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जिद्दू कृष्णमूर्ति: मठ तोड़ने और शिष्यों से मुंह मोड़ने वाले मॉडर्न संन्यासी

कृष्णमूर्ति ने जिंदगी भर कई देशों की यात्राएं कीं नए लोगों से मिले. उनसे कुछ सीखा और कुछ उन्हें सिखाया.

Avinash Dwivedi Updated On: May 12, 2017 03:27 PM IST

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जिद्दू कृष्णमूर्ति: मठ तोड़ने और शिष्यों से मुंह मोड़ने वाले मॉडर्न संन्यासी

भारत में हमेशा साधु-संन्यासियों को बड़े ही आदर के साथ देखा जाता रहा है. पर पिछले दशकों में चीजें कुछ अलग हुई हैं. बड़ी संख्या में झूठे और ढोंगी बाबा लोग भी साधु का चोला ओढ़े मैदान में कूद पड़े हैं. जो अपनी करतूतों के चलते वक्त-वक्त पर जेल भी जाते रहते हैं.

बहरहाल, बाबाओं के साथ-साथ एंटी- बाबाओं का भी उदय हुआ है. होते ये भी बाबा ही हैं पर ये बाबा लोग पारंपरिक बाबाओं का विरोध करते हैं. 'ओशो' ऐसे नामों में एक बड़ा नाम थे.

'कबीर' को इस 'एंटीबाबा' परंपरा का जनक माना जाना चाहिए. पर इन एंटीबाबाओं के साथ एक दुर्भाग्यपूर्ण बात ये होती है कि जनता उनका भी ट्रीटमेंट बाबाओं वाला ही कर देती है.

कबीर के नाम पर चल रहे मठ और ओशो के नाम पर चल रहे मठ और प्रॉडक्ट्स इसका उदाहरण हैं. ये एंटीबाबा लोग जिस बात का जिंदगी भर विरोध करते हैं उनके भक्तगण उन्हें उन्हीं ढंढकमंडलों से घेर देते हैं.

दूसरी ओर साधु-संन्यासियों के रूप में छिपे बिगड़ैल और महत्वाकांक्षी बाबा लोगों के पास आज सिर्फ अनगिनत मठ और आश्रम ही नहीं हैं बल्कि ये साधु-संन्यासी अपने नाम और काम का फायदा उठाते हुए बड़ी-बड़ी दुकानें और फैक्ट्रियां भी खोल ले रहे हैं.

ये लोग हर साल लाखों-करोड़ों का रोजगार कर रहे हैं. साथ ही प्रकृति के प्रेमी बनने वाले ये बाबा लोग हजारों-करोड़ रूपये लगाकार अंतर्राष्ट्रीय उत्सव कर रहे हैं जिनसे नदियां और पर्यावरण को बहुत नुकसान हो रहा है.

ऐसे में आशा की किरणें हमारे इतिहास में दबी हुई हैं. क्योंकि यहां एक बाबा ऐसा भी हुआ है जिसके पास बाबा बनते वक्त ही दुनिया के सबसे बड़े मठों में से एक मठ और मसीहा की पदवी थी पर उसने अपना मठ भी तोड़ दिया और पदवी भी ठुकरा दी. साथ ही कभी शिष्य न बनाने का संकल्प ले लिया.

ऐसे में जब लोगों का बाबाओं की करतूतों के चलते सच्चाई और सर्वकल्याण की भावना से भरोसा उठ रहा है तब  जे.कृष्णमूर्ति की बात कर लेना जरूरी हो जाता है.

दरअसल जे. कृष्णमूर्ति दार्शनिक और लेखक के रूप में जाने जाते हैं. पर वो इससे भी कुछ खास थे. उन्हें एक मौलिक इंसान के तौर पर देखा जाना चाहिए. कारण उन्हें अपनी विशेषताओं का कभी अभिमान नहीं रहा. यहां तक कि उन्होंने किसी को भी शिष्य नहीं बनाया.

लोगों ने उन्हें मसीहा माना था पर उन्होंने अपनी इस छवि को सिरे से खारिज कर दिया और उन्हें केंद्र में रखकर बनाया गया एक संगठन भी भंग कर दिया. कृष्णमूर्ति ने सत्य को एक 'मार्गरहित भूमि' बताया और ये भी कहा कि किसी भी औपचारिक धर्म, संप्रदाय और दर्शन के माध्यम से इस तक नहीं पहुंचा जा सकता है.

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इंग्लैण्ड में पढ़ाई फिर 'विश्वगुरू' 

कृष्णमूर्ति का जन्म तमिलनाडु के एक गरीब ब्राह्मण परिवार में 1885 में हुआ था. इनके पिता का नाम जिद्दू नारायणिया था. माता-पिता की आठवीं संतान होने के नाते कृष्ण की तर्ज पर इनका नाम कृष्णमूर्ति रखा गया. ये दस साल के ही थे कि इनकी माता का देहांत हो गया.

थियोसॉफिकल सोसाइटी उसी वक्त पूरे संसार में अपनी जड़ें जमा रही थी और उसके सदस्यों ने एक विश्वगुरू के आने की भविष्यवाणी की थी. ऐसे में इस बचपन से विलक्षण बालक के बारे में एनी बेसेंट को पता चला और उन्होंने इसे गोद ले लिया.

