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इंटरनेट के जमाने में हर कोई लेखक बन गया है: गोपालदास ‘नीरज’

4 जनवरी को 93 साल के हो रहे नीरज का फिल्मी सफर बेशक छोटा सा रहा हो, लेकिन वे आज भी सबसे चर्चित कवियों में हैं.

Atul Sinha | Published On: Jan 04, 2017 07:58 AM IST | Updated On: Jan 04, 2017 07:59 AM IST

इंटरनेट के जमाने में हर कोई लेखक बन गया है: गोपालदास ‘नीरज’

आज की नई पीढ़ी भले ही गोपालदास नीरज को न जाने, लेकिन उनके गीतों को आज भी गुनगुनाती जरूर है.

चाहे वो मेरा नाम जोकर के गीत हों, गैम्बलर, प्रेम पुजारी या शर्मीली के गाने हों या फिर उनका सबसे पहला और लोकप्रिय गाना ‘कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे’…

इस 4 जनवरी को 93 साल के हो रहे नीरज का फिल्मी सफर बेशक छोटा सा रहा हो, लेकिन वे आज भी सबसे चर्चित और सक्रिय कवियों में हैं. उन्होंने खूब लिखा और अब भी लगातार लिख रहे हैं.

वे कहते हैं, ‘अगर सक्रिय न रहूं, लिखना पढ़ना बंद कर दूं, मंच पर न जाऊं तो एक दिन भी जी नहीं पाउंगा. इसी से मुझे ऊर्जा मिलती है.‘

 gopal das neeraj

जाड़े की गुनगुनी धूप सेंकते हुए अपने घर के बरामदे में नीरज जी बातें करते हैं तो अतीत में चले जाते हैं और फिर एकदम से लौट कर मौजूदा दौर के लेखन से लेकर सियासत, समाज और रिश्तों की बात करने लगते हैं.

हर मुद्दे पर कहने के लिए उनके पास बहुत कुछ है. उनसे हुई लंबी बातचीत के कुछ हिस्से:

आज जिस तरह के गीत लिखे जा रहे हैं, आपको कैसे लगते हैं... कोई कवि और गीतकार जो आपको पसंद आता हो?

मैं आम तौर पर सुनता ही नहीं. फिल्में देखता नहीं. फिर भी मुझे लगता है कि प्रसून जोशी और कुमार विश्वास अच्छा लिख रहे हैं. गुलजार तो बढ़िया लिखते ही हैं. वैसे नाम गिनाना मुश्किल है.

मेरे पास बहुत सी कविता की किताबें आती हैं, लेकिन उन्हें मैं देखता तक नहीं. कवि आज हजारों हो गए लेकिन इन्होंने कविता को अलोकप्रिय कर दिया. जब ये नहीं बिकते तो हमारे पास आते हैं.

कविता तो वो है जो आपके हृदय को छुए, आपके संस्कार को छुए... सिर्फ बौद्धिक व्यायाम से कविता नहीं बनती. ऐसी कविता वही लोग लिखते हैं, वही समझते हैं. हमलोग तो भाई कभी इतने विद्वान हुए नहीं. इस वजह से हमको तो लोगों ने कवि सम्मेलनों का कवि कह दिया. लेकिन डिमांड हर जगह हमारी ही होती है.

पहले देश और समाज का माहौल कुछ और था, आज कुछ और है. पहले इंकलाबी कविताएं लिखी जाती थीं, लेकिन आज हास्य व्यंग्य ज्यादा लिखा जाता है.

कविता की हमेशा तीन धाराएं रही है: हास्य व्यंग्य की धारा, इंकलाबी कविताओं की धारा और गेय कविताओं यानी गीतों की धारा.

हास्य व्यंग्य लोकप्रिय इसलिए है क्योंकि समाज में जब भी विकृति होती है, असंतोष होता है, बेईमानी होती है लोग इसे सुनना चाहते हैं.

