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क्या आतंकवाद इस्लामी है? जिहादियों की पांच दलीलें

सवाल यह है कि इसे इस्लामी आतंकवाद कहना चाहिए या कुछ और?

Tufail Ahmad Updated On: Dec 01, 2016 10:42 AM IST

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क्या आतंकवाद इस्लामी है? जिहादियों की पांच दलीलें

 13 अगस्त को तुफैल अहमद ने अपनी नई किताब 'जिहादिस्ट थ्रेट टू इंडिया: द केस फॉर इस्लामिक रिफॉर्मेशन बाई एन इंडियन मुस्लिम' के लॉन्च पर एक व्याख्यान दिया. हैदराबाद में इस कार्यक्रम को 'सोशल कॉज' ने कराया था. इस्लाम के विभिन्न पहलुओं, व्याख्याओं और धारणाओं को छूते हुए तुफैल अहमद के व्याख्यान को यहां तीन हिस्सों में पेश किया जा रहा है. पहला हिस्सा 'इस्लाम लोगों के बीच भेद पैदा करता है ' के नाम से पहले ही प्रकाशित हो चुका है. यहां इस व्याख्यान का दूसरा हिस्सा दिया जा रहा है.

हाल के सालों में फैलते इस्लामी आतंकवाद को समझने और समझाने के लिए कई शब्द चल पड़े हैं जिनमें शामिल हैं: कट्टरपंथी इस्लाम, इस्लामी आतंकवाद, राजनीतिक इस्लाम, सलाफी-वहाबी इस्लाम, या चरमपंथी इस्लाम. सियासी तौर पर सही बने रहने (पॉलिटिकल करेक्टनेस) के चक्कर में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जैसे विश्व नेता भी इस्लाम से कोई संबंध मानने की बात खारिज करते हैं. राजनीतिक इस्लाम जैसे टर्म कई बार इस समस्या को लेकर बात करने में विश्व नेताओं की मदद करती है, वरना तो ये शब्द आतंकवादी खतरे की गंभीरता को हल्का ही करते हैं. तो सवाल यह है कि इसे इस्लामी आतंकवाद कहना चाहिए या कुछ और?

चलिए, कुछ बिंदु बताता हूं कि इसे क्यों जिहादी आतंकवाद कहा जाना चाहिए? पहली बात, इस्लामी या जिहादी जैसे शब्दों का इस्तेमाल तो अल कायदा, तालिबान और इस्लामिक स्टेट भी अपनी गतिविधियों के बारे बताते हुए करते हैं. वे यह नहीं कहते कि मौलाना मौदुदी (जमात ए इस्लामी के संस्थापक) या सैयद कुतुब (मिस्र के धर्मशास्त्री) ने जिहाद की शुरुआत की. वे अपने कामों को जायज ठहराने के लिए कुरान की आयतों और हदीसों (पैंगबर की बातें और उनके काम) का हवाला देते हैं. ये गुट लोकतंत्र को खारिज करते हैं और गैर मुस्लिम और मुस्लिम, सभी देशों में शरिया लागू करने की वकालत करते हैं. इस वजह से इन्हें जिहादी या इस्लामी कट्टरपंथी कहा जाता है.

जामा मस्जिद दूसरी बात, सभी मुस्लिम लड़ाकों को जिहादी नहीं कहा जाता. पाकिस्तान में ही लीजिए, वहां बलूचिस्तान की आजादी के लिए लड़ रहे मुस्लिम विद्रोहियों को इस्लामी कट्टरपंथी या जिहादी नहीं कहा जाता क्योंकि वे शरिया के लिए नहीं लड़ रहे हैं. उत्तरी आयरलैंड में, प्रोटेस्टैंट और कैथोलिक गुटों को ईसाई आतंकवादी नही कहा जाता था क्योंकि वो ईसाई शासन की वकालत नहीं कर रहे थे. श्रीलंका में एलटीटीई (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम) के लड़ाकों को हिंदू आतंकवादी नहीं कहा जाता था क्योंकि वो तमिल लोगों की आजादी के लिए लड़ रहे थे, न कि हिंदुओं के शासन के लिए.

