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एक दूसरे के खिलाफ नहीं हैं इंसान और जानवरों के अधिकार

लड़ाई मानवाधिकार और जानवरों के हक की नहीं है

Maneka Gandhi Updated On: Jun 07, 2017 10:10 PM IST

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एक दूसरे के खिलाफ नहीं हैं इंसान और जानवरों के अधिकार

कुछ साल पहले फिल्म कथित तौर पर अभिनेता सलमान खान और उनके दोस्त संरक्षित नस्ल के जानवर चिंकारा का शिकार करने गए थे. सलमान ने हिरन के पैर में गोली मारी. जब घायल हिरनी खुद को घसीटते हुए बचने की कोशिश कर रही थी, तो सलमान ने उसका पीछा किया. फिर सलमान ने हिरनी का गला काटकर उसे मार डाला. उसने हिरनी को वहीं पड़ा रहने दिया. कुछ दिन बाद सलमान ने फिर वही किया. अगले दिन फिर यही काम दोहराया. इस बार जानवरों की भलाई के लिए काम करने वाली संस्था के सदस्यों ने सलमान को ऐसा करते हुए देख लिया. इसके बाद सलमान खान पर केस दर्ज हुआ.

सुनवाई के दौरान कई गवाह लापता हो गए. कई गवाहों ने अपने बयान बदल लिए क्योंकि उन्हें सलमान ने अपनी फिल्म में रोल देने का वादा किया था. जिस जुर्म के लिए सलमान खान को 5-7 साल कैद की सजा होनी चाहिए थी, उस जुर्म के एक केस में सलमान को एक साल कैद की सजा हुई. वो जेल से रिहा हुए तो विजेता के तौर पर बाहर निकले और समर्थकों पर कमीज फेंककर खुशी जताई. दूसरे केस में उन्हें पांच साल की सजा हुई. लेकिन सलमान ने केवल 6 दिन जेल में बिताए और हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी.

जमानत मिलने पर सलमान ने मीडिया से दावा किया कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया और उन्हें किसी बात का अफसोस नहीं. मैंने टीवी चैनल पर इस नाइंसाफी को लेकर आवाज उठाई थी. लेकिन सलमान की फिल्मों के निर्माताओं और दूसरे अभिनेताओं ने मेरा विरोध किया था. उन्होंने कहा कि सलमान ने किसी इंसान को नहीं, एक जानवर को मारा था. जानवरों के कोई अधिकार थोड़ी होते हैं.

salman Khan

इसके बाद सलमान खान ने अपनी तेज रफ्तार कार फुटपाथ पर सो रहे कुछ लोगों पर चढ़ाने की करतूत कर डाली. इसमें एक शख्स की मौत हो गई. और कुछ जिंदगी भर के लिए अपाहिज हो गए. सलमान ने अपनी गर्लफ्रैंड की बांह तोड़ डाली थी. उन्होंने अपनी गाड़ी से टक्कर मार कर एक फिल्म के सेट को भी तबाह कर डाला था. सलमान इन मामलों से भी बरी हो गए थे.

इन बातों का जिक्र करके मैं आपका ध्यान जानवरों के अधिकारों की तरफ खींचना चाहती हूं.

सबको है जीने का अधिकार

अधिकार न तो इंसानी होते हैं ना जानवर. वो सार्वभौमिक होते हैं. हमें न उन्हें लेने का अधिकार है और न ही देने का. इस धरती पर जो भी पैदा हुआ है, उसे जीने का अधिकार है.

जानवरों के अधिकारों की बात आते ही उनकी तुलना इंसानों से होने लगती है. मगर अधिकार कोई खिलौने नहीं हैं कि उन्हें किसी एक से छीनकर दूसरे को दे दिया जाए. अधिकार सबके होते हैं. अधिकार कोई केक नहीं कि आपस में बांटने से सबका हिस्सा कम होता जाता है. ये तो वो नेमत है जो बांटने से बढ़ती है. किसी को अधिकार देने से दूसरे का अधिकार छिनता नहीं है. इसीलिए किस्तों में अधिकार बांटने से बेहतर है न कि इकट्ठे ही सबको अधिकार दे दिए जाएं. फराखदिली दिखाई जाए.

जानवरों के अधिकार, इंसानों के हक को चुनौती नहीं देते. वो तो सिर्फ जानवरों के शोषण का विरोध करते हैं. जानवरों को पसंद करने वाले एक शख्स ने 1874 में बच्च के अधिकारों की लड़ाई की शुरुआत की थी. एक और जानवर पसंद करने वाले इंसान ने ही काम के लंबे वक्त का और बाल मजदूरी का विरोध शुरू किया था. मैं खुद एक ऐसी संस्था की प्रमुख हूं जो कालीन उद्योग में बच्चों को शोषण से बचाने के लिए काम करती है. मैंने विकलांगों की ट्रेनिंग और रोजगार के लिए केंद्र की स्थापना की है. साथ ही मैंने बुजुर्गों और भेदभाव के शिकार लोगों की मदद के लिए भी काम किया है.

