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इस्लाम विरोधी शरिया बैंक से सावधान रहे भारत सरकार

अगर भारत शरिया बैंक के फेर में पड़ा तो यहां के मुल्लाओं को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से भी ज्यादा ताकत मिल जाएगी.

Tarek Fatah Updated On: Nov 28, 2016 04:02 PM IST

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इस्लाम विरोधी शरिया बैंक से सावधान रहे भारत सरकार

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने देश में शरिया बैंक खोलने का प्रस्ताव रखा है. इसकी शुरुआत बैंकों में मुसलमानों के लिए अलग खिड़की से किया जाएगा. यह जानकार मुझे बेहद हैरानी हुई.

आरबीआई नें पिछले हफ्ते अपने इस प्रस्ताव की घोषणा की. इसके लिए उसने तर्क दिया कि धार्मिक कारणों से बैंकिंग सेवा का लाभ न उठा पाने वालों के लिए यह कदम उठाया जा रहा है. यहां धार्मिक कारण का आशय कट्टरता से है.  ऐसा करने से इनके वित्तीय व्यवस्था में समावेश की बात कही जा रही है.

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मुझे लगता है कि आरबीआई का यह कदम या तो बेहद बचकाना है या फिर यह मुस्लिम तुष्टिकरण की दिशा में एक और कदम है. लेकिन इससे एक बात तो जाहिर है कि भारत के कट्टर इस्लामिक सोच रखने वाले रिजर्व बैंक की शीर्ष तक घुसपैठ करने में कामयाब हो गए हैं. इससे यह भी साबित हो रहा कि भारतीय मुस्लिम समुदाय के बीच भी इनकी पहुंच बन चुकी है.

एक तरफ तो आप 21वीं सदी में कैशलेस डिजिटल अर्थव्यवस्था तैयार करने की बात करते हैं तो दूसरी तरफ आप भारतीय मुसलमानों को मध्यकालीन दकियानूसी सोच अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. यह विशुद्ध बेवकूफी है.

इसके लिए आप यह समझ लीजिए कि आखिर यह इस्लामिक शरिया बैंकिंग है क्या? जिस व्यवस्था को दुनिया का कोई और मुस्लिम देश अपनाने को तैयार नहीं उसे भारतीय क्यों अपनाना चाह रहे हैं?

शरिया बैंकिंग

इस्लामिक बैंक की नींव 1920 में रखी गई थी. लेकिन इसकी असल शुरुआत 70 के दशक में हुई. भारत में जन्मे जमात-ए-इस्लामी के अबुल-अल-मौदुदी और मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड के हसन-अल-बन्ना इस सोच के जनक माने जाते हैं.

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फोटो: आसिफ खान/फर्स्टपोस्ट हिंदी

दुनिया के मुसलमानों के बीच पश्चिम के खिलाफ जिहाद और जंग की भावना भड़काने में इन दोनो की प्रमुख भूमिका रही है. अपने राजनीतिक मंशा को पूरा करने के लिए इन दोनों बड़े अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की भूमिका पर भी काम किया.

1928 में अपनी स्थापना के बाद से ही मुस्लिम ब्रदरहुड का जोर इस्लामिक अर्थव्यवस्था बनाने पर रहा है. इस तथाकथित व्यवस्था के शुरुआती कानून बन्ना और उनके बाद सयैद कुतुब ने बनाए.

मिलार्ड बर्र और रॉबर्ट कॉलिंस के किताब ‘अल्म्स फॉर जिहाद’ में मुस्लिम ब्रदरहुड की इस योजना का खुलासा किया गया है. मुस्लिम ब्रदरहुड ने अपने वैश्विक संगठन को वित्त पोषित करने के तरीकों पर विचार किया. इसके लिए उसने बाकि दुनिया से मनी मैनेजमेंट सीखने की कोशिश की.

इसका इस्तेमाल सबसे पहले पाकिस्तान में जिया-उल-हक़ ने किया. अमेरिकी मदद से ज़िया ने ज़ुल्फीकार अली भुट्टो के सरकार को सत्ता से बेदखल करते हुए सैनिक शासन कायम किया था. जिया-उल-हक़ ने राष्ट्रपति बनते ही पाकिस्तान में इस्लामिक शरिया कानून लागू कर दिया. यहां के राष्ट्रीकृत बैंकों में इस्लामिक नियमों के मुताबिक ब्याज रहित व्यवस्था जबरन लागू करवायी गई.

