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गणेश चतुर्थी से करवा चौथ: जाने कब त्योहार भी ट्रेंड बन गए

बाजारवाद, फिल्मों और लोगों के पलायन के कारण देश भर में कई त्योहार संस्कृति के दायरे से निकलकर फैशन बन गए हैं

Nidhi Nidhi Updated On: Aug 27, 2017 06:07 PM IST

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गणेश चतुर्थी से करवा चौथ: जाने कब त्योहार भी ट्रेंड बन गए

गणेशोत्सव की धूम पश्चिम भारत से बढ़कर उत्तर भारत तक पहुंच गई है. करवा चौथ के चांद का इंतजार अब यूपी और बिहार में भी होता है. क्रिसमस पर सांता क्लोज से हर बच्चा अपनी विश मांगता है. लोहिड़ी पर मूंगफलियों और रेवड़ी का इंतजार किसको नहीं होता.

इसे बजार की देन कहें या फिल्मों और सीरियल की पहुंच...ये त्योहार अब किसी एक इलाके या क्षेत्र के नहीं रह गए हैं. कुछ साल पहले तक भले ही इन त्योहारों से किसी खास इलाके की पहचान होती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है. एक दूसरे की देखादेखी और शौक में गणेश चतुर्थी, करवा चौथ, लोहड़ी, दुर्गा पूजा, क्रिसमस, गुड़ी पाड़वा जैसे त्योहार मनाए जा रहे हैं. आइए एक नजर डालते हैं ऐसे ही कुछ त्योहारों पर.

हर कोई बोल रहा है गणपति बप्पा मोरिया

लोकमान्य तिलक ने अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों को जमा करने के लिए गणेश महोत्सव शुरू किया. गणेश प्रतिमा की स्थापना और विसर्जन महाराष्ट्र में 1893 में पहली बार हुआ. देखते ही देखते यह त्योहार मुंबई और आसपास के उपनगरों मे बहुत लोकप्रिय हुआ. इस उत्सव का मकसद समूचे महाराष्ट्र में फैले लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट करना था.

गणेश चतुर्थी एक ऐसा त्योहार है जिसका कोई पौराणिक इतिहास नहीं है. हिंदी पंचांग में भाद्रपद महीने की चतुर्थी को गणेश की पूजा की बात तो मिलती है.

गणेश चतुर्थी की लोकप्रियता का दूसरा चरण 90 के दशक में शुरू होता है. महाराष्ट्र से देश के अलग-अलग हिस्सों में गए सुनार ने खुद को मराठी अस्मिता से जोड़े रखने के लिए छोटे स्तर पर गणेश महोत्सव मनाते थे. लेकिन 90 के दशक में आई 'दमन' और 'वास्तव' जैसी फिल्मों ने गणपति महोत्सव को उत्तर भारत में भी लोकप्रिय बना दिया.

'वास्तव' की गणेश आरती तो आपने सुनी ही होगी. फिर इसी तरह 90 के दशक आई अमिताभ बच्चन की फिल्म 'अग्निपथ' के रीमेक में ऋतिक रोशन की गणपति आरती का सीन कोई कैसे भूल सकता है.

इसके बाद हमारे टीवी चैनलों ने तमाम फिल्मी सितारों और टीवी कलाकारों के घर होने वाली गणेश पूजा को खूब दिखाना शुरू कर दिया. टीवी सीरियल वाले तो इस त्योहार के नाम पर महीने भर का एपिसोड बना डालते हैं. देखते ही देखते देश भर के लोग अपने यहां गणपति की स्थापना करने लगे.

गणेशोत्सव की शुरुआत आजादी के लिए लोगों को एकजुट करने के लिए हुई थी लेकिन आज यह पावर और पैसा दिखाने का तरीका बन गया है. बड़ी से बड़ी मूर्ति, चंदा, डीजे, डांस,...यह है आज गणेश चतुर्थी मनाने का तरीका. 10 दिनों के जोश के बाद नदियों में विसर्जन के दौरान जमकर प्रदूषण फैलाया जाता है.

भले ही गणेश चतुर्थी हमारी सनातन परंपरा का हिस्सा न हो लेकिन इसकी कुरीतियों का विरोध करने पर भी एक खास विचारधारा के निशाने पर आने का खतरा रहता है.

Indian Women Celebrate Karva Chauth Festival

'दिलवाले दुल्हनिया...' ले आए हैं करवा चौथ का चलन 

डीडीएलजे में डायलॉग था कि बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं सेनोरिटा. इस फिल्म ने इस डायलॉग के साथ-साथ देश भर की सेनोरिटा को करवा चौथ का व्रत रखना भी सिखा दिया. मुख्य रूप से पंजाब और उत्तर भारत का ये त्योहार करण जौहर की फिल्मों के साथ-साथ देश भर का फैशन बन गया. हर साल बॉलीवुड एक्ट्रेस की करवा चौथ की तस्वीरें आने लगीं.

करवा चौथ मनाना त्योहार से ज्यादा फैशन है. महंगी साड़ियां, लहंगे और ज्वैलरी परंपरा का नहीं बाजारवाद का हिस्सा हो गया है. आधुनिकता की बात करने वाली तमाम महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए 'व्रत' रखती हैं, तो हंसी आती है. उससे ज्यादा हंसी तब आती है जब पुरुष प्रगतिशील और समानतावादी होने के नाम पर व्रत रख लेते हैं.