उन्होंने कृष्णमूर्ति को अपने छोटे भाई जैसा माना और 1912 में शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड भेज दिया. 1921 में कृष्णमूर्ति लौट आए तो उन्हें 1927 में एनी बेसेंट ने 'विश्वगुरू' घोषित कर दिया.

जिसने 'विश्वगुरू' बनाया वो संस्था तोड़ी

पर दो ही वर्षों के अंदर कृष्णमूर्ति ने थियोसॉफिकल सोसाइटी से नाता तोड़ लिया और स्वतंत्र चिंतक बन गए. उन्होंने ‘आर्डर ऑफ द स्टार’ (आध्यात्मिक संस्था) को भंग करते हुए कहा, 'अब से कृपा करके याद रखें कि मेरा कोई शिष्य नहीं है क्योंकि गुरु तो सच को दबाते हैं. सच तो स्वयं तुम्हारे भीतर है..सच को ढूंढने के लिए मनुष्य को सभी बंधनों से स्वतंत्र होना आवश्यक है.'

शिक्षा के महत्व पर कृष्णमूर्ति का बहुत जोर रहता था. ये उनके विचारों का सबसे खास तत्व है. उन्होंने कहा कि बच्चे शिक्षा पाने के दौरान तमाम मुसीबतों से निपटना सीखते हैं. उनके विचार परिपक्व होते हैं और उन्हें कड़ी मेहनत के महत्व के बारे में पता चलता है.

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उनका मानना था कि यह जागरुकता बच्चों के अंदर मनुष्य के साथ प्रकृति के साथ तथा मानव-निर्मित यंत्रों के साथ सही संबंध को परिपक्व करने के लिए बहुत जरूरी है. कृष्णमूर्ति आंतरिक अनुशासन पर जोर देते हैं. कहते हैं, 'बाहरी अनुशासन मन को मूर्ख बना देता है, यह नकल करने की प्रवृत्ति लाता है.'

कृष्णमूर्ति कहते थे, 'यदि आप ध्यान से सुन कर दूसरों की खुशी का ध्यान रखकर विचार के द्वारा अपने को अनुशासित करते हैं तो इससे व्यवस्था आती है. जहां व्यवस्था होती है वहां स्वतंत्रता सदैव रहती है. यदि आप ऐसा करने में स्वतंत्र नहीं है तो आप व्यवस्था नहीं कर सकते. व्यवस्था ही अनुशासन है.'

जे. कृष्णमूर्ति अपने शैक्षिक विचारों के माध्यम से टीचर और स्टूडेंट दोनों को यह जिम्मेदारी सौंपते हैं कि वे एक अच्छे समाज का निर्माण करें जिसमें सभी मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक जी सकें. शांति और सुरक्षा में हिंसा के बिना. क्योंकि आज के विद्यार्थी ही कल के भविष्य हैं.

सिस्टम आदमी को नहीं, आदमी सिस्टम को बदलता है

समाज या व्यक्ति कौन ज्यादा महत्व का है? इस बहस में अक्सर समाज को ही ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है. पर जे. कृष्णमूर्ति इससे उलट बात में विश्वास करते थे.

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इसके पीछे उनका तर्क था, 'एक सिस्टम आदमी को नहीं बदल सकता है. आदमी ही हमेशा सिस्टम को बदलता है. जिसकी गवाही इतिहास भी देता है. जब तक मैं तुम्हारे साथ अपने रिश्ते में खुद को नहीं समझ लेता मैं हमेशा बिखराव, दुख, टूटन, डर और वहशीपने का कारण बना रहूंगा.'

जिद्दू कृष्णमूर्ति के इन नए तरह के विचारों की ओर समाज का इंटेलेक्चुअल तबका खिंचा और लोग मार्गदर्शन के लिए उनके पास आने लगे. कृष्णमूर्ति ने जिंदगी भर कई देशों की यात्राएं कीं नए लोगों से मिले. उनसे कुछ सीखा और कुछ उन्हें सिखाया.

उन्होंने पूरा जीवन एक शिक्षक और छात्र की तरह बिताया. बताया कि किस तरह मनुष्य के सर्वप्रथम मनुष्य होने से ही मुक्ति की शुरुआत होती है. पर आज का इंसान हिंदू, बौद्ध, ईसाई, मुसलमान, अमेरिकी, अरबी या चाइनीज है.

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान कृष्णमूर्ति की लेखक 'एल्डस हक्सले' से दोस्ती हो गई. हक्सले ने उन्हें अपने विचारों को लिखने के लिए प्रेरित किया. कृष्णमूर्ति के कई काम प्रकाशित हुए हैं. जिनमें से 'शिक्षा और जीवन का महत्व' (1953) और 'पहली और आखिरी स्वतंत्रता' (1954) प्रमुख हैं.

उन्होंने एक बार कहा था, संसार विनाश की राह पर आ चुका है और इसका हल तथाकथित धार्मिकों और राजनीतिज्ञों के पास नहीं है. जे. कृष्णमूर्ति ने अपने जीवन काल में अनेक शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की जिनमें दक्षिण भारत का ‘ऋषिवैली’ स्कूल प्रमुख है.

भारत के इस महान व्यक्तित्व की 91 वर्ष की आयु में 17 फ़रवरी, 1986 ई. में मृत्यु हो गई. ओशो ने एक बार जे. कृष्णमूर्ति की मृत्यु के दिन को उत्सव की तरह मनाने की बात कही थी. ओशो मानते थे कि जिद्दू अमर हैं इसलिए उनकी मौत पर दुखी क्या होना?

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