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'होली के दिन क्यों उसे जकड़ के रंग लगाते थे पड़ोस के अंकल'

होली में किसी को भी किसी लड़की की मर्जी के बिना छूकर रंगने की आजादी न है और न होनी चाहिए

FP Staff | Published On: Mar 13, 2017 08:11 AM IST | Updated On: Mar 13, 2017 08:15 AM IST

'होली के दिन क्यों उसे जकड़ के रंग लगाते थे पड़ोस के अंकल'

होली यानी प्रेम-मिलन और रंगो की मस्ती, लेकिन रंगों की इस मस्ती ने ब्रज की होरी को कब होली बना दिया पता ही नही चला.

होरी के लोकगीतों और पकवानों की मस्ती के अलावा होली की एक और परंपरा से मैं 5 साल की उम्र में रु-ब-रु हुई और उसके बाद से आज तक मुझे होली की मस्ती-मजाक और रंग अच्छे नही लगते बल्कि इस त्यौहार के पास आते आते अपने आप को लेकर सतर्क होती जाती हूं.

बचपन की पढ़ी कोई कहानी या घटना ताउम्र हमारे साथ रहती हैं और इसी तरह उम्र के 5वे साल की होली ने मुझे होली की मस्ती और बेफिक्री से हमेशा के लिए दूर कर दिया.

मैंने तो किताबों में पढ़ा था कि होली, बड़ों के पैरों पर अबीर चढ़ाकर, आशिर्वाद लेने और छोटो के गालों पर रंग लगाकर, ठिठोली करके मनाई जाती है. लेकिन मेरे लिए होली ऐसी नहीं थी.

होली के दिन अंकल से रंग लगवाना मुझे पसंद नहीं

बचपन में जैसे-जैसे होली के दिन पास आते थे. मैं कमरे में बंद होकर पढ़ाई करने का ढोंग शुरू कर देती थी, ताकि होली के दिन भी लोगों को यही लगे कि पढ़ाई कर रही है.

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(फोटो: पीटीआई)

लेकिन होली के दिन तो पड़ोस के अंकल, मम्मी-पापा से कहते 'अरे होली के दिन कैसी पढ़ाई? बिटिया को रंग लगाए बिना होली कहां पूरी होगी, बुलाइए उसे'  और बदले में मम्मी-पापा को भी लगता कि 10 मिनट नहीं पढ़ेगी तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा लिहाजा वो जोर से चिल्लाते 'अरे गुड़िया बाहर क्यों नहीं आती अकंल से होली मिलो.'

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मम्मी-पापा के डर से मैं बाहर आती और अंकल जोर से अपनी बाहों में जकड़ लेते थे, पूरे शरीर को छूते हुए रंग लगाते रहते और मम्मी-पापा उसे उनका दुलार समझ के हंसते रहते. 5 साल की उम्र में जब अंकल ने पहली बार ऐसे होली मिली तब से लेकर हर बार अंकल होली मिलने आते थे और हर बार मुझे 10 मिनिट का होली-मिलन साल भर तक उस गंदे छुअन का एहसास कराता रहता.

अंकल कस के पकड़ कर रंग क्यों लगाते हैं

जब मैंने बार-बार हर साल ये सब महसूस किया तो 8 साल की उम्र में मम्मी से चुपके से रसोई में जाकर कह डाला. 'मम्मी अंकल मुझे पसंद नहीं वो बहुत जोर से पकड़ के रंग लगाते हैं. 'मम्मी हंसी और बोली 'अरे गुड़िया ये तो अंकल का प्यार है जो वो जताते हैं, जैसे पापा प्यार करते हैं वैसे ही अंकल भी प्यार जताते हैं.'

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इतना बोल के मां चली गई. मैं मम्मी को समझा ही नहीं पाई कि पापा के गोद में खेलने और अंकल के पकड़ने में क्या अंतर होता था. मेरा सवाल फिर बेकार हुआ और अगले साल फिर होली आई. होली पर मेरा कोई बहाना नही माना जाता मेरे अंदर होली के नाम का डर बड़ा होता गया. हर साल बस अंकल के होली पर न आने की दुआएं करती रहती.

जब अंकल को रंग लगाने से मना कर दिया

हर साल उस गंदे छुअन वाली होली को झेलते-झेलते जब 12 साल की उम्र में थोड़ी हिम्मत कर अंकल को रंग लगाने से मना किया तो मम्मी पापा बहुत गुस्सा हुए. मेरे इंकार को बदतमीजी कहा गया और अंकल से सॉरी भी बोलना पड़ा.

लेकिन उस साल मैंने डांट खाई सॉरी बोली लेकिन रंग नही लगवाया. अफसोस यही था अंकल के टच को मैं महसूस कर रही थी लेकिन समझा नही पाती थी. समझाती तो तब,जब मैं खुद समझ पाती. लेकिन बस इतना पता था कि ये गलत था जिसको रोकने और बचने के लिए बहाने ढूंढना उस कच्ची उम्र में मेरा सबसे बड़ा काम बन गया था.

काश मम्मी पापा समझ पाते

आज मुझे गुड टच बेड टच सब पता है मैं किसी बच्चे के इंकार को समझ सकती हूं. लेकिन उस उम्र में कुछ नही पता था और मम्मी मुझे न समझती थी न समझाती थी.

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8 सालों तक अंकल के उस पकड़ कर पूरे देह को छूते हुए रंग लगाने की होली खेलने के बाद अब आज भी जब होली का त्यौहार आता है. तो अपनी जिंदगी की 8 सालों की होली बाकी सभी सामान्य त्योहारों पर हावी हो जाती है. और इसीलिए आज तक मैं होली के उत्साह, रंग और मस्ती को अपना नहीं पाई. सब से बस यही कहती हूं कि मुझे होली खेलना पसंद नही हैं.

इसीलिए मुझे होली पसंद नहीं

नंदगांव के कृष्ण की अठखेलियों और बरसाने की शर्मीली राधा और उनकी सखियों की होरी में भी शरारत होती थी लेकिन कोई गंदगी नहीं थी होरी का मतलब सिर्फ अपनी प्रेमिका को अपने रंग में रंगना होता था.

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अब जो होली खेली जाती है, अब उसमें भंग और ठंडाई की मस्ती नहीं शराब और गांजे का बेसुध नशा होता है. जहां लड़कियों को जबरदस्ती पकड़ कर कही भी छूने और रंग लगाने की आजादी होती है. और इसीलिए मैं खुल कर कह सकती हूूं कि ऐसी होली मुझे आज भी पसंद नही.

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होली का मतलब छूने की आजादी नहीं

होली मिलने का मतलब जोर से पकड़कर रंग लगाना नहीं होता. कोमल मन की बच्चियां जिन्हें दुनियारी की समझ नही हैं लेकिन अगर उन्हें इस छूने वाली होली से परहेज है , तो मां-बाप को खुदपनी बच्चियों को ये आजादी देनी चाहिए कि वो रंग लगवाने से साफ मना कर पाएं और उनकी इस मनाही को किसी भी लिहाज से बदतमीजी न समझा जाएं.

होली में किसी को भी किसी लड़की की मर्जी के बिना छूकर रंगने की आजादी न है और न होनी चाहिए.

(यह एक लड़की की आपबीती और सोच है- निजता के लिए हम उनका नाम नहीं बता रहे. तस्वीरें केवल प्रतीकात्मक हैं)

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