मुस्लिम बैंकरों की राय

 

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फोटो: आसिफ खान/फर्स्टपोस्ट हिंदी

मुहम्मद सलीम और तिमूर कुरान दो मुस्लिम बैंकिंग विशेषज्ञ हैं. दोनो अब जाने-माने लेखक हैं. इन दोनों ने ही शरिया बैंकिंग की तीखी आलोचना की है. सलीम ने इस मुसलमानों के साथ धोखा करार दिया है.

तिमूर कुरान ने तो इस बैंकिंग व्यवस्था को धार्मिक गुरुओं की जेब भरने का साधन बताया है. कुरान कहते हैं कि शरिया बैंक मुसलमानों का इस्तेमाल कर इस्लामिक विचारों को थोपने का एक आसान जरिया है.

यह सवाल भारतीयों को खासकर मुसलमानों को उठाना चाहिए कि आखिर भारतीय बैंक ऐसे छलावे को क्यों अपनाना चाहेंगे.

मुहम्मद सलीम पार्क एवेन्यू बैंक न्यू यार्क के प्रेसीडेंट और सीईओ रह चुके हैं. इससे पहले सलीम बैंकर्स ट्रस्ट के वरिष्ठ बैंकर के तौर पर मिडिल ईस्ट विभाग संभाल चुके हैं. सलीम बहरीन के इस्लामिक बैंक के सलाहकार की भूमिका भी निभा चुके हैं.

अपनी किताब इस्लामिक बैंकिंग में इसकी धज्जियां उड़ाते हुए सलीम लिखते हैं कि यह शरिया बैंकिंग 20 लाख 64 हजार करोड़ रुपये के भ्रम के अलावा और कुछ नहीं है. सलीम लिखते हैं,’ इस्लामिक बैंक धोखे और बेइमानी का अड्डा हैं. अपनी तकरीरों से इतर ये सभी ब्याज वसूलते हैं. फर्क इतना है कि इनका ब्याज इस्लाम के नाम पर धर्म का लबादा ओढ़े रहता है.’

सलीम ने अपनी इस किताब में आगे लिखा:

‘शरिया बैंकिंग की वकालत करने वाले कहते हैं कि इस्लाम में  ब्याज लेना मना है. लेकिन इस्लाम धर्म के इतिहास और उसके पहले किए अध्ययनों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं होगा कि कुरान में सूदखोरी की मनाही है, ब्याज लेने की नहीं. नियमों से अधिक और समाज में तय दरों से अधिक ब्याज वसूली को सूदखोरी कह सकते हैं. दूसरे शब्दों में, हद से अधिक ब्याज वसूली और शोषण सूदखोरी कहलाती है.’

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फोटो: आसिफ खान/फर्स्टपोस्ट हिंदी

दूसरा सवाल यह है कि क्या इन बैंकों से मुसलमानों का भला हुआ है? इसके जवाब में सलीम लिखते हैं:

‘ऐसा बिलकुल नहीं हुआ. इन बैंकों से मुसलमानों का भला होने के कोई सबूत नहीं हैं.’

भारत और चीन दुनिया के ऐसे दो देश है जहां गरीबी मिटाने और विकास की गति बढ़ाने में सफलता मिली है. यह सफलता दुनिया के उन सभी मुस्लिम देशों से ज्यादा है जिनके पास भारत और चीन से कहीं ज्यादा संसाधन हैं और इनकी भौगोलिक स्थिति भी बेहतर है.

शरिया बैकिंग से भले ही आम मुसलमानों का कल्याण नहीं हुआ है. इससे मुस्लिम बैंकर, इंवेस्टमेंट बैंकर और ऐसे लोगों का भला हुआ है आम मुसलमानों की कीमत पर मौज उड़ा रहे हैं. मुल्लाओं के लिए तो यह वरदान साबित हुआ है.

उलेमाओं ने बहकाया

इस्लामिक बैंक के कामकाज को नजदीक से देखने वाले सलीम आगे लिखते हैं:

‘इस्लामिक बैंकिंग को स्थापित करने में शरिया उलेमाओं ने बड़ी भूमिका निभाई है. इन उलेमाओं को न तो बैकिंग का कोई अनुभव है, न ही ये अर्थशास्त्री है. इतना ही नहीं कई उलेमाओं को तो इस्लाम के इतिहास की भी जानकारी नहीं है. ऐसे लोग रिबा का गलत मतलब निकालकर ब्याज और सूदखोरी में मुसलमानों को भरमा रहे हैं. ऐसे उलेमा इस्लामिक बैंकों में शरिया सलाहकार की तरह काम कर रहे हैं. यहां ऐसे लेने-देन सर-ए-आम हो रहे हैं जिन्हें गैर-इस्लामिक कहा जा सकता है. इनमें ब्याज तो वसूला जा रहा है लेकिन किसी और नाम पर.’

