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अंतरराष्ट्रीय वन दिवस: 'फॉरेस्ट मैन' जिसने बंजर को बनाया घना जंगल

जादव पाएंग को साल 2012 में 'फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया’ का खिताब मिला

Nidhi Nidhi Updated On: Mar 21, 2017 04:10 PM IST

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अंतरराष्ट्रीय वन दिवस: 'फॉरेस्ट मैन' जिसने बंजर को बनाया घना जंगल

21 मार्च को अंतरराष्ट्रीय वन दिवस है. बचपन में जंगल पर कुछ लिखने को दिया जाता था तो सबसे पहले जंगल के चार पर्यायवाची नाम ढूंढते थे. फिर हम भारतवर्ष का गुणगान करते हुए वन को हमारी और कथित परंपराओं से जोड़ते हुए लिखते थे. हमारे घर के सामने से पेड़ धीरे-धीरे कटते चले जा रहे थे और हम जंगल के पांच पर्यायवाची याद कर लेने में ही खुश हुए जा रहे थे.

गलत नहीं कि जंगलों से भारत का कोई रिश्ता नहीं है लेकिन ये भी गलत नहीं है कि हम अपने घरों के आगे बगीचे लगाने तक में ही संतुष्ट हैं. पीपल, केले के पेड़ को पूज लेने भर से खुश हैं. प्रकृति से हमारा रिश्ता अब सिर्फ हमारे घरों की बालकनी के गमलों तक ठिठक कर रह गया है.

हां, बहुत ज्यादा तो हम छुट्टियों में जंगल घूमने जाने लगे हैं और जंगल-जानवर हमारे लिए पिकनिक स्पॉट बनाते गए हैं.

लेकिन हम में से ही कोई एक जो सिर्फ दूर से जंगलों को देख तस्वीरें खींचकर वापस नहीं आ गया. एक व्यक्ति जो पागल है पेड़ लगाने के लिए, जंगल को फिर से बसाने के लिए.

अगर आप असम की यात्रा करेंगे तो देखेंगे, जोरहट से ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे-किनारे एक खास तरह की वन पट्टी. और एक बात जो इन वनों को खास बनाती है वो है कि ये पेड़ यहां प्राकृतिक रूप से नहीं उगे हैं बल्कि इनको लगाया है.

जादव पाएंग जिन्हें साल 2012 में 'फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया’ का खिताब मिला. तो इस फॉरेस्ट डे पर जानते हैं कैसा रहा जादव पाएंग से फॉरेस्ट मैन बनने का सफर

जादव पाएंग: [तस्वीर फेसबुक]

जादव पाएंग: [तस्वीर फेसबुक]
फ़र्स्टपोस्ट: पेड़ लगाने की शुरुआत कैसे हुई? 

जादव: मैंने पेड़ लगाने का काम 1979 में शुरू किया था. माजुली आइलैंड दुनिया का सबसे बड़ा रिवर आइलैंड हैं 1950 से जलवायु परिवर्तन और ब्रह्मपुत्र नदी के तीव्र बहाव के कारण एक तिहाई माजुली आइलैंड की मिट्टी का कटाव हो चुका है.

'माजुली आइलैंड में 1979 की गर्मियों में बहुत ज्यादा ( भीषण ) गर्मी हुई. जिससे बहुत सारे सांप मारे गए. उन सांपों को देख कर मुझे लगा एक दिन इंसान भी इसी तरह से खत्म हो जाएगा. तब मैंने पेड़ लगाने का संकल्प लिया और बांस के बीज लेकर शुरुआत 20 पेड़ों से की.

पहले कुछ सालों में बहुत दिक्कत होती थी बीजों की, पर कुछ सालों में पेड़ तैयार हो गए तो उनके बीज लेकर पेड़ लगाना जारी रखा.

पिछले 48 साल में लगभग 1200 हेक्टेयर में जंगल उगा दिया है. इस समय जंगल में 115 हाथी, 5 बंगाल टाइगर, बहुत सारे गैंडे हैं. इस जंगल का नाम अब जाधव मोलाई पाएंग के नाम से मोलाई सेंचुरी रख दिया गया है.

