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होली 2017: बुरा न मानो, गाली तो हमारा कल्चर है

बुरी बात माना जाने वाला गाली-गलौज कभी-कभी सामान्य और हंसी-मजाक कैसे बना जाता है?

Runa Ashish | Published On: Mar 12, 2017 01:03 PM IST | Updated On: Mar 18, 2017 08:59 PM IST

होली 2017: बुरा न मानो, गाली तो हमारा कल्चर है

होली आ गई है. रंगों, होली मिलन, मौज-मस्ती और तरह-तरह के पकवानों के अलावा होली की एक और खास बात है, वो है गाली-गीत. हमारी संस्कृति में शादी-ब्याह, शुभ कामों या होली में गाली-गीत गाने का रिवाज है. तो बुरी बात माना जाने वाला गाली-गलौज कभी-कभी सामान्य और हंसी-मजाक कैसे बना जाता है?

'हम जब भी अपनी ननद, ननदोई या सास और ससुर से मिलते हैं, चाहे वो होली ही क्यों ना हो तो हम अपने घर के करीबी सदस्यों के साथ छेड़छाड़ करते हैं. हमारी संस्कृति में ऐसे ही घर के माहौल को हल्का-फुल्का बनाए रखने के लिए गाली-गीतों को रचा गया है.' ये कहना है रंगकर्मी विभा रानी का.

विभा रानी देश और विदेशों में गाली गीतों को पेश करके इस धरोहर को सम्हालकर रखने की कोशिश कर रही हैं. विभा पिछले दो सालों से गाली-गीतों की संस्कृति पर काम कर रही हैं.

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विभा रानी

वो बताती हैं, 'मैंने मैथिली भाषा के गीतों का संकलन किया है और इसी तरह के और भी भाषा के गीतों की तलाश में रहती हूं.'

विभा आगे बताती हैं कि 'वैसे गाली गीत तो कभी भी गा सकते है लेकिन शादी, मुंडन और छठी के समय में खासतौर पर ये गीत गाए जाते हैं. पहले शादी में परिवार एक-दूसरे को समझने और दूरियां कम करने के लिए ये गाए जाते रहे हैं.

शादियों की है बड़ी दिलचस्प कहानी

विभा शादियों को लेकर बड़ी दिलचस्प बात बताती हैं, 'पुराने समय में सिर्फ दूल्हा या दुल्हन ही एक दूसरे से अंजान नहीं हुआ करते थे, बल्कि दोनों पक्ष के घरवाले भी एक दूसरे से नावाकिफ रहा करते थे. आश्चर्य की बात तो ये है कि अगर घर के किसी सदस्य को गाली गीत में शामिल ना किया जाए तो वो बुरा मानकर खाना नहीं खाता था. इसके पीछे कारण ये कहा जाता था कि क्या वो शख्स वधु पक्ष की नजर में कोई अहमियत नहीं रखता है.'

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विभा कहती हैं कि 'इन गीतों के पीछे माहौल को खुशनुमा बनाने के अलावा कुछ और भी महत्व होता था. शादी के बाद में कई बार नई-नवेली बहू जब नए माहौल में कुछ थकान या घुटन महसूस करने लगे, तो इन्हीं गीतों के सहारे वो अपने मन की भड़ास को अपनी सास और ननद के सामने निकाल देती थी. चूंकि ये सब किसी परंपरा से जुड़ा था और गाने के शक्ल में था तो चाहकर भी सास और ननद कुछ कह नहीं पाती थीं. मुझे बहुत फख्र होता है कि ऐसी परंपराएं हमारे देश में रही हैं, लेकिन दुख है कि इसे आजकल असभ्य बातें मानकर संजोया नहीं जा रहा है.'

गालियों का अलग ही है महत्व

गाली-गीत का क्या महत्व और जगह रही है, ये इन पंक्तियों से पता चलता है.

गारीं मधुर स्वर देहिं सुन्दरि बिंग्य बचन सुनावहीं I

भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहिं II

जेवंत जो बढ्यो अनंदु सो मुख कोटिहूं न परै कह्यों I

अचवांइ दीन्हें पान गवसे बास जहँ जाको रह्यो II

अर्थ: सब सुन्दरी मीठे स्वरों में गालियां देने लगीं और व्यंग्य भरे वचन सुनाने लगीं. देवगण विनोद सुनकर बहुत सुख अनुभव करते हैं ,इसलिए भोजन करने में बड़ी देर लगा रहे हैं. भोजन के समय जो आनंद बढ़ा, वह करोड़ों मुंह से भी नहीं कहा जा सकता. (भोजन कर चुकने पर) सबके हाथ मुँह धुलाकर पान दिए गए. फिर सब लोग जो जहां ठहरे थे, वहां चल दिए. ( पृष्ठ ११३ , राम चरित मानस , गीत प्रेस , गोरखपुर )

विवाह जैसे मंगल उत्सव पर गालियों का आदान-प्रदान का इससे अच्छा उदहारण क्या हो सकता है ?

