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ये है कैंसर से निपटने का सबसे आसान उपाय

फेफड़ों, आंत, ब्रेस्ट, प्रॉस्टेट, अंडाशय और पैंक्रियाज कैंसर का आंकड़ा पिछले पचास सालों से बढ़ ही रहा है.

Maneka Gandhi | Published On: Jan 10, 2017 10:47 AM IST | Updated On: Jan 10, 2017 03:20 PM IST

ये है कैंसर से निपटने का सबसे आसान उपाय

आज से कुछ साल पहले कैंसर की बड़ी चर्चा होती थी. इसके इलाज में मिलने वाली हर कामयाबी सुर्खियां बटोरती थी. आज वो जगह एड्स ने ले ली है. मगर आपको यकीन नहीं होगा कि आज भी कैंसर, एड्स के मुकाबले हजार गुना ज्यादा लोगों को मार रहा है.

भारत में कैंसर के बारे में ज्यादातर रिसर्च अमेरिका से प्रेरित होता है. हमारे बड़े से बड़े मेडिकल और रिसर्च संस्थान, अमेरिका में हुई रिसर्च को ही आगे बढ़ाते हैं. हम कैंसर के इलाज के लिए अमेरिका के एक्सपर्ट पर निर्भर हैं. मैं आपको कुछ हैरान करने वाले आंकड़े बताती हूं.

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अमेरिका का नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट कैंसर पर रिसर्च के लिए रोजाना तीस लाख डॉलर खर्च करता है. अमेरिकन कैंसर सोसाइटी रोज दस लाख डॉलर कैंसर के इलाज के रिसर्च पर खर्च करती है. इसके बावजूद कैंसर के आम मामलों से होने वाली मौत जैसे फेफड़ों, आंत, ब्रेस्ट, प्रॉस्टेट, अंडाशय और पैंक्रियाज कैंसर का आंकड़ा पिछले पचास सालों से बढ़ ही रहा है.

हर तीस सेकेंड में एक अमेरिकी नागरिक को कैंसर होने का पता चल रहा है. हर 55 सेकेंड पर एक अमेरिकी की कैंसर से मौत हो रही है.

कैंसर से बचें या निपटे

कैंसर से लड़ने के दो तरीके हैं-

दूसरा तरीका है कैंसर से बचाव का

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अमेरिकी सीनेट की नेशनल कमेटी ऑफ न्यूट्रिशन ऐंड ह्यूमन नीड्स ने नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के निदेशक से पूछा था कि खान-पान से कितने कैंसर होते हैं?

निदेशक ने जवाब दिया कि पचास फीसद लोग खान-पान की वजह से कैंसर के शिकार होते हैं. फिर सीनेट की कमेटी ने जानना चाहा था कि खान-पान की कौन सी वजहें हैं जो लोगों को कैंसर का शिकार बनाती हैं? क्या वो केमिकल एडिटिव्स हैं? खाने के प्रिजर्वेटिव यानी संरक्षक केमिकल या फिर बनावटी रंग?

निदेशक ने इन सवालों के जवाब में कहा-नहीं इनमें से कोई भी कैंसर के प्रमुख कारक नहीं हैं. नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के डॉक्टर जियो बी गोरी ने कहा था कि खान-पान से कैंसर की प्रमुख वजह हैं खाने में मीट और फैट का ज्यादा इस्तेमाल.

इसी तरह अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में न्यूट्रिशन के वैज्ञानिक भी मांस, डेयरी प्रोडक्ट और अंडों के उद्योग को कई तरह के कैंसर के लिए जिम्मेदार मानते हैं. इनसे सबसे ज्यादा ब्रेस्ट और आंत के कैंसर होते हैं.

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अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट का जर्नल कहता है कि दुनिया में ऐसा कोई समुदाय नहीं जो बहुत मांस खाता है उस समुदाय पर कैंसर का कहर न बरपा हो.

जापानियों पर हुआ एक रिसर्च बताता है कि जापान में रहने वाले जापानी नागरिक कम मांस खाते हैं. उनमें आंत के कैंसर की बीमारी कम देखी गई. वहीं जो जापानी नागरिक अमेरिका में बस गए, उन्होंने ज्यादा मांस खाना शुरू किया तो उनके बीच आंतों का कैंसर ज्यादा होने लगा.

इस बारे में आगे हुए रिसर्च से दो और प्रमुख बाते सामने आईं-

  1. लोग जितना ही फैट खाते हैं, उतना ही उन्हें आंत का कैंसर होने का खतरा बढ़ता जाता है.
  2. लोगों के खाने में जितना ही रेशेदार खाना कम होगा, उतना ही उसे आंत का कैंसर होने की आशंका बढ़ती जाएगी.