Mumbai Society And Daily Life

सिंदूर खेला ने सबको जोड़ा  

दुर्गा पूजा याद आते ही, बंगाल दिखता है. बंगाल में दुर्गा पूजा मनाने का तरीका उत्तर भारत के नवरात्र से बिलकुल अलग है. बंगाल की दुर्गा पूजा रचनात्मकता और खाने-पीने का उत्सव है. कोलकाता के पूजा पंडाल में आपको मछली के पकौड़े तो मिल ही जाएंगे, शाम को प्रसाद के बाद मिलकर ओल्डमॉन्क पीते 'भौद्रोलोक' और महिलाएं भी दिख जाएंगी. जबकी उत्तर भारत में ऐसा कुछ सोचना भी पाप है.

इस फर्क के बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों में अब गैरबंगाली लोग भी 4 दिन की जगह 9 दिन देवी प्रतिमा की स्थापित करके विसर्जन करने लगे हैं.

मूर्तियों और पंडालों की संख्या और उनपर होने वाले खर्च साल-दर-साल बढ़ते ही जा रहे हैं. बंगाल, बिहार और झारखंड में खास तौर पर दुर्गा की अनेकों तरह की मूर्तियां बनाई जाती हैं. पंडाल की सजावट में बाजार दर्शन हो जाता है.

Navratri Festival Celebrations

गरबा और डांडिया से रोशन हुई रात

दुर्गा पूजा की तरह ही गुजरात का डांडिया भी पूजा-पाठ से ज्यादा नाचने-गाने का उत्सव है. डांडिया में जहां लोग जोड़े में दो छोटी-छोटी डंडियों के साथ डांस करते हैं, गरबा खाली हाथ होता है. मान्यता है कि नवरात्र में देवी दुर्गा ने 9 दिन महिषासुर के साथ युद्ध किया था. इसी युद्ध की याद में डंडियों के साथ डांडिया खेलना शुरू हुआ था.

फिल्मों में गुजरात के त्योहार को जब भी दिखाया गया, फिल्म के हीरो हिरोइन एक साथ गरबा और डांडिया करते जरूर दिखाई पड़े. फिल्मों में भारतीय रंगों और संस्कृति का भव्य सीन दिखाने वाले संजय लीला भंसाली ने ‘ढोली तारो ढोल बाजे’ की ताल पर सलमान और ऐश्वर्या को डांडिया करते हुए दिखाया तो सालों बाद एक बार फिर फिल्म रामलीला में 'लहू मुंह लग गया' की धुन पर रणवीर और दीपिका की केमेस्ट्री दिखाई.

डांस हमेशा से खुशी को जाहिर करने का एक तरीका रहा है और त्योहारों में जोड़ों के एक साथ डांस करने का मौका भी. इसके चलते ही गरबा खेलना गुजरात के साथ-साथ देश भर के युवाओं में लोकप्रिय हो गया. आज बिहार से लेकर बेंगलुरु तक तमाम लड़के लड़किया डांडिया पर थिरकने का मौका नहीं चूकना चाहते.

A Garba event in Baroda

सागर किनारे भी होने लगी छठ पूजा 

कुछ साल पहले तक जहां त्योहारों का मतलब अपने लोगों से मिलना होता था. तमाम व्यस्ताओं के बाद भी दूर-दूर से लोग अपने घर वापस लौटते थे. वहीं अब त्योहार का मतलब सबसे पहले बाज़ार और शॉपिंग की याद दिलाता है.

इस तरह बाजार का त्योहारों पर वर्चस्व होने के बाद भी छठ पूजा शायद ऐसा पर्व रह गया है जिसपर अभी भी बाजार का बेहद कम असर दिखता है. वजह इस त्योहार में बाहरी सामान की हद से ज्यादा वर्जनाएं और शुद्धता का ध्यान रखना है.

chhath puja

पूजा में इस्तेमाल होने वाले लगभग सामान, प्रसाद घर पर तैयार किए जाते हैं. पूजा करने की जगह गंगा या नदी होती है. यहां तक की पूजा करने वाली महिलाएं बिना किसी जुलरी और साज-सिंगार के व्रत रखती हैं. इस तरह पर्व की पूरी संरचना ही ऐसी बनी है कि जिसमें अभी तक तो बाजार के घुसने की संभावना नहीं दिखती.

ये त्योहार आज से कुछ समय पहले तक सिर्फ बिहार में मनाया जाता था. लेकिन पिछले 2 सालों से ये त्योहार दिल्ली, पूर्वांचल सहित पूरे यूपी में मनाया जाने लगा. पिछले साल पहली बार छठ पूजा में सरकारी छुट्टी दी गई थी. शिवसेना के विरोध के बावजूद महाराष्ट्र में सागर किनारे अर्घय दिया जा रहा है. बिहार टूरिज्म भी अपने विज्ञापन में छठ पर विशेष ऐड बनाने लगा है.

अगर देखा जाए तो कुल मिलाकर फेस्टिवल के फैशन में बदलने का क्रेडिट कहीं न कहीं फिल्मों और उसके उसके बाजारों पर पड़ने वाले असर से फैलता है. संस्कृति का एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचना सही है लेकिन तब, जब इसे संस्कृति की तरह स्वीकारा जाए, न कि बाजारवाद के दबाव में.

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