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ऐसा नहीं है कि जो लोग इंसानों के हक के लिए लड़ते हैं, वो जानवरों के खिलाफ हैं. असल में वो दूसरों की फिक्र करते हैं. उनसे हमदर्दी रखते हैं, इसीलिए वो जानवरों के अधिकारों के लिए भी लड़ते हैं. ऐसे लोग ये मानते हैं कि न तो इंसान से बुरा सलूक होना चाहिए और न ही जानवरों से बेदर्दी दिखानी चाहिए.

इसीलिए यहां सवाल जानवर बनाम इंसान का नहीं है. यहां हमें हमदर्दी और बेदिली के बीच चुनाव करना है. यहां हमें नैतिकता और खुदगर्जी में से एक को चुनना है.

बुनियादी अधिकार सबको बराबरी का है. इंसान और जानवर को बराबर समझने का नहीं, बल्कि दोनों को एक ही नजरिए से देखने का है.

नैतिकता केवल इंसानों तक सीमित नहीं

जैसे हम इंसानों की बराबरी की बात करते हैं, तो जानते हैं कि सब इंसानों को कुदरत ने बराबर नहीं बनाया. मगर कुछ हक सबको बराबर मिलने चाहिए. ठीक यही सोच हमें जानवरों के बारे में रखनी चाहिए. अब जानवरों के हक की तुलना इंसानों से तो की नहीं जा सकती. जानवरों को तो वोटिंग और रोजगार का अधिकार तो दिया नहीं जा सकता.

लेकिन हमें ये जरूर सोचना होगा कि इंसानों की तरह ही जानवर भी इस धरती पर सुकून से रहने के उतने ही हकदार हैं.

जो लोग नैतिकता को सिर्फ इंसानों तक सीमित रखना चाहते हैं, वो वही लोग हैं जो नस्लवाद और लिंगभेद को बढ़ावा देते हैं. ये हमारा गुरूर ही है कि हम इंसानों को ही कुदरती संसाधनों का सबसे बड़ा हकदार मानते हैं. उन्हें ही सम्मान से रहने का हक देने की बात करते हैं.

A girl bathes her buffaloes in a canal at Sabota village

इस धरती पर तमाम जीव हैं. इंसान इन्हीं में से एक है. हम अपनी अक्ल के बूते पर सबसे अच्छे और काबिल होने का दावा करते हैं. लेकिन जरा सोचिए कि नवजात बच्चे, दिमागी रूप से बीमार लोग और अपराधी क्या हाथियों, चिंपैंजी या दूसरे जानवरों से बराबरी का दावा कर सकते हैं

किसी भी जीव की नस्ल की वजह से उससे बुरा बर्ताव अनैतिक है. और ये भेदभाव काबिले बर्दाश्त नहीं. ये ठीक उसी तरह है जैसे लोग नस्ल, जाति या धर्म के नाम पर भेदभाव करते हैं. हम इनकी निंदा करते हैं तो हमें जानवरों से बदसलूकी का भी विरोध करना चाहिए.

सवाल अधिकार नहीं, बराबरी का है. अगर कोई जीव तकलीफ में है और हम उससे हमदर्दी नहीं रखते, तो ये सरासर नाइंसाफी और बेदिली है.

जानवर और इंसान के बीच नैतिक रूप से कोई फर्क नहीं है. नस्ल या रंग या जाति के आधार पर उनमें भेदभाव नहीं किया जा सकता.

हमें शोषण का अधिकार कैसे?

जानवर बेजुबान होते हैं, मगर उन्हें भी जीने का अधिकार है. जैसे तमाम देश अपने अस्तित्व के लिए सजग हैं, वैसे ही जानवरों के भी इलाके हैं. हम ये सोच लें कि जानवरों के पास हमसे कम अक्ल है, इसलिए हम उनसे बदसलूकी कर सकते हैं, तो ये गलत है. इस तरह तो हम ये मान लेंगे कि जो अक्लमंद हैं वो कम अक्ल वालो का शोषण कर सकते हैं. अगर ऐसा नहीं है तो इंसानों को जानवर के शोषण का अधिकार कैसे मिल सकता है?

बुनियादी अधिकार सबके बराबर के ही हैं. फिर वो इंसान हों या जानवर. यूरोपीय यूनियन मानता है कि जानवर भी तकलीफ और आराम महसूस कर सकते हैं. हालांकि इसके लिए किसी कानून की जरूरत नहीं. जिसने भी कुत्ते-बिल्लियों या दूसरे पालतू जानवरों के साथ वक्त बिताया होगा, उसे ये पता है कि जानवर भी तमाम जज्बात समझते हैं, महसूस करते हैं. हमें पता है कि जानवर भी अपने बच्चों की परवरिश करते हैं. उन्हें सिखाते हैं. उन्हें भी खान-पान और भविष्य की फिक्र होती है. उन्हें भी घर की याद सताती है. जानवरों को भी मौत से डर लगता है.