मांस, अंडे और ज्यादातर डेयरी प्रोडक्ट यानी दूध से बने उत्पादों में फैट बहुत होता है. इनमें फाइबर न के बराबर होता है.

फाइबर नहीं खाने से होता है कैंसर

हमारे खाने में फाइबर का क्या काम है? ये एनिमल फैट से होने वाले नुकसान से हमें बचाते हैं. ये रेशेदार चीजें झाड़ू का काम करती हैं जो हमारी आंतों से गंदगी साफ कर देते हैं. एनिमल फैट, शरीर के तापमान के अंदर ठोस रूप में रहते हैं. ऐसे में खाने में रेशेदार चीजें नहीं हैं तो ये ठोस फैट हमारी आंतों का रास्ता रोक लेता है.

Vegetables

इस वजह से खाना पचने में वक्त लगता है. छोटी आंत से बड़ी आंत तक खाना जाने में और भी वक्त लगता है. जितना ही वक्त खाना हमारी आंत में गुजरता है, उतना ही हमारी आंतों को खाने को पचाने में मेहनत करनी पड़ती है. खाने में मौजूद नुकसानदेह चीजें जो खाना पचने की प्रक्रिया के दौरान शरीर से बाहर हो जानी चाहिए, वो शरीर में ही रह जाती हैं.

वैसे भी बड़ी आंत मांस के पचने के लिहाज से काफी बड़ी होती है. मांस खाने वाले ज्यादातर जानवरों की बड़ी आंत उनके लिए मुफीद होती है. मगर हम इंसानों के अंदर बड़ी आंत शाकाहारी जानवरों जैसी होती है.

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सवाल ये है कि इन खाने की चीजों में कितना फाइबर है?

बीफ, स्टीक, लैम्ब चॉप, पोर्क चॉप, चिकेन, फिश, चीज, दूध और अंडों में फाइबर न के बराबर होता है. जबकि कमोबेश सभी सब्जियों और अनाजों में फाइबर होता है. किसी में कम और किसी में ज्यादा. सिर्फ सफेद चावल में रेशे नहीं होते.

भारतीय शहरों में बढ़ा है कैंसर

भारत के शहरों में रहने वाले लोगों के बीच मांस खाने वालों की तादाद ज्यादा है. सवाल ये है कि इनके बीच आंत का कैंसर होने का आंकड़ा क्या कहता है? इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने 1990 से 1996 के बीच पांच शहरों और एक ग्रामीण इलाके में रिसर्च की थी. इसके नतीजे कुछ इस तरह हैं-

-आंतों के कैंसर के मरीजों की तादाद बढ़ रही है

-मर्दों में औरतों के मुकाबले कैंसर होने की आशंका डेढ़ गुना ज्यादा है

-महिलाओं में होने वाले कैंसर में आंतो का कैंसर दसवें नंबर पर है

-आंतों के कैंसर की बीमारी तेजी से बढ़ रही है

Cancer

मुंबई में आंतों का कैंसर होने का रेट सबसे ज्यादा है. एक ही अस्पताल में 845 मर्दों और 623 औरतों में कैंसर देखा गया. इसके बाद दिल्ली का नंबर आता है. जहां एक अस्पताल में 543 आदमियों और 357 औरतों में कैंसर की बीमारी देखी गई.

बैंगलोर, भोपाल में भी कैंसर की बीमारी तेजी से बढ़ती देखी जा रही है. इनके मुकाबले जिस ग्रामीण इलाके बारशी में रिसर्च की गई वहां पर कैंसर के केवल 9 केस देखे गए.

सबसे दिक्कत तलब और आपके लिए खास तौर से सोचने बात ये है कि कैंसर के ज्यादातर शिकार लोग तीस बरस की उम्र के बाद के होते हैं. मतलब साफ है कि तीस साल की उम्र के बाद बुरे खान-पान का असर हमारे शरीर पर दिखने लगता है.

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महिलाओं में कैंसर के दो फीसद और मर्दों में चार फीसद मामले आंतो के कैंसर के होते हैं. देश भर में कैंसर के मरीजों के आंकड़ों पर गौर करें तो 1990-91 में ये 3.44 लाख आदमियों और 3.88 लाख औरतों का था. कैंसर के शिकार लोगों की औसत उम्र केवल तीन बरस बचती है.

कैंसर की इस भयानक बीमारी से बड़ी आसानी से निपटा जा सकता है.

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