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ऐसे हुआ त्रिदेवों का जन्म और जीवन-मृत्यु का अनंत चक्र...!

जो आता है वह जाएगा ही तो दुख कम होगा..कष्ट कम होगा और हम एक भरपूर जीवन जी पाएंगे.

Devdutt Pattanaik | Published On: Feb 06, 2017 03:37 PM IST | Updated On: Feb 06, 2017 03:48 PM IST

ऐसे हुआ त्रिदेवों का जन्म और जीवन-मृत्यु का अनंत चक्र...!

आरम्भ में सर्वोच्च देवी आदिशक्ति ने कमल में तीन अंडे दिए. इन तीन अंडों में तीन लोक और तीन देवता- ब्रह्मा, विष्णु और शिव निकले. देवी के हृदय में कामना जागी और उसने देवों से कहा कि वे उसके साथ संबंध बनाएं. ‘लेकिन तुम हमारी माता हो’...ब्रह्मा और विष्णु ने पीछे हटते हुए कहा.

ठुकराए जाने पर देवी नाराज हुई और उसने अपनी ज्वालामयी तीसरी आंख की दृष्टि से उन्हें भस्म कर दिया. फिर वह शिव की तरफ मुड़ी जो इस शर्त पर उनसे संबंध बनने के लिए तैयार हो गए अगर वह उन्हें अपनी तीसरी आंख दे दे. देवी ने ऐसा ही किया.

शिव ने उस तीसरी आंख का प्रयोग करके देवी को भस्म कर दिया और बाकी दोनों देवों को फिर से जीवित कर दिया.

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शिव का जन्म किस युग में हुआ और उनकी क्या कहानी है?

फिलॉसफी के दो भाग होते हैं. एक समय के भीतर जो बदलाव हुआ है वो और दूसरा जो समय के बाहर होता है. समय का नियंत्रण जिसके ऊपर है और समय का नियंत्रण जिस पर नहीं है. नियंत्रण का मतलब यह है कि आपका जन्म और मृत्यु दोनों ही तय है.

एक शब्द है योनीजा यानि जिसका जन्म योनी से हुआ है. राम का जन्म कौशल्या से हुआ है. राम का कौशल्या से मनुष्य योनी में जन्म हुआ है. कृष्ण का जन्म देवकी से हुआ. राम सरयू के अंदर चले जाते हैं और इस तरह से मरते हैं. कृष्ण को 'जरा' नामक एक धनुर्धारी का बाण लग जाता है तो उनको मृत्यु का अनुभव होता है.

तो यह एक दुनिया है जहां जन्म और मृत्यु का अनुभव होता है. इसके बाहर एक दूसरी दुनिया है जिसे अयोनीजा या स्वयंभू कहते हैं. वो दुनिया जहां प्राणी अपने आपको जन्म देते हैं और वहां बुढ़ापा या मृत्यु नहीं होती है.

यह नित्य दुनिया भगवान की दुनिया है. जिसे जैन सिद्धलोक यानि जहां सिद्ध आत्माएं रहती है ऐसा कहा जाता है. इसका मतलब ये हुआ कि यहां शिव विराजमान हैं, विष्णु भी यहां हैं. यहां वे हमेशा जवान हैं, न तो कोई पतझड़ है न ही सर्दियां हैं. हमेशा बसंत हैं. खुशी है. यहां मृत्यु नहीं होती है भूख भी नहीं लगती है.

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चक्रीय-अचक्रीय दुनिया

दो तरह की दुनिया होती है. एक वो जो नित्य बदलने वाली होती है- जहां समय चक्रीय है और युगों में बदलता रहता है. वाल्मीकि रामायण में समय की चक्रीय होने के बारे में एक दिलचस्प बात है. जब भगवान राम देवी सीता को अपने साथ चलने के बजाय रुकने के लिए कहते हैं तो वे मना कर देती हैं. वहां पर सीता का सटीक तर्क होता है कि ‘हर रामायण में आपके साथ गई हूं तो अब क्यों रोक रहे हो?’