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हम डार्विन का ये सिद्धांत तो मानते हैं कि इंसान और दूसरे जानवर, विकास की एक ही प्रक्रिया की पैदाइश हैं. लेकिन हम जानवरों को बराबरी का हक नहीं देना चाहते. हम दूसरे जानवरों से क़ुदरती रिश्ता तो मानते हैं, मगर उस रिश्ते को निभाने से गुरेज करते हैं.

इंसान के सबसे करीबी कुदरती रिश्तेदार चिंपैंजी हैं. हमारे और उनके डीएनए में महज दो फीसद का फर्क है. तो क्या इससे हमें लैब में उन पर तमाम तरह के तजुर्बों का जुल्म ढाने का अधिकार मिल जाता है? किसी नई दवा को टेस्ट करने के लिए हम चूहों से लेकर सुअर तक को इंसान मानकर उन पर प्रयोग करते हैं. मगर अधिकारों की बात आती है तो हम उन्हें जानवर कहकर दोयम दर्जे का ठहराने लगते हैं.

हमारी बरसों की सोच ऐसी है कि हम सिर्फ इंसानों की फिक्र करते हैं. हमें उनकी चुनौतियां ही दिखाई देती हैं. लेकिन इंसानों की फिक्र को पहली पायदान पर रखकर भी हम न इंसानों की असल मायनों में फिक्र करते है, और न ही जानवरों की. सच्चाई ये है कि इंसानों की भलाई और जानवरों की भलाई में कोई तुलना ही नहीं.

हम शाकाहारी हो जाएं तो दुनिया भर में करोड़ों जानवर जुल्म के शिकार होने से बच जाएं. इससे पानी और ऊर्जा की भी बचत होगी. ऐसा करने से प्रदूषण भी कम होगा. जानवरों से हमदर्दी के लिए हम तब तक तैयार होते हैं, जब तक हम उन्हें खाने की जरूरत न महसूस करें. या फिर उनकी जरूरत वैज्ञानिक तजुर्बों के लिए न हो.

जानवरों के साथ भी हो बेहतर बर्ताव

जानवरों का सम्मान करना, उनके अधिकारों को मानना हमारी जिम्मेदारी है. जानवर न तो संपत्ति हैं और न ही संसाधन. वो हमारी सेवा के लिए नहीं हैं. उनके अधिकार देने के लिए हमे ये समझना होगा कि हम उनके साथ बर्ताव कैसा करते हैं.

लड़ाई मानवाधिकार और जानवरों के हक की नहीं है. ये हमारी जिम्मेदारी है कि हम जानवरों का शोषण न करें. जब भी इंसानों और जानवरों के हित टकराते हैं. तो हमें उन्हें बराबरी के तराजू पर तोलना होगा. अगर हमारी खाने की आदत बदलने से जानवरों की जान बचती है. तो हमें खाने की आदत बदलनी चाहिए. जानवर कोई बहुत बड़े बड़े अधिकार नहीं मानते. वो सिर्फ जीने का अधिकार, और जुल्म से आजादी चाहते हैं. जानवरों को ये अधिकार नहीं देने वालों की सोच बहुत ही छोटी होगी.

Rescued cattle

जैसे हमने गुलामी, जातिवाद और महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ी है. वैसे ही आजादी की हर लड़ाई भेदभाव के खिलाफ होती है. ये हमारी नैतिकता का दायरा बढ़ाती है. जो लोग जानवरों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं, इसमें उनका कोई निजी हित नहीं है. ये सिर्फ नैतिकता की लड़ाई है. महात्मा गांधी, आइंस्टाइन और लियोनार्डो दा विंची, सबने जानवरों से अच्छे बर्ताव की वकालत की थी. दुनिया के लिए यही सबसे अच्छी चीज होगी

जानवरों को अधिकार देने से सिर्फ जानवरों की हिफाजत नहीं होती. ये इस बात का संकेत भी देती है कि दुनिया के लिए सबसे अच्छा क्या है. ये हमें लालच, बेदर्दी और खुदगर्जी जैसी बुरी आदतों से भी बचाता है. इससे हम भुखमरी, बीमारी और कुदरती आपदाओं से भी बचते हैं.

क्या हम एक नई शुरुआत नहीं कर सकते? हम कुदरत के दूसरे जीवों से हमदर्दी का, दोस्ताना रिश्ता नहीं कायम कर सकते हैं? इससे साबित होगा कि खुदगर्ज छोटी सोच, नैतिकता से हमेशा हार जाती है.

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