ मैं तेरे लिए, मैं तेरे लिए, इस दुनिया को ठुकराएँ दूर बसा लें दिल की जन्नत, जिसको ज़माना लूटे ना

मिलने की ख़ुशी, ना मिलने का ग़म, ख़त्म ये झगड़े हो जाएँ तू तू न रहे, मैं मैं न रहूँ, इक-दूजे में खो जाएँ मैं भी ना छोड़ूँ पल भर दामन, तू भी पल भर रूठे ना

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