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इस देश में अंग्रेजी जुबान नहीं, क्लास है क्लास...

इंग्लिश इज आ फन्नी लैंगुएज. नहीं बोलनी हमें.

Ankita Virmani Updated On: May 21, 2017 03:26 PM IST

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इस देश में अंग्रेजी जुबान नहीं, क्लास है क्लास...

हिंदी मीडियम पर्दे पर आई और अंग्रेजी ना बोलने वालों का दर्द एक बार फिर ताजा हो गया. अंग्रेजी का पता नहीं ये कौन सा साया है जो देश पर छाया है. हिंदुस्तान में रहो... अंग्रेजी ना आना पाप है पर हिंदी ना आना स्टाइल है, क्लास है.

हमारी वाली जेनरेशन यानी 1990 तक पैदा होने वाली जेनरेशन तक तो फिर भी ठीक था पर ये एकदम नई वाली पीढ़ी तो तौबा रे तौबा. पैदा होते नहीं और अंग्रेजी शुरू हो जाती है. 'मॉमी आई वान्ट, रेड बीन्स विद लिटल आॅफ टोमैटो इन द करी अलॉन्ग विद ब्राउन राइस, एंड नो गार्लिक प्लीज'. अरे सीधा राजमा चावल खाना है बोलने में क्या दिक्क्त है?

खाना हिंदुस्तानी है पर अंग्रेजी नखरों के साथ.

दफ्तर हो, घर परिवार हो या कोई महफिल ये फालतू अंग्रेजी में टर-टर करने वाले हर जगह मिल जाते हैं. और मजा तब आता है जब अंग्रेजी की टांग तोड़कर उनको जवाब देने वाला मिल जाता है.

अपना तो सीधा हिसाब है तनु वेड्स मनु फिल्म के पप्पी जी वाला. वो ही जवाब मेरी जुबान पर आता है, 'यू आर अ गुड क्योशचन बट योर क्योशचन हर्ट मी.'

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स्कूल में एडमिशन हो या यूपीएससी का एग्जाम अंगेजी में पटर-पटर करना आना जरूरी है. अरे भईया हमें नहीं आती अंग्रेजी पर इसके अलावा हमें और बहुत कुछ आता है. जरा जानने की कोशिश तो करो.

और सच बताऊं अंग्रेजी बोलना इतना आसान भी नहीं. सिर्फ जुबान अंग्रेजी होने से कुछ नहीं होगा. आपकी चाल, आपकी ढाल, आपका पहनावा, आपके नखरे, आपकी नजाकत सब अंग्रेजी होना जरूरी है.

खांसी या छींक भी आए तो थोड़ा अंग्रेजी. बिल्कुल बच्चन साहब के उस डायॅलाग क तरह आई कैन टॉक इंग्लिश, आई कैन वॉक इंग्लिश एंड आई कैन लाफ इंग्लिश.

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ऐसा नहीं कि छींके तो बहाड़ से सब के उपर फैल गए. मुंह पर थोड़ा हाथ रखिए और नजाकत से कहिए- एक्सक्यूज मी.

एक और मजे की बात बताऊं. अंग्रेजी में पटर-पटर करने वाली लड़कियां लडकों को बहुत अच्छी लगती है, भले खुद को अंग्रेजी समझ ना आए. तुरंत दिमाग में ख्याल पकने लगते है कि मैं ना सही मेरे बच्चे तो अंग्रेजी बोलेंगे.

अंग्रेजी का ये सारा स्यापा बच्चे के बचपन से ही शुरू हो जाता है. अब मान लीजिए बच्चे के मां-बाप तंग हालात की वजह से अंग्रेजी स्कूल में नहीं पढ़ पाए. पर उन्हें भी हिंदी मीडियम के इरफान खान की तरह ख्याल आया कि बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाएंगे तो बच्चा क्लास का हिस्सा बनेगा. बड़ी हिम्मत जुटाई और बस इसी सोच के साथ बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में लेकर पहुंच गए एडमिशन के लिए.

अब बड़ी मुसीबत फंसी- स्कूल में मां बाप का इंटरव्यू. अरे भाई, पढ़ाना मां बाप को है या बच्चे को?

चलो किसी तरह घिसट पिसट, घूस पूस देकर एडमिशन हो भी गया तो नई मुसीबत आती है अंग्रेजी के एग्जाम और नंबर की.

अंग्रेजी में 5 नंबर कम आ जाए तो टीचर और घरवाले ऐसे घूर के देखते हैं मानो धरती फट गई. पर हिंदी में तुम 100 में से 101 ले आओ किसी को कोई मतलब नहीं. पर मेरे भाई कोई ये तो बताओ कि हिंदी में बुराई क्या है?

अक्षय कुमार की नमस्ते लंदन याद है आपको? अरे भाई आती भी है अंग्रेजी तो ना बोलना हमारी चॉइस हो सकती है.

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इंग्लिश इज अ फन्नी लैंगुएज. नहीं बोलनी हमें. आती भी है तो भी नहीं बोलनी. फ्रांस चले जाइए और किसी से अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में ही कोई सवाल पूछिए. जवाब वो फ्रेंच में ही देगा क्योंकि उसे अपनी मातृभाषा बोलने में कोई शर्म नहीं और वो इसे बोलते हुए गर्व महसूस करता है.

पर आप हिंदुस्तानी हैं. कोई अंग्रेज बड़ी कोशिश करके हिंदी में भी सवाल पूछेगा तो आप अंग्रेजी की मम्मी-पापा करके उसे अंग्रेजी में ही जवाब देंगे.

अरे मेरे भाई, जब आप ही अपनी मातृभाषा का सम्मान नहीं करेंगे तो और कोई क्यों करेगा. गर्व कीजिए अपनी भाषा पर.

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