S M L

रागदारी: रूह को जगाता भोर का राग 'भैरव'

राग भैरव में फिल्मी गाने भी खूब लोकप्रिय हुए हैं

Shivendra Kumar Singh | Published On: Mar 05, 2017 02:59 PM IST | Updated On: Mar 06, 2017 12:41 PM IST

0
रागदारी: रूह को जगाता भोर का राग 'भैरव'

ऊं श्री अनंत हरि नारायण मंगलम् भगवान विष्णु, मंगलम् गरुणध्वज: मंगलम् पुंडरीकाक्ष: मंगलाय तनो हरि:

इसी श्लोक के साथ पंडित जसराज जी किसी भी राग की शुरुआत करते हैं. सबसे पहले ईश्वर का नमन और फिर सुरों की अनहद यात्रा. पंडित जसराज के मुंह से राग भैरव में ‘मेरो अल्लाह मेहरबान’ सुनते हुए लगता है कि ईश्वर और अल्लाह के नाम पर फसाद करनेवाले कितने नासमझ लोग हैं.

कुछ ऐसा ही अहसास तब होता है जब आप उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली से 'हरि ओम तत्सत' सुनें. वैसे संगीत में ऐसी मिसालें भरी पड़ी हैं. चलिए तो आज राग भैरव की शुरूआत करते हैं पंडित जसराज जी की गायकी से.

राग भैरव की बात चल रही है तो भारत रत्न से सम्मानित शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की याद आ गई. उस्ताद बिस्मिल्लाह खान कहा करते थे, 'सुर महाराज है’, ख़ुदा भी एक है और सुर भी एक है. सुर किसी की बपौती नहीं, ये कर-तब’ है. यानी करोगे तब मिलेगा. पैसा खर्च करोगे तो खत्म हो जायेगा पर सुर को खर्च करके देखिये महाराज...कभी खत्म नहीं होगा. अमां हम इधर उधर की बात नहीं जानते, बस सुर की बात करते हैं.'

सचमुच, वो सिर्फ सुर की बात करते थे. ये किस्सा आज इसलिए याद आ गया क्योंकि बात कहीं से भी शुरू कीजिए, मज़हब से, सियासत से, मुल्क के हालात से, खान साहब घुमा-फिरा कर बात को सुर पर ले आते थे और फिर चमकती आंखों के साथ अचानक कुछ गुनगुनाने लगते, कोई मीठी सी बनारसी धुन...ते नैss ना..ना..नैss....उस वक्त लगता था, जैसे शहनाई उनके गले से बोल रही है.

हर सवाल का जवाब- सुर. हर दलील की काट- सुर. एक बार किसी मौलाना ने समझाने की कोशिश की कि इस्लाम में मौसीकी हराम है, तो राग भैरव में ‘अल्लाह ही अल्लाह, ज़िल्लेशान अल्लाह’ गाकर पूछ लिया- क्या ये हराम है ? मौलाना खामोश हो गए.

ऐसे ही सुरों के औलिया थे शहनाई नवाज़ उस्ताद बिस्मिल्लाह खान. सुर ही खाना, सुर ही पहनना, सुर ही ताना, सुर ही बाना. आप भी सुनिए इस वीडियो को जिसमें खान साहब अजान के साथ इस राग को जोड़कर समझा रहे हैं.

राग भैरव का बेगम अख्तर से भी गहरा रिश्ता है. बताते हैं कि बेगम अख्तर पटियाला घराने के उस्ताद अता मोहम्मद खान से गायकी सीख रही थीं. उस्ताद जी बहुत सख्त थे. सुबह रियाज करने के लिए बेगम अख्तर को रात तीन बजे ही जगा दिया करते थे. बेगम अख्तर उठतीं तो सामने तानपुरा रखा नजर आता. कई बार तो बंद आंख से ही रियाज शुरू हो जाता था. बेगम अख्तर खुद बताती थीं कि वो सुबह का रियाज राग भैरव और शाम का रियाज राग यमन में करती थीं.

