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उर्दू के ‘उस’ ज़ुल्म की याद मत दिलाइए, गुलज़ार साहब!

हिंदुस्तानियों की लंबी फेहरिस्त है जो उर्दू के लाडले हैं. उर्दू इनकी है, इनकी ही रहे दीजिए.

Nazim Naqvi | Published On: Feb 18, 2017 04:46 PM IST | Updated On: Feb 18, 2017 04:49 PM IST

उर्दू के ‘उस’ ज़ुल्म की याद मत दिलाइए, गुलज़ार साहब!

ये क्या कह दिया आपने गुलज़ार साहब, उर्दू अगर इतिहास में पहली बार खुद पर शर्मिंदा हुई थी तो इसी बात पर कि उसको उन लोगों पर थोप दिया गया जो उससे नावाकिफ (अनभिग्य) थे.

नहीं गुलज़ार साहब, सच तो ये है कि, पकिस्तान उर्दू का मुल्क नहीं, उर्दू का हथियाया हुआ मुल्क है. अगर आज की ज़बान में कहा जाय तो गुंडागर्दी करके हथियाया हुआ मुल्क है.

वैसे तो, हम तमाम उर्दू या हिंदुस्तानी बोलने, पढ़ने और लिखने वालों के लिए ये मौका बहुत खुशियों से लबरेज मौका था कि उर्दू का एक आशिक़ ‘जश्न-ए-रेख्ता’ का दीया रोशन करके उसके तीसरे आयोजन की शुरुआत कर रहा था. वो आशिक जिसका नाम है समपूरन सिंह कालरा लेकिन जिसे दुनिया, गुलज़ार कहकर पुकारती है, प्यार करती है.

जश्ने रेख्ता यानी उर्दू का जश्न

17 फरवरी को दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद में ‘जश्ने रेख्ता’ के तीसरे समारोह की शुरुआत उसी मुहब्बत और ख़ुलूस के साथ हुई जिसके लिए ‘जश्ने रेख्ता’ देश और दुनिया में मकबूल है.

संजीव सर्राफ जो ‘रेख्ता-संगठन’ के बानी हैं, उनकी शान में कसीदे पढ़े गए. गुलज़ार साहब ने तो यहां तक कहा और शायद सही कहा कि 'उर्दू ज़बान के हवाले से हमें, मीर, ग़ालिब और संजीव सर्राफ का शुक्रगुजार होना चाहिए.' हम तमाम हिंदुस्तानी सर्राफ साहब के आशिक हैं कि जिस लगन और मेहनत से वो उर्दू ज़बान की हिफाज़त कर रहे हैं.

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अपनी स्वागतीय तक़रीर में गुलज़ार साहब ने उर्दू के हवाले से कई बातें कीं, मसलन उर्दू एक तहजीब एक कल्चर का नाम है, गरीबी में नवाबी का मज़ा देती है उर्दू, लेकिन जब वो इसके विस्तार पर नज़र डालते हुए ये कह बैठे कि 'ये पैदा यहां (हिंदुस्तान में) जरूर हुई, मगर फैलाव देखिये इस ज़बान का, कि जिसके पास वतन नहीं था, कोई सूबा नहीं था, आज उसके पास एक वतन है, पूरा मुल्क है, जिसका नाम पकिस्तान है.' तो लगा उन्होंने पुराने ज़ख्मों पे नमक फेर दिया.

यकीनन उनके सामने वो मंज़र नहीं रहा होगा जिसे इतिहास में ‘cultural genocide’ (सांस्कृतिक-संहार) के नाम से याद किया जाता है. जिसे ज़बरदस्ती, उर्दू के नाम पर किया गया.

कहां की उर्दू, कहां का पाकिस्तान

सच तो ये है गुलज़ार साहब कि पकिस्तान कभी पकिस्तान नहीं बन पाया क्योंकि उस पर ज़बान का हमला किया गया. लियाक़त अली जिसे पकिस्तान के गली-कूचों तक का इल्म नहीं था, इसी उर्दू का नाम लेकर उन इलाकों का प्रधानमंत्री बन गया, और जिन्ना, जिसे उर्दू नहीं आती थी, इन उर्दू बोलने वालों ने उन्हें अपना कायद-ए-आज़म बना लिया.

होना क्या चाहिए था लेकिन हो क्या गया, जनसंख्या की बुनियाद पर राजधानी बननी तो चाहिए थी ढाका (अगर ऐसा हुआ होता तो शायद पूर्वी पकिस्तान की ये हालत न होती) मगर बना दिया गया राजधानी कराची को.

कराची में उस वक़्त कई ज़बानें बोली जाती थीं. सिंधी, गुजराती, बलोची, थोड़ी-बहुत कोंकणी और मेमनी, लेकिन मुख्य ज़बान, सिंधी और गुजराती थी. जब कराची राजधानी बनी, तो वहां के रहने वालों को इसकी खबर तक न हुई, वैसे ही जैसे इनको पकिस्तान बनने की खबर भी नहीं हुई थी. न ही इनकी रजामंदी उसमें शामिल थी.