तीसरी बात, भारत में सभी लड़ाकों को हिंदू आतंकवादी नहीं कहा जाता. नक्सली आतंकवादी, जो हिंदू हैं लेकिन उन्हें हिंदू आतंकवादी नहीं कहा जाता है क्योंकि वे हिंदू शासन की वकालत नहीं करते. लेकिन अभिनव भारत के सदस्यों को हिंदू या भगवा आतंकवादी कहा गया क्योंकि वो हिंदुओं का शासन चाहते हैं. शिवसेना बार बार पाकिस्तान पर हमला करने के लिए 'हिंदू आत्मघाती बम हमलावरों' की बात करती है.

पांच तर्क और जिहादियों की तरफ से उनका जबाव

चलिए, जिहाद से जुड़ी पांच दलीलों की बात करते हैं और देखते हैं जिहादियों का उन पर क्या रुख है.

पहला तर्क: इस्लाम एक शांतिपूर्ण धर्म है

लेकिन, हकीकत कुछ और है. पैगंबर मोहम्मद की मौत के बाद उनकी विरासत को लेकर जंग शुरू हो गई थी, जिसकी वजह से मुसलमान बाद में दो पंथों में बंट गए: सुन्नी और शिया. पहले खलीफा अबु बकर को छोड कर, उसके बाद आए सभी तीन खलीफा और शियाओं के 12 इमाम, सब की हत्या हुई थी. असल में, करबला की लड़ाई इतनी रक्तरंजित थी कि इसके बाद ज्यादातर शिया इमामों को खत्म कर दिया गया. खुद पैगंबर मोहम्मद ने 27 जंगों में हिस्सा लिया था. इस्लाम के शुरुआती दौर में भी इस्लामिक स्टेट जैसे जिहादी गुटों का जन्म हुआ था, मिसाल के तौर पर जब पहले खलीफा अबु बकर ने तलवार उठाई थी और जकात (टैक्स) न देने वाले मुसलमानों के खिलाफ जिहाद की धमकी दी थी.

कट्टरपंथी इस्लाम का बचाव करने वाले अकसर यह दलील बहुत देते हैं कि मक्का की फतह के दिन पैगंबर ने हर किसी के लिए आम माफी का आदेश दिया था. अल कायदा चरमपंथी उस्ताद फारूक का कहना है कि यह बात ऐतिहासिक रूप से गलत है. उसी दिन, पैगंबर को बताया गया कि महिलाओं समेत ऐसे दस लोग आसपास हैं जिन्होंने उनके खिलाफ ईशनिंदा की है. पैगंबर ने आदेश दिया कि भले ये लोग काबा के पर्दों से ही क्यों न लटके हों, उनका कोई सम्मान नहीं हो सकता और उनका कत्ल होना चाहिए. उन्हें कत्ल कर भी दिया गया.

यह है इस्लाम का ईशनिंदा कानून जिसकी वजह से अल कायदा के दो जिहादियों ने पिछले साल पैरिस में शार्ली हेब्दो पत्रिका के संपादकों की गोली मारकर हत्या कर दी.

शार्ली हेब्दो

आईएस के पैदा होने से बहुत पहले, ईरान के इमाम खोमैनी ने इसी धार्मिक वजह से सलमान रुश्दी की हत्या करने के लिए लोग भेजे थे. इसी कारण से बिजनौर के मौलाना अनवारुल हक सादिक के नेतृत्व में भारतीय मौलवियों ने कमलेश तिवारी की जेल में या जेल से बाहर हत्या करने वाले को 51 लाख रुपये का इनाम देने का एलान किया था.