अब इस जंगल को सबसे ज्यादा खतरा इंसानों से ही है. इंसान अपने फायदे के लिए जंगल काटते जाते हैं. जानवरों को जंगल छोड़ना पड़ता है.

मैं लोगों से हमेशा कहता हूं पेड़ काटने से कुछ नहीं मिलेगा. इंसान हर चीज का उपभोग तब तक करता है जब तक वह पूरी तरह खत्म न हो जाए.

आप अपना परिवार कैसे चलाते हैं?

मेरा परिवार दूध बेचकर रोजी-रोटी चलाता है. हम गायें पालते हैं. घर से भी पूरा सपोर्ट मिलता है. मेरी 1 लड़की और 2 लड़के हैं. अब सभी मिलकर पेड़ लगाते हैं.

जंगल की जरूरत क्या है?

माजुली आइलैंड दुनिया का सबसे बड़ा रिवर आइलैंड है. हर साल मानसून में ब्रह्मपुत्र नदी का बहाव माजुली आइलैंड का कुछ हिस्सा अपने साथ बहा ले जाती है. जमीन घर खेत सब बह जाते हैं. 1950 से जलवायु परिवर्तन और ब्रह्मपुत्र नदी के तीव्र बहाव के कारण एक तिहाई माजुली आइलैंड की मिट्टी का कटाव हो चुका है.

नदियों का कटाव और जलवायु परिवर्तन रोकने का उपाय पेड़ ही हैं.

मैं अपनी आखिरी सांस तक पेड़ लगाता रहूंगा. मेरा सपना है कि माजुली आइलैंड और जोरहाट डिस्ट्रिक फिर से जंगल से हरा भरा हो जाए.

बाहर की दुनिया ने आपके बारे बारे में कब जाना?

साल 2009 में जीतू कलिता, जो कि फोटो जर्नलिस्ट हैं माजुली आइलैंड की यात्रा पर आए. उसी दौरान मुझसे मुलाकात हुई फिर उन्होंने मेरे प्रयास पर लिखा.

अब्दुल कलाम ने खुद मुझे फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया का टाइटल दिया. मैं अब देश विदेश कि विभिन्न इंस्टिट्यूट में अपना अनुभव बांटने जाता हूं.

जादव पाएंग [तस्वीर-निधि]

जादव पाएंग [तस्वीर-निधि]
साल 2012 में दिल्ली के जेएनयू जाने के बाद लोगों ने नोटिस करना शुरू किया. बहुत सारे अवार्ड मिले. अब तो अवार्ड्स से उब होती है. मैं क्या करूंगा अब इतने अवार्ड लेकर. मैं चाहता हूं लोग मेरी बात समझें.

राज्य सरकार से आपकी कोई मांग?

अगर सरकार का कृषि विभाग माजुली आइलैंड और आसपास के इलाके में नारियल के पेड़ लगाए तो भूमि का कटाव भी रुकेगा और आर्थिक दृष्टि से भी फायदा होगा. साथ ही इससे जलवायु परिवर्तन से भी निपटने में सहायता होगी.

आज के बच्चों से क्या उम्मीद करते हैं?

मैं देखता हूं आजकल के किसी भी कॉलेज और स्कूल में पेड़ नहीं दिखते. सिर्फ ऊंची-ऊंची इमारतें दिखतीं हैं. जबकि वहां पर्यावरण पढ़ाया तो जाता लेकिन उसे उपयोग में बिलकुल नहीं लाया जा रहा है.

आजकल के बच्चों को स्कूल में सिर्फ पैसे कमाने और गाड़ियां खरीदने की सीख दी जा रही है. वे बच्चे पढ़-लिखकर सिर्फ बड़े बड़े मकान बनाते हैं लेकिन अपनी जड़ों को भूल रहे हैं.

स्कूल में आज केवल जॉब पाने के लिए ही शिक्षा होती हैं वो केवल पैसे कमाने का सोचते हैं. अपने पर्यावरण से नहीं जुड़ते हैं. अगर बच्चे कोशिश करें तो कुछ ही सालों में देश फिर से हरा भरा हो सकता है. हम अच्छी हवा में सांस ले सकते हैं.

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