S M L

मोदीजी इस्लामी बैंक के हिमायती हैं: हसीब सिद्दीक़ी

अपने इलाके में सूदखोरी की सामाजिक बुराई को दूर करने में देवबंद कामयाब हुआ है

Nazim Naqvi, Nazim Naqvi Updated On: Nov 29, 2016 10:07 AM IST

0
मोदीजी इस्लामी बैंक के हिमायती हैं: हसीब सिद्दीक़ी

(देवबंद पर स्पेशल स्टाेरी की अंतिम किस्त )

देवबंद और उसके आस-पास के छोटे क्षेत्र कई लिहाज से एतिहासिक हैं. गंगोह, शामली, नानौत और देवबंद जैसे क़स्बाई-क्षेत्र 1857 के स्वतंत्रता-संग्राम में बढ़-चढ़ के हिस्सा लेने वाले इलाके हैं. उपजाऊ जमीन, एतिहासिक पृष्ठभूमि ने यहां के बाशिंदों में सामाजिक और सियासी चेतना का अद्भुत संचार किया है.

इसीलिए देवबंद इस्लामी शिक्षा के अलावा अपने यहां से एक सामाजिक बुराई को भी दूर करने में कामयाब हुआ. ये बुराई थी सूदखोर महाजनों की. सूदखोर महाजन का जिक्र आते ही 'मदर-इंडिया' का कन्हय्या लाल याद आ जाता है जिसके मधुर व्यवहार में चालाकी छुपी हुई है. जो लोगों की मजबूरी में उनके साथ आंसू भी बहाता है और उनके जेवर गहनों को सूद पे रखकर हड़पने की कला में भी माहिर है.

islamic banking

गांव-देहात में ये कहावत शाश्वत सत्य की तरह मशहूर है कि एक बार घर का गहना या जमीन किसी महाजन के पास गिरवी गई तो समझो कि फिर वापस नहीं आने वाली.

ये भी पढ़ें: मदरसों की मां: दारुल-उलूम देवबंद पार्ट 1

देवबंद में 'ईसाइयत को नकारने' वाला विभाग क्यों बना? पार्ट 2

इस्लाम धर्म में सूद पर पैसा लेना-देना सख्ती के साथ माना है. देश के बंटवारे और जमींदारी प्रथा के अंत के बाद जो महाजनी व्यवस्था सामने आई उसने भोली-भाली और जरूरतमंद जनता को सूद-दर-सूद के शिकंजे में जकड़ लिया.

इसी बुराई का सामना करने के लिए 11 सितंबर 1961 को मौलाना सय्यद असद मदनी ने दारुल-उलूम में देवबंद के धनी और जिम्मेदार लोगों के साथ एक आम-सभा की, जिसमें इलाके के लोगों की गिरती हुई आर्थिक स्थिति को बड़े ही दुखी अंदाज में पेश किया गया. मीटिंग में अपील की गई कि जिनके पास जरूरत से ज्यादा पैसा है वो अपना पैसा एक जगह जमा करें. एक फंड बनाया जाए. लोगों के सरप्लस पैसे को उस फंड में लाया जाए. जरूरतमंदों को उनके जेवरात गिरवी रखकर उसके