भारत में पाकिस्तान जैसा ईशनिंदा कानून नहीं है, फिर भी तिवारी को अब तक ईशनिंदा के लिए जेल में रखा गया है. पाकिस्तान में सिक्योरिटी कमांडो मलिक मुमताज कादरी ने पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की 2011 में गोली मारकर हत्या कर दी थी, सिर्फ इसलिए कि तासीर ईशनिंदा कानून में सुधार की वकालत करते थे. कादरी का संबंध बरेलवी गुट ‘दावत ए इस्लाम’ से था जो पाकिस्तान और मुंबई में लोकप्रिय है. इस वजह से शिया हो या सुन्नी, देवबंदी या बरेलवी, या फिर अल कायदा, ये सभी ईशनिंदा कानून में विश्वास करते हैं.

 दूसरा तर्क: जिहाद का मतलब है पाक मुसलमान बनने की कोशिश करना

जिहादी वीडियोज में कुरान की आयत 8:39 होती है: 'लड़ो जब तक कि भ्रष्टाचार (बुराई या फितना) खत्म न हो जाए और लड़ों जब तक कि हर तरफ सिर्फ अल्लाह को मानने वाले न हों.'

यह सच है कि जिहाद का एक अर्थ कोशिश करना भी होता है, लेकिन आजकल तो इसका सिर्फ एक ही मतलब समझ लिया गया है : सैन्य रूप से लड़ना.

कुरान में ऐसी बहुत सी आयतें हैं.

आयत 9:14 कहती है : 'उनके खिलाफ लड़ो. तुम्हारे हाथों से अल्लाह उन्हें तबाह कर देगा और लज्जित करेगा, उनके खिलाफ तुम्हारी मदद करेगा, और मुसलमानों की छातियों पर मरहम लगाएगा.'

आयत  2:251 कहती है: 'और अगर अल्लाह लोगों के एक समूह द्वारा दूसरे समूह को रोकेगा नहीं, तो ये पृथ्वी तो शैतानों से ही भर जाएगी.'

कुछ लेखक आयत 2:256 का भी हवाला देते हैं जो कहती है : 'धर्म में कोई मजबूरी नहीं है.'

हालांकि जिहादी तर्क देते हैं कि यह आयत गैर मुसलमानों पर लागू होती है जिन्हें शरिया शासन के तहत रहना चाहिए. पाकिस्तान में रहने वाले एक बर्मी चरमपंथी मुफ्ती अबुजार अजाम का स्पष्टीकरण है कि इस आयत के अनुसार, किसी भी ईसाई, यहूदी या गैर मुसमलान को इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, लेकिन उसकी दलील है कि जब मुसलमान जंग के लिए आगे बढ़ें तो उन्हें सबसे पहले दावा  करना (यानी गैर मुसलमानों को इस्लाम में आने का न्यौता देना) चाहिए, अगर वे इसे कबूल नहीं करते हैं तो फिर लडाई शुरू होनी चाहिए.

कुरान

उसका कहना है कि बेशक मुसलमानों के लिए मजबूरी है और पैगंबर मोहम्मद का हवाला देते हुए वह नमाज पढ़ने की अनिवार्यता बताता है

'अगर आपके बच्चे नमाज पढ़ने लायक दस साल के हो जाएं और नमाज न पढ़ें तो उन्हें पीटो...'

तीसरा तर्क: इस्लाम की आलोचना की गुंजाइश

कट्टरपंथी इस्लाम के आलोचकों को आए दिन इसके समर्थक अपना मुंह बंद रखने को कहते हैं. इन लोगों का कहना है कि इस्लाम एक साथ रहने और बहुलतावाद को बढ़ावा देता है. वे आयत 109:6 का हवाला देते हैं जिसके अनुसार, 'तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म और मेरे लिए मेरा.' लेकिन यह आयत बहुलतावाद को बढ़ावा देने के लिए नहीं थी बल्कि इसका मकसद ये सुनिश्चित करना था कि इस्लामी जीवन शैली का मक्का के गैर मुसलमानों के साथ घालमेल न हो.

पैगंबर मोहम्मद ने मक्का के कुफर (काफिरों) की तरफ से सत्ता साझेदारी के प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया: तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म और मेरे लिए मेरा.