आज सारा देश बेईमान हो गया है, विकृतियां आ गई हैं, विद्रूपताएं हैं, लोगों में जबरदस्त आसंतोष है, व्यवस्था के प्रति, सामाजिक स्थितियों और टूटते रिश्तों, जीवन मूल्यों के प्रति.... तो लोग ऐसी कविताएं सुनना चाहते हैं, हास्य व्यंग्य की ये धारा इसलिए बहुत प्रचलित हैं.

नई कविताओं के नाम पर होने वाले प्रयोग चलेंगे या नहीं?

कैसे चल सकते हैं. गीतों को सुनने के लिए आज भी हजारों लाखों लोग इकट्ठे हो जाते हैं. कविताएं कितने लोग सुनते हैं.

अज्ञेय ने नई कविता आंदोलन शुरू किया था न... क्या हुआ उसका... गीत सदियों से चलते आ रहे हैं, गीत ही चलेंगे और सुने जाएंगे.

हिंदुस्तान में बिना गीत के फिल्म नहीं चलती, यहां हवा गाती है, नदियां गाती हैं, फूल गाते हैं, झरने गा रहे हैं. हर जगह गेयता है. इस वजह से यहां गीत ही हमेशा रहेगा.

आपने इतने दौर देखे. आजादी के बहुत पहले से लेकर आज तक. गांधी जी, भगत सिंह, नेहरू, इंदिरा जी से लेकर अब नरेंद्र मोदी तक... क्या फर्क लगता है?

बहुत फर्क है. नेहरू जी अब तक के सबसे बेहतर प्रधानमंत्री थे. सबने अपने अपने तरीके से देश के लिए काम तो किया है.

मोदी जी भी अच्छा करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन जिस तरह बिना सोचे समझे फैसले लेने से कैसे भ्रष्टाचार हटेगा. बेचारी लाइन में लगी जनता का क्या कसूर है. भ्रष्टाचार तो तो हर आदमी के रग-रग में समा चुका है.

gopal das neeraj

आज के दौर के लेखन को आप कैसे देखते हैं. पहले और अब में कितना फर्क महसूस करते हैं?

लिखा तो बहुत कुछ जा रहा है, लेकिन आज किसी के पास वक्त नहीं है. हर आदमी भाग रहा है, रोजी रोटी के लिए, कामकाज के लिए और जीवन की जरूरतों के लिए.

ऐसे में अच्छी रचना नहीं लिखी जाती, अच्छा गीत नहीं रचा जा सकता. पहले कुछ भी लिखने के पहले कई कई बार सोचा जाता था, एक एक शब्द का चुनाव बेहद सोच समझ कर किया जाता था लेकिन अब बहुत कुछ यूं ही लिख दिया जाता है.

गलत नहीं है यह भी. शायद समय के साथ साथ लिखने का यह तरीका भी जरूरी हो लेकिन आज लेखन में मौलिकता की कमी लगती है. इंटरनेट और मोबाइल के जमाने में तो आज हर कोई लेखक बन गया है. अच्छा है, लेकिन कुछ स्तरीय हो तो ज्यादा बेहतर होता.

आज कविता की क्या स्थिति है? गीत और कविता के बीच का फासला पहले से बढ़ा है या कम हुआ है?

देखिए गीत आज कम होता जा रहा है लेकिन गीत कभी मरेगा नहीं क्योंकि गीत का संबंध लय से है. जब जब आदमी सुख-दु:ख में रहेगा, वो गाएगा ही.

यह तो अनंतकाल से चला आ रहा है. लय का संबंध जीवन से है. हर चीज लय में चल रही है. सृष्टि लय में चल रही है, धरती लय में घूमती है. शिराओं में खून भी लय में दौड़ता है. लय मतलब गेयता और जो गेय है वो गीत है. इस वजह से लय के कारण गीत कभी नहीं मरने वाला.

आज से पचास साल पहले कविता सुनी जाती थी, लेकिन अब गीत सुना जाता है. हिंदुस्तान में आज जितने कवि हैं, पहले कभी नहीं थे, क्योंकि कविता लिखना आसान है, गीत लिखना मुश्किल.

मैंने अज्ञेय जी से भी पूछा था कि आप गीत क्यों नहीं लिखते तो बोले कि भाई, गीत लिखना बहुत मुश्किल है.

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