इसका मतलब ये हुआ कि रामायण के पहले होने का ज्ञान सीता को है और यही सिद्धांत लोककथाओं में हनुमान की मुद्रिका की कहानी के द्वारा बताया गया है.

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समय के देवता राम से कहते हैं कि धरती पर उनका काम पूरा हो गया है और उन्हें मृत्यु को स्वीकार कर बैकुंठ लौट जाना चाहिए. भगवान राम यम देवता को बुलाना चाहते हैं लेकिन उन्हें मालूम है कि उनके परम भक्त हनुमान उन्हें राम के पास आने भी नहीं देंगे.

हनुमान का ध्यान बंटाने के लिए राम अपनी अंगूठी एक पत्थर की दरार में डाल देते हैं और फिर हनुमान से उसे लाने के लिए कहते हैं. हनुमान फौरन सूक्ष्म रूप में आ जाते हैं और दरार में छलांग लगा देते हैं. वे बहुत दूर तक भूगर्भ में निकल जाते हैं और नागलोक पहुंच जाते हैं.

नागलोक में हनुमान को नाम राजा वासुकी मिलते हैं, वे उनसे अंगूठी ढूंढने में मदद मांगते हैं. वासुकी उन्हें एक पहाड़ की ओर जाने के लिए कहते हैं. जैसे ही हनुमान उस पहाड़ के पास पहुंचते हैं उन्हें समझ में आता है कि वह अंगूठियों का पहाड़ है. वे सोचते हैं कि अब श्रीराम की अंगूठी कैसे ढूंढेंगे.

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वासुकी हनुमान को बताते हैं कि वे सब राम की अंगूठियां हैं और ये कि, यह एक अनंत कहानी है जिसमें धरती पर राम की मृत्यु से पहले एक वानर उनकी अंगूठी ढूंढने आता रहा है. तभी त्रेतायुग समाप्त होता है. यह चक्र अनंतकाल से चला आ रहा है. हनुमान को तब समझ में आता है कि जन्म-मृत्यु और फिर जन्म की प्रक्रिया अनंत है इसे रोका नहीं जा सकता.

मृत्यु से भय

इस कहानी में हनुमान के जरिए हनुमान और फिर हमारी अपनी कमियों के बारे में बताया जाता है. हनुमान इतने शक्तिशाली हैं लेकिन मृत्यु से डरते हैं. वे नहीं चाहते कि राम उनसे कहीं दूर चले जाएं. हनुमान को सीख देने के लिए यह पूरी कहानी गढ़ी गई है कि हनुमान को यह समझ में आए कि हर चीज पैदा हुई है तो मरेगी भी और जिसका मरण हुआ है उसका पुनर्जन्म भी होगा.

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अनंतकाल तक यही चक्र चलता रहेगा. दर्शन के अनुसार, ये बताना चाहते हैं कि ये जो जिंदगी हम जी रहे हैं, यह हम पहले भी जी चुके हैं और उसके पहले भी जी चुके हैं और बाद में भी यही जिंदगी हम जीते रहेंगे. दुनिया बदलती है और नहीं भी बदलती है लेकिन हमारे सोचने का तरीका बदल जाता है. हम दुनिया को नहीं बदल सकते हैं पर दुनिया के सोचने-समझने के तरीके को बदल सकते हैं.

भारतीय फिलॉसफी का सबसे जरूरी पाठ है कि अपने मन पर काबू रखना. जैसे हनुमान राम को नहीं बचा पाए, राम को यमलोक या बैकुंठ जाना ही पड़ा वैसे ही आप दुनिया को नियंत्रित नहीं कर सकते.

समय की धारा को हम रोक नहीं सकते किन्तु अगर आप इस बात को मान लेंगे कि जो आता है वह जाएगा ही तो दुख कम होगा,कष्ट कम होगा और हम एक भरपूर जीवन जी पाएंगे.

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