राग भैरव में फिल्मी गाने भी खूब लोकप्रिय हुए हैं. आज भी ये गाना कहीं अगर बज रहा हो तो आप खुद बा खुद गुनगुनाने लगते हैं. ये इस गाने की पवित्रता ही है-

1957 में वी. शांताराम की फिल्म दो आंखें बारह हाथ में इस गाने को लता मंगेशकर ने गाया था. गाने के बोल भरत व्यास ने लिखे थे. इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार तो मिला ही था साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इसे काफी कामयाबी मिली थी.

राग भैरव में और भी कई लोकप्रिय गाने बनाए गए. इसमें फ़िल्म ‘जागते रहो’ का ‘जागो मोहन प्यारे’, फ़िल्म ‘बैजू बावरा’ का ‘मोहे भूल गए सांवरिया’ और फ़िल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ का ‘ओ बसंती पवन पागल’ तुरंत ही याद आता है.

ऐसा ही है राग भैरव. मधुर, गंभीर और करुण रस से भरा हुआ. इस राग में ज़्यादातर दर्द भरे गीत ही मिलेंगे. फिल्म बैजू बावरा का ये दर्द भरा गाना सुनिए, जिसे लता मंगेशकर ने गाया है.

राग भैरव के शास्त्रीय पक्ष को भी समझ लेते हैं. राग भैरव की उत्पत्ति भैरव थाट से ही है. इसमें रे और ध कोमल लगते हैं, बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं. कोमल रे और ध को आंदोलित किया जाता है.

ये भोर का राग है, सुबह 4 बजे से 7 बजे तक इसे गाया-बजाया जाता है. सुबह का रियाज़ ज़्यादातर संगीतकार भैरव में ही करते हैं. जिसके बारे में हमने आपको बेगम अख्तर की कहानी सुनाई. आरोह और अवरोह में सातों स्वर लगते हैं इसलिए इस राग की जाति है संपूर्ण.

आरोह- सा रे ग म प ध नि सां अवरोह- सां नि ध प म ग रे सा पकड़- ग म ध s ध s प, ग म रे s रे सा

भैरव में विलंबित ख्याल, द्रुत खयाल, तराना और ध्रुपद गाए जाते हैं, ठुमरी इस राग में नहीं गाई जाती. भैरव बहुत ही प्राचीन राग है. इसके अनेक प्रकार भी हैं- अहीर भैरव, आनंद भैरव, बैरागी भैरव, नट भैरव इत्यादि.

इस राग को और बारीक तरीके से समझा रहे हैं किराना घराने के शास्त्रीय गायक उस्ताद आरिफ अली खान. उन्होंने इस वीडियो में इस राग को समझाने के साथ साथ उस्ताद आमिर खां की राग भैरव में गाई बंदिश भी सुनाई है.

आखिर में इस राग की सबसे बड़ी खूबी. आप किसी भी शास्त्रीय कलाकार से पूछिए, उसकी कला की साधना का वक्त यानि रियाज का वक्त सुबह सुबह ही होता है. गिरिजा देवी से लेकर राजन साजन मिश्रा और छन्नू लाल जैसे दिग्गज कलाकारों के बचपन के किस्सों में सुबह सुबह रियाज करने की कहानी है.

राजन साजन मिश्र जी के पिता जी दोनों भाईयों से कहा करते थे कि भोर का वक्त ऋषि मुनियों का वक्त होता है. ऐसे वक्त में रियाज करते वक्त अगर उन्होंने कलाकार की साधना को सुन लिया तो उसे बहुत आशीर्वाद मिलता है. इसलिए ये बिल्कुल संभव है कि किसी कलाकार का पसंदीदा राग कोई दूसरा हो लेकिन रियाज का सबसे प्रचलित राग भैरव ही है.

( लेखक परिचय: करीब दो दशक से बतौर खेल पत्रकार सक्रिय रहे शिवेंद्र कुमार सिंह शास्त्रीय संगीत पर आधारित वेबसाइट www.raaggiri.com चलाते हैं.)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi