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वो 5 हिंदी फिल्मी गाने जो पाकिस्तान फिल्म इंडस्ट्री ने बेधड़क चुरा लिए

संगीत की उठाईगीरी भारत-पाकिस्तान दोनों तरफ से होती रही है.

Satya Vyas Updated On: Apr 23, 2017 11:24 AM IST

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वो 5 हिंदी फिल्मी गाने जो पाकिस्तान फिल्म इंडस्ट्री ने बेधड़क चुरा लिए

सरहद पार का संगीत अपनी तमाम बंदिशों के बावजूद समृद्ध रहा है. मौसिकी और साज दोनों पर पाकिस्तानी फनकारों की पकड़ इतनी अच्छी रही है कि माहौल या फिल्मी बजट चाहे जैसा भी रहा हो, गीत और धुन बाकमाल ही निकले हैं और बाजदफा प्रेरणा के नाम पर चुरा लिए गए उनके संगीत ने भी इस बात को पुख्ता ही किया है.

सन 60 और 70 के पाकिस्तानी फिल्मी गीतों ने न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि हिंदुस्तान के संगीतकारों के आबोदाना का भी इंतजाम किया है.

तो तय यह रहा कि भारत के फिल्मी संगीतकार बेधड़क, बेखौफ और बेहयाई से पाकिस्तानी संगीत उठाते या यूं कहें उड़ाते रहे हैं. सच भी यही है. मगर ठहरिए साहब! क्या यह खेल एकतरफा है? नहीं.

ताली एक हाथ से नहीं बजती, लड़ाई एकपक्षीय नहीं होती. उसी तरह यह लेन देन का क्रम भी दोनों ओर से होता रहा है. पाकिस्तान भी अपने-अपने हिस्से का संगीत भारत से लेता रहा है.

विभाजन की त्रासदियों में एक त्रासदी फिल्मोद्योग का बंटवारा भी रहा. अपने हिस्से के फनकारों के साथ पाकिस्तान पृथक देश बना. और उसके साथ ही शुरू हुई फिल्मोद्योग स्थापित करने की जद्दोजहद और उसी के साथ शुरू हो गयी सुरों की, धुनों की और कभी-कभी तो बोलों की उठाईगीरी.

01-01-1954 को ‘शर्त’ फिल्म भारत में रिलीज हुई. दीपक और श्यामा अभिनीत इस फिल्म में संगीत हेमंत कुमार का था. इसका एक गीत ‘न चांद होगा न तारे रहेंगे’ काफी मशहूर रहा था और अब समयातीत गीतों में शुमार होता है.

संयोग ऐसा कि इसी साल मगर जून महीने में पाकिस्तान में रिलीज हुई फिल्म ‘सस्सी’ में भी इसी मुखड़े और इसी धुन के साथ राजदुलारी (कौसर परवीन) का गाया गीत प्रदर्शित हुआ.

फिल्म का संगीत जी. ए. चिश्ती ने दिया था जो कि फिल्मी गलियारों में ‘बाबा’ के नाम से इज्जत पाते थे. कहा यह जाता है कि उन्होंने निर्माता जी. सी. आनंद के दबाव पर यह धुन फिल्म में रख ली थी. बचाव में यह भी बातें सामने आती हैं कि यह धुन उन्होंने 1940 मे ही बना ली थी, फिल्म प्रदर्शन में वक्त लगा. जो भी हो, दस्तावेज कहते हैं कि हिंदोस्तानी फिल्म ‘शर्त’ पहले प्रदर्शित हुई थी और पाकिस्तानी फिल्म ‘सस्सी’ उसके बाद.

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इस क्रम में दूसरा और मजेदार गीत फिल्म ‘जागृति’ से है. कवि प्रदीप द्वारा रचित गीत ‘हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के’ गीत इसी फिल्म से है जो कि सन 1954 में ही प्रदर्शित हुई.

मगर इसके ठीक दो साल बाद प्रदर्शित फिल्म पाकिस्तानी फिल्म ‘बेदारी’ (1956) में यही धुन थोड़े से परिवर्तित बोलों के साथ दिखाई दी. दोनों मुल्क तब खुद को सही और सशक्त दिखाने की पुरजोर कोशिश में थे. पाकिस्तानी गीत के मुखड़े में महज देश को मुल्क से बादल दिया गया था.

तीसरा गीत और भी बाकमाल है. जागृति फिल्म के ही ‘साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ को बस ‘ए कायदे आज़म तेरा एहसान है एहसान’ से बदल दिया गया है. मूल वही है. जहां एक ओर गांधी जी कि बात हो रही है वहीं दूसरी ओर कायद-ए-आजम की.

साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल ‘आशा भोसले’ ने गाया है.

अब पाकिस्तानी रूपान्तरण भी सुनें.

जनरल जिया के शासन में आने के बाद पाकिस्तानी फिल्मोद्योग जैसे रसातल में चला गया. लाहौर जो कि फिल्मों का केंद्र था, लगभग बंद होने की कगार पर आ गया. हिंसक पंजाबी फिल्में छिटपुट तौर पर बनती रहीं. सन 80 के उत्तरार्द्ध में हालात सुधरे. पाकिस्तानी पॉप संगीत का दौर आया और उसमें भी हिन्दुस्तानी धुनों से मुतास्सिर काफी धुनें प्रयोग की गईं.

सन 1992 में सुल्तान राही की फिल्म ‘ज़िंदगी’ प्रदर्शित हुई. फिल्म के एक गीत ‘ये जिंदगी के मेले, ये जिंदगी के मेले. दुनिया में कम न होंगे अफसोस हम न होंगे’ काफी मकबूल हुआ. आरिफ लोहार और अताउल्लाह एसाखेल्वी पर इस गीत का फिल्मांकन हुआ था.

जानने वाले यह जानते हैं कि उपरोक्त गीत दिलीप कुमार, नरगिस अभिनीत 1948 की फिल्म ‘मेला’ का शीर्षक गीत था.

धुन विशेष पर अगर नजर डालें तो बोल छोड़कर महज धुन उठा लेने के भी कई उदाहरण मिलते हैं. सन 2001 में हैरिस जयराज के संगीत में आई फिल्म ‘रहना है तेरे दिल में’ के शीर्ष गीत की धुन कुछ यूं थी:

वहीं मीरा और अली हैदर अभिनीत सन 2002 की पाकिस्तानी फिल्म ‘चलो इश्क़ लड़ाएं’ में यह धुन हू-ब-हू उतार ली गई है.

फिल्म संगीत के अलावा प्राइवेट एलबमों के लिए तो इस तरह कि उठाईगिरी के उदाहरण दोनों ही तरफ से बेशुमार हैं. समस्या धुनों, बोलों और सुरों का मिल जाना नहीं है.

प्रसिद्ध हास्य अभिनेता महमूद कहा करते थे कि सात ही तो सुर हैं, उनका टकरा जाना, लड़ जाना, मिल जाना बड़ी बात नहीं है. बड़ी बात यह है कि यदि आपने कोई धुन सचमुच प्रेरणा स्वरूप ली है तो आवश्यक श्रेय तो दें.

यदि इतना भी नहीं बन पाता तो कवि ठीक ही कहा गया है: 'बिगड़ेगी और बनेगी, दुनिया यही रहेगी, होंगे यही झमेले, ये ज़िंदगी के मेले..'

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