शरिया बैंकों के बोर्ड में सैकड़ों इस्लामिक उलेमा और इमाम नौकरी कर रहे हैं. इससे एक नए तरह का व्यावसायिक क्षेत्र भी तैयार हुआ है. ये सभी विश्व के अलग-अलग कोने में बने बड़े वित्तीय केंद्रों पर आयोजित सम्मेलनों में मिलते हैं. शरिया बैंकिंग के ये उलेमा एक दूसरे के काम पर चर्चा करते हैं. उसकी तारीफ करते हैं.

पिछले 25 सालों से हर साल ऐसे पांच सम्मेलन होते हैं. ऐसे एक सम्मेलन पर कम-से-कम 13 करोड़ रुपए का खर्च किए जाते हैं. इस तरह शरिया बैकिंग को जीवंत रखने के लिए अब तक 1600 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए जा चुके हैं.

पैसों के भूखे उलेमा

शरिया बैंकों के लिए उलेमा चंद पैसों के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं.  अपने फायदे कि लिए ये कोरे कागज पर भी दस्तखत करने को तैयार रहते हैं.

सलीम ऐसे ही एक वाक्ये को अपनी किताब में साझा करते हैं:

‘लंदन में बैंकों के बीच लेन-देन में लगने वाले ब्याज को LIBOR कहा जाता है. LIBOR के तहत इस एक लेन-देन दौरान एक मजेदार वाक्या सामने आया. मैंने देखा कि एक अरबी बोलने समझने वाला उलेमा सिर्फ अंग्रेजी और उर्दू बोलने-समझने वाले अधिकारी से लेनदेन कर रहा था. इस कठिन अंग्रेजी को उलेमा समझ सकें इसके लिए एक दुभाषिया रखा गया. लेन-देन शरिया के मुताबिक हो इसके लिए प्रस्ताव के प्रावधानों को समझाना मुश्किल भी हो रहा था और कई बार हास्यास्पद भी. इस बुजुर्ग और आंशिक रुप से ऊंचा सुनने वाले शरिया उलेमा को आधुनिक बैंकिंग या अर्थशास्त्र की जानकारी नहीं थी. व्यापारिक सौदे से दूसरे तरह के फायदे वाले लेनदेन कैसे अलग है इसके बारे में शरिया उलेमा अनजान थे. इसके बावजूद बैंक से मोटा पैसा मिलने के लालच में उलेमा महाशय इस सौदे को जल्दी पूरा करने के लिए आतुर दिखे.’

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फोटो: आसिफ खान/फर्स्टपोस्ट हिंदी

शरियत के नाम पर भ्रम

इस्लाम के नाम पर भ्रम फैलाकर बेइमानी की करने का धंधा जोरों पर है. आम मुसलमानों का सामान्य बैंकों से लेनेदेन रोकने के लिए इसे गैर-इस्लामी और गुनाह करार दिया जाता है.

एक मुस्लिम बैंकर पूछते हैं:

शरिया बैंक अन्य बैंकों से अलग कैसे हैं? अगर आप मैक्डॉनल्ड के बर्गर को इस्लामिक बैंक की तरह मक्काडॉनल्ड बर्गर के नाम से बेंचे तो क्या फर्क पड़ता है. बर्गर तो बर्गर ही है.

अपनी मुस्लिम आस्थाओं के चलते शरिया बैंकिंग अपनाने वाले आम मुसलमानों के लिए कनाडा का यूएम फाइनैन्शियल मामला आंखे खोलने वाला होगा. शरिया कानून से चलने वाला यह संस्थान कंगाल घोषित किया जा चुका है.

यूएम फाइनैन्शियल से लोन लेकर घर खरीदने वाले को किसी और बैंक से लोन लेकर घर खरीदना ज्यादा सस्ता पड़ता है. टोरोंटो स्टार के मुताबिक,’ यूएम फाइनैन्शियल के जरिए घर खरीदने वाले को सामान्य बैंक की ब्याज दर से 0.6 प्रतिशत अधिक मासिक रकम अदा करना  पड़ता है.’

इस्लाम के नाम पर चलाए जा रहे इस गोरखधंधे के बेनकाब न किए जाने से मुहम्मद सलीम दुखी हैं. उन्होंने इस बात पर अफसोस जताते हुए कहा,’ हमें इस्लाम विरोधी न दिखते हुए शरिया बैंकों की कमियों और इसके पीछे के अर्थशास्त्र को बेनकाब करने की जरुरत है.’ स्कॉशियाबैंक, RBC, BMO और अन्य वित्तीय संस्थानों के प्रमुखों को अपने इस पूर्व बैंकर की सलाह पर ध्यान देने की जरुरत है.