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विभाजन के बाद अचानक, उत्तर प्रदेश, सेन्ट्रल प्रोविंस, बिहार, हैदराबाद दक्कन और उड़ीसा में रहने वाले मुस्लिम लीगियों को संदेश दिया गया कि वो जाकर कराची में बस जाएं, जनरल मुशर्रफ के बाप भी इन्हीं संदेशों पर दिल्ली से कराची गए थे.

इन्हीं लोगों ने कराची पहुंचकर, उसे पकिस्तान की राजधानी घोषित कर दिया. एलान हुआ कि अबसे पकिस्तान की ज़बान उर्दू होगी. अचानक कराची में सदियों से रहने वाले अनपढ़ हो गए. एक ही रात में. उर्दू न उनको लिखनी आती थी, न बोलनी.

ये हिंदुस्तान के इन्हीं इलाकों से गए हुए लोगों की एक सोची समझी साजिश थी. इसका नतीजा ये हुआ गुलजार साहब, कि जो इंडिया से गए थे वो सब बड़े-बड़े ओहदों पर लग गए, कोई चीफ सेक्रेट्री तो कोई होम सेक्रेट्री.

हैदराबाद (पाकिस्तान), मीरपुर ख़ास, सख्खर जैसे सिंधी बोलने वाले बड़े-बड़े शहर, यहां तक कि सेवण का इलाका, जहां अभी कुछ दिन पहले ही, लाल शाह की मजार पर, धमाका हुआ है, इन सबका एडमिनिस्ट्रेशन, उर्दू बोलने वालों के हाथों में आ गया. सिंधी ज़बान के सारे स्कूलों को उर्दू मीडियम स्कूल बना दिया गया.

जबरदस्ती थोपी गई भाषा

उधर, बंगाल में जो बिहारी मुसलमान पहुंचे, उनके सामने एक अजीब मजबूरी थी, कि बंगाली बोलने वालों से उर्दू कैसे बुलवाई जाए, ये नामुमकिन सी बात थी. इसलिए वहां एलान हुआ कि ‘ज़बान तो यहां की बंगाली ही रहेगी लेकिन उसका रस्मुल-ख़त (लिपि), उर्दू होगा. ज़ाहिर है बंगालियों के लिए ये बर्दाश्त करना मुश्किल था. 1952 में, ये एलान होते ही वहां, भाषाई-हिंसा शुरू हो गयी, कई सौ बांग्लादेशी, ढाका में मारे गए.

विडंबना देखिए कि भड़की हुई इस हिंसा को थामने के लिए जिन्ना साहब जब ढाका पहुंचे, तो उन्होंने अंग्रेजी में तक़रीर करके, उस एलान का समर्थन किया कि 'अब तुम्हारी ज़बान, उर्दू होगी.' उसी जलसे में पहली दफा शेख मुजीब ने जिन्ना के खिलाफ़ नारे लगाए थे.

इतना ही नहीं गुलज़ार साहब, हर साल 8 जनवरी को संयुक्त राष्ट्र का जो ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृ-भाषा दिवस’ मनाया जाता है उसमें उन बांग्लाभाषी मुसलामानों को श्रद्धांजलि दी जाती है जिन्हें पाकिस्तानी उर्दूभाषी पुलिस ने बेरहमी से मारा था, जो ज़्यादातर बिहार से गए हुए लोग थे.

ये है सारा वो किस्सा जिसे नज़रंदाज़ करके, पकिस्तान को उर्दू का वतन कहा जाता है और जिसे आपने बड़े फख्र के साथ बयान किया. मेरा यकीन है कि दिलों की ज़बान उर्दू उस दिन बहुत रोई होगी.

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और फिर गुलज़ार साहब, जो जहां पैदा होता है वही उसका वतन होता है. क्या ज़रूरत है पकिस्तान को उर्दू का वतन कहने की. वहां के लोग उर्दू बोलते हैं, उर्दू लिखते हैं, तो अच्छी बात है ये, लेकिन उर्दू का वतन तो हिंदुस्तान ही रहेगा.

गोपीचंद नारंग, शीन काफ निजाम, गुलज़ार, संजीव सर्राफ, फ़िराक, चकबस्त, प्रेमचंद, कृश्नचंदर, ये कुछ नाम हैं उन हिन्दुस्तानियों की लम्बी फेहरिस्त से, जिन्हें उर्दू के लाडलों में गिना जा सकता है. उर्दू इनकी है, इनकी ही रहे दीजिए, इसका घर यही है.

उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं दाग़ सारे जहाँ में शोर हमारी ज़बां का है - दाग़ देहलवी

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