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फेस टू फेस मिलिए, सिर्फ फेसबुक पर नहीं

फादर्स डे पर आपको जमकर पोस्ट दिखने वाले हैं...

Saroj Singh Updated On: Jun 17, 2017 06:46 PM IST

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फेस टू फेस मिलिए, सिर्फ फेसबुक पर नहीं

रविवार को फादर्स डे है और इस मौके पर फेसबुक पर फादर लवर्स की होड़ शुरू होने वाली है. अगर आप फेसबुक पर सिर्फ लोगों का फेस देखने जाते है, लाइक का बटन दबा कर खुश हो लेते हैं और कोई पोस्ट नहीं करते, तो रविवार का दिन आप पर भारी पड़ने वाला है.

सुबह उठते ही आप जैसे ही अपने मोबाइल से फेस टू फेस होंगे और दूसरों की पोस्ट एक के बाद एक देखना शुरू करेंगे तो ज्यादातर लोग अपने पापा के तरह-तरह के पोज में फोटो डालकर उन्हें दुनिया का बेस्ट पापा बताते दिखेंगे. अपने फेसबुक पेज पर ऊपर से नीचे उंगलियां सरकाते हुए धीरे-धीरे आप मन ही मन शर्मिंदा होने लगेंगे. एक के बाद एक फादर लवर्स की फोटो लाइक करते-करते ये भी मुमकिन है कि आप हीन भावना से ग्रसित हो जाएं और आपको लगने लगेगा कि आपको तो अपने पिता से प्यार है ही नहीं.

मेरे जैसे लोगों को तो चुल्लू भर पानी में डूबने का मन करने लगेगा क्योंकि मेरी तो पिताजी के साथ कुछ तस्वीर ही होगी. फिर शायद याद आए कि शादी के एलबम में से कन्यादान वाली फोटो इमोशनल भी है और फादर्स डे के हिसाब से ठीक भी रहेगी. इसके बाद सारे कामकाज छोड़ घर में शादी के एलबम की खोज शुरू हो जाएगी.

अगर आप इस एहसास से बचना चाहते हैं तो कल के बजाय आज ही पिताजी के साथ अपनी फोटो की खोज शुरू कर दीजिए, नहीं तो फेसबुक की आभासी दुनिया में आप अपने पिता से प्यार नहीं करने वालों की लिस्ट में शामिल हो जाएंगे. हालांकि ऐसा है नहीं लेकिन यही फेसबुक वाली दुनिया का कड़वा यथार्थ है.

गर्मियों का मौसम है, बच्चों के स्कूल बंद हैं लेकिन फेसबुक पर अप-टू-डेट रहने और खुद को अपमार्केट साबितत करने की हीन भावना से ग्रसित होकर लगातार ठंडी जगहों पर छुट्टी मनाने की तस्वीरें फेसबुक पर पोस्ट कर रहे हैं. घर से छुट्टी पर निकलने से लेकर, घूमने-फिरने, खाने-पीने और फिर वापसी का हर अपडेट फेसबुक पर पोस्ट नहीं किया तो दुनिया कैसे जानेगी कि फलां, फलाने जगह की सैर पर हैं.

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दो दिन मेरे पड़ोस में रहने वाली एक महिला ने भी फेसबुक पर ऐसी ही फोटो पोस्ट की. 10 सेंकेंड में दूसरी पड़ोसन ने उसे लाइक किया और कमेंट बॉक्स में सवाल दागा - कहां घूम रहीं हैं? हालांकि दोनों के घर की दूरी इतनी है कि रोज सुबह-शाम चाहें तो अपने आंगन में खड़े-खड़े ही एक-दूसरे से दुआ सलाम कर लें. घर के सुख दुख वहीं से साझा कर लें. लेकिन नहीं... फेस टू फेस बात करने के बजाय फेसबुक पर ही बातें होती रहीं और सवाल के जवाब में पड़ोसन ने लिखा- अरे ये तो पुरानी फोटो है. बेटे ने स्मार्टफोन दिया है उस पर फोटो अपलोड करना सीख रही थी.

दरअसल फेसबुक ने ऐसी संवादहीनता की स्थिति पैदा कर दी है कि अब तो अपनों का हाल भी फेसबुक से ही मिल रहा है. एक-दूसरे के सामने रहते हुए भी बातें फेस-टू-फेस नहीं बल्कि फेसबुक के जरिए हो रही हैं. ये और बात है कि जिस फोन में फेसबुक है उसमें कॉल करने की भी सुविधा है लेकिन नहीं जी, बात कौन करे, फेसबुक पर लाइक, कमेंट और चैट से दिल नहीं भर रहा है. कुछ फेसबुक एडिक्ट की हालात तो ऐसी है कि फोटो पोस्ट करने के बाद उसे बार बार देखते रहते हैं कि उस पर लाइक और कमेंट कितने आए, कितने लोगों ने लुक और ड्रेस की तारीफ की? कुछ लड़कियां तो फोटो पर मिले लाइक और कमेंट की गिनती देखकर ये तय करती हैं कि कौन से ड्रेस पहननी है और कौन सी नहीं?