जिहादियों का तर्क है कि सरकार के सभी तंत्र इस्लाम के मुताबिक चलने चाहिए, इसका मतलब है कि इस्लाम ऐसे स्थिति की कल्पना ही नहीं करता जिसमें गैर मुसलमान शक्ति या सत्ता में साझीदार बन सकें. आयत 2:190 कहती है, 'जो भी (सरकार की) इस व्यवस्था के बीच में आता है, उनके खिलाफ किताल (उनका कत्ल) कर दो …' यहां, हमें यह बात दिमाग में रखनी चाहिए कि समस्याएं आयतों की व्याख्या से जुडी हैं.

चौथा तर्क: मस्जिदों पर हमले नहीं हो सकते और इस्लाम में आत्मघाती बम हलमों की इजाजत नहीं है

जिहादी तर्क देते हैं कि पैगंबर ने खुद मक्का में मदीना में मुनफकीन (पाखंडियों) की मस्जिदें ध्वस्त की थीं. आयत 22:40 कहती है कि अल्लाह धर्मस्थलों, चर्चों और सिनेगॉग्स की हिफाजत करता है. लेकिन कट्टरपंथी मौलवी शेख अबु मुंदधीर अल शिनकीती का कहना है कि यह आयत इस्लाम से पहले के दौर पर लागू होती है, चूंकि इस्लाम के जन्म के साथ ईसाई और यहूदी धर्म की वैधता खत्म हो गई इसलिए उनके पूजा स्थलों ने भी संरक्षण का दर्जा खो दिया है.

2013 में तालिबान की एक पत्रिका में आत्मघाती हमलों को उचित ठहराने के लिए कुरान की दो आयतों का हवाला दिया गया था. आयत 29:64 कहती है, 'और इस दुनिया की जिंदगी सिर्फ मस्ती और खेल है! वास्तव में, इसके बाद का घर ही असली जिंदगी है.'

आयत 3:169 कहती है: 'जो लोग अल्लाह के रास्ते में मारे गए हैं उन्हें मरा हुआ मत समझिए. नहीं, वो जीवित है, अपने मालिक के साथ.'

पांचवा तर्क: इस्लाम अल्पसंख्यकों की हिफाजत करता है

हां, इस्लाम अल्पसंख्यकों की हिफाजत करता है, लेकिन इस्लाम का संरक्षण पाने के लिए अल्पसंख्यकों को शरिया शासन में रहना होगा और गैर मुसलमानों पर लगने वालाजजिया  टैक्स चुकाना होगा. दूसरे शब्दों में, गैर मुसलमान शासक नहीं बन सकते. ठीक यही जिहादी कारण है कि पाकिस्तान का संविधान औपचारिक तौर पर गैर मुसलमान पाकिस्तानी नागरिकों को पाकिस्तान का राष्ट्रप्रमुख बनने से रोकता है.

जजिया का यह भी मतलब होता है कि इस्लामी शासन में गैर मुसलमानों को रहने का अधिकार नहीं है इसलिए अगर उन्हें यह अधिकार चाहिए तो सालाना एक टैक्स देना होगा.

इस्लामी मौलवी और आम मुसलमान भी दलील देते हैं कि कुरान शांति की वकालत करता है, बेशक करता है. ऐसी बहुत सी आयतें हैं जो प्रेम, शांति और भाईचारा सिखाती हैं. इस्लाम एक शांतिप्रिय धर्म है और ज्यादातर मुसलमान शांतिप्रिय हैं. लेकिन यह भी सही है कि कुरान में ऐसी बहुत सी आयतें हैं जो गैर मुसलमानों के लिए नफरत और हिंसा को भड़काती हैं. ठीक तरह से समझने के लिए, यह स्वीकार करना जरूरी है कि दुविधा वाली स्थिति है: इस्लाम शांतिपूर्ण है और शांतिपूर्ण नहीं भी है.

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