इस्लाम के खिलाफ शरिया बैंक

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शरिया बैंकिंग को लागू करने के पक्ष में दिए जा रहे तमाम तर्क बकवास हैं. यह कोई इस्लाम धर्म के स्वर्णिम युग का नतीज नहीं है. बिना ठोस कारण, सही तर्क और इस्लाम की भावनाओं को ध्यान में रखे बगैर हम पर थोपा जा रहा है. यह कोशिश भी ज्यादा पुरानी नहीं बल्कि 20वीं सदी में ही शुरु की गई है.

इस्लाम सामाजिक न्याय और बराबरी की वकालत करने वाला धर्म है. इस्लामिक बैंक या फिर इस्लाम के आधार पर चलने वाली कोई अन्य आर्थिक व्यवस्था का दावा करने वालों से मुहम्मद सलीम दो सवाल पूछते हैं.

अपने ग्राहकों के साथ जोखिम साझा न कर और ब्याज ने लेकर क्या इस तरह के बैंक  अपनी अर्थव्यवस्था के साथ न्याय कर रहे हैं?

शरिया बैकिंग के वकालत करने वाले अक्सर अपने बचाव के लिए कुरान की आयतों का सहारा लेते हैं. उनके नजरिए जिस भी लेने देन में ब्याज हो वह गुनाह है. पूरी दुनिया में एक अरब से अधिक मुसलमान हैं. शरिया उलेमाओं को पैसा बनाने के लिए इसका थोड़ा सा हिस्सा ही काफी है.

गरीब जरुरतमंद पर शरिया कानून का पालन करने का दबाव डालना ज्यादती है. इससे इस्लाम में बराबरी की भावना का ही उल्लंघन होगा.

गरीब मुसलमानों को नुकसान

मैं यह इसलिए कह रहा हूं कि शरिया बैंकिंग की वकालत करने वाले इन स्वयंभू उलेमाओं और इमामों के कारण मरते गरीब ही हैं. जिन्हें सही मायनों में पैसे की जरुरत होती है वो इन उलेमाओं की बातों में आकर पैसे देने वाले बैंकों से दूर रहते हैं. जबकि अमीर मुसलमान को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. यहां हम एक बार फिर इस्लाम की भावना से उलट गरीबों को उनकी जरुरत से महरूम किया जा रहा है. जिसे पैसं की जरूरत है उसे शरिया बैंकिंग की वजह से मिल नहीं रहे.

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इस्लामिक बैंक चलाने वाले शरिया के पैरोकार आज अरबपति हैं. जबकि दुनियाभर में मुसलमानों की एक बड़ी आबादी सौ रुपए प्रतिदिन से कम में गुजारा करने को मजबूर है.

कुरान में अरबी शब्द रीबा का अर्थ सूदखोरी होता है. इसके बावजूद कट्टर मुस्लिम इसे लगातार ब्याज से जोड़ देते हैं. इनकी माने तो कार या डीवीडी पर किराया तो लिया जा सकता है लेकिन पैसों पर ब्याज नहीं.

इस्लामपरस्त ब्याज को दूसरे शब्दों में बयां करते हैं. उन्होंने कुछ ऐसे शब्द गढ़े हैं जिनका मुसलमानों से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है.

अरबी भाषा के ये शब्द इस्लामी नजर आते हैं. अब ब्याज को मुदरबा, मुशरका, मुरबहा या इजरा का निकाब कहा जाता है.

भारत सरकार रहे सावधान

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तीमूर कुरान ने अपनी किताब ‘इस्लाम एंड मेमन:दे इकोनामिक प्रेडिक्टामेंट्स ऑफ इस्लामिस्म’ में लिखा: ‘ इस्लाम में जहाज बनाने, सीमा सुरक्षा, महामारी का इलाज या फिर मौसम की भविष्यवाणी करने का कोई तय तरीका नहीं है. शरिया बैंकिंग लागू करने के प्रयासों से इस्लाम को आधुनिकता से दूर रखने की कोशिश की जा रही है. जिससे इस्लामी आतंकवादी को फलने फूलने का अनुकूल महौल मिल रहा है.’

बेहतर यह होगा की भारत सरकार और आरबीआई को शरिया बैंकिंग के बारे में मुस्लिम आलोचकों से और गहराई से समझे. अगर भारत शरिया बैंक के फेर में पड़ा तो यहां के मुल्लाओं को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से भी ज्यादा ताकत मिल जाएगी.

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