बरसों बाद अगर आप अपने किसी पुराने दोस्त से मिलते हैं, तो सेल्फी के इस दौर में ऐसा हो नहीं सकता कि आप उसके साथ फोटो न खींचें और कुछ ही मिनटों में उसे फेसबुक पर पोस्ट न कर दें. ऐसा इसलिए ताकि फेसबुकिया जनता जान ले कि आप अपने दोस्त से बरसों बाद मिले. हमारी आपकी जिंदगी में सोशल मीडिया और वर्चुअल दुनिया इस कदर समा गई है कि सारे रिश्ते एक अलग ही दौर में पहुंच गए हैं. ऐसे रिश्ते जिन्हें हम जी नहीं रहे बल्कि रस्मी तौर पर निभाए जा रहे हैं. यही वजह है कि लोगों के लिए फेसबुक आपबीती को जगबीती बनाने का जरिया सा बन गया है.

आप में से कई इसे पढ़ते हुए नाराज भी हो रहे होंगे. कई मुझ से असहमत भी होंगें. सोच रहे होंगे कि फेसबुक तस्वीरों के जरिए यादों को संजोने, अपनों की खबर से बाखबर रहने और अपने विचार साझा करने का जरिया है. आप सही सोच रहे हैं, लेकिन आप इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि फेसबुक पर ज्यादातर बातें, बहसबाजी और ज्ञान-वर्षा रस्मी और सतही ही होती है.

पांच महीने बाद यूं ही एक दोस्त से कुछ काम पड़ा. फोन उठाया और उसका नंबर लगाया. दुआ सलाम के बाद पूछा कि कहां थी? तुम्हारा फोन नहीं लग रहा था? तो सामने से जवाब आया फेसबुक कर देती या मैसेंजर पर डाल देती. इतनी छोटी सी बात के लिए फोन करने की क्या जरूरत थी? सुन कर थोड़ी मायूसी हुई थोड़ी और थोड़ी शर्म भी आई. मायूसी इसलिए कि फोन के बहाने ही सही दोस्त की आवाज सुन ली, खैरियत पूछ लिया तो क्या बुरा किया? शर्म इसलिए आई कि क्या वाकई में इस फेसबुकिया जगत में मैं आउटडेटेड हो गई हूं. क्या आजकल फेसबुक के जरिए ही दोस्तों और रिश्तेदारों की खबर रखना सही है?

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ये चंद वाकये हैं जो बताते है कि रिश्तों की गर्माहट कैसे फेसबुक के आने से कम होती जा रही है. छुट्टी के दिन अगर आप घर पर सबके साथ पर हैं तो आप कितने घंटे फोन पर फेसबुक और वाट्सऐप चेक कर रहे होते हैं और कितने घंटे परिवार के साथ बिताते हैं, ये हकीकत किसी से छुपी नहीं है. सोकर उठते ही पहले फोन ढूंढते हैं और रात को बिस्तर पर भी हाथ में फोन लेकर ही जाते हैं.

ऐसा नहीं है कि हमें इसका एहसास नहीं है, हम जान रहे हैं और समझ भी रहे हैं ककि फेसबुक और वाट्सऐप हमारी जिंदगी के तमाम खूबसूरत पल हमसे छीन रहा है लेकिन इस सच को स्वीकार करने और बदलने के बजाय हम खुद से नजरें चुरा कर निकले जा रहे हैं. इसलिए आज जरूरत है रिश्तों की गर्माहट को एक बार फिर महसूस करने की, रिश्तों को फिर से जीने की. इसलिए फादर्स डे पर फेसबुक पर दोस्तों की उनके पिता के साथ तस्वीर देखकर कुढ़े नहीं बल्कि थोड़ा वक्त निकालें और अपने पिता के साथ बैठें, उनका हाल-चाल जाने, बचपन की यादें ताज़ा करें. यकीन मानिये वो खुशी कहीं और नहीं मिलेगी.

कल अगर आपके पड़ोसी विदेश की फोटो पोस्ट करें तो कमेंट और लाइक के अलावा आमने-सामने मिलकर उसके विदेश दौरे के अनुभव भी पूछिए. अगर किसी ड्रेस पर ज्यादा लाइक और कमेंट नहीं मिले तो भी उसे पहनिए क्योंकि ड्रेस आपने अपनी पसंद से खरीदी थी, दूसरों की नहीं. इतना ही नहीं बरसों बाद बाद जब दोस्तों से मिले तो सेल्फी जरुर लें और उसको शेयर भी करें, लेकिन आपका कोई साथी न आ पाया तो फोन कर उसे जरुर बताएं कि यार तुझे बहुत मिस किया, अगली बार सब साथ मिलेंगे. कहने का मतलब ये कि अपनों से फेस टू फेस मिलिए, सिर्फ फेसबुक नहीं.

नोट: इसे पढ़ने के बाद लेखिका के फेसबुक वाल पर जाकर इनका पोस्ट चेक न करें. ये बस एक नजरिया हैं.

(लेखिका एक स्वंतत्र पत्रकार है)

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