राम-सीता के विवाह पर भी बाबा तुलसीदास ने लोकाचार में गालियों का उल्लेख किया है.

पंच कवल करि जेवन लागे I गारि गान सुनि अति अनुरागे II

भांति अनेक परे पकवाने I सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने II

अर्थ: सब लोग पंच कौर करके भोजन करने लगे. गाली का गाना सुनकर वे अत्यंत प्रेममग्न हो गए.अनेक तरह के अमृत के समान पकवान परोसे गए, जिसका बखान नहीं हो सकता. (पृष्ठ ३१४, रामचरित मानस, गीता प्रेस)

फिल्में भी नहीं हैं अछूती

आपको 1989 में आई यश चोपड़ा की फिल्म 'चांदनी' का गाना 'मैं ससुराल नहीं जाऊंगी' तो याद होगा ही. वो भी एक तरह का गाली गीत ही है. सिर्फ गाली गीत ही नहीं बल्कि गालियों का साहित्य भी हमारे देश में अपनी एक जगह रखता है.

इतिहासकार और फिल्म निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी का कहना है कि 'मैं हाल ही में एक किताब पढ़ रहा हूं. नाम है 'सेक्शुऐलिटी इन ऐंशियंट इंडिया' जिसे श्रीलंका के लेखक एलएनएल परेरा ने लिखा है. हमारे देश में रथयात्रा जब निकलती थी तो सभी लोग उस समय मिल कर गालियां भी देते थे. कहा जाता है कि कई बार देश के कुछ हिस्से में देवी को भी अपने दिल की बात कहने के लिए बुरा भला कहा जाता था और देवी अपने भक्तों की शिकायतों, उलाहनों और गुस्से से भी खुश हो जाती थीं और उन बातों का बुरा ना मानकर प्यार से आशीर्वाद देती थीं.'

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द्विवेदी आगे बताते हैं कि 'देखा गया है कि जब भी गालियों की बात आती है तो महिला और पुरुष के जननांगों को ही संकेत किया जाता है. इसमें भी कई गालियां ऐसी हैं, जिन्हें हमारे शास्त्रों में अमान्य रिश्ते कहा गया है, उनके बारे में हैं.'

वो आगे बताते हैं कि काशीनाथ रजवाड़े की किताब 'भारतीय विवाह का इतिहास' में भी गालियों के बारे मे ऐसी कई बातें मिलेंगी, जो आपको चौंका देने के लिए काफी है, जिसमें ना सिर्फ पुरुष और स्त्री के जननांग बल्कि जानवरों के जननांगों का गालियों में इस्तेमाल कैसे और कहां होता है, वो जानकारी भी मिलती है.

गालियों के अलग-अलग रूप

एक मराठी लेखिका हैं अ.द. मराठे, जिनकी किताब ‘असभ्य म्हणी आणि वाक्प्रचार’ (असभ्य मुहावरे और इनका इस्तेमाल) में कम से कम 870 ऐसी बातें या वाक्य या शब्द लिखे गए हैं जो गाली या गाली समान हैं.

अगर पाठकों को ये लगता है कि गालियां सिर्फ पुरुष ही देते हैं, तो हम आपको बता दें कि दक्षिण भारत में एक परंपरा के अनुसार महिलाएं खेत में पैदावार अच्छी हो, इसके लिए पुरुष की मूर्ति बनाती हैं उसे गालियां देते हुए और अश्लील गाने गाते हुए खेतों में लेकर जाती हैं और उसकी स्थापना करती हैं.

कहा जाता है कि इस तरह से गाली देना शुभ होता है. कई धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत में नगरवधुओं की उलाहना और गालियां किसी शुभ संकेत की तरह भी मानी जाती रही हैं. कहा तो यहां तक जाता है कि दुनिया की हर भाषा में गालियां दी जाती हैं. चाहे वो अंग्रेजी हो या तुर्की भाषा या फिर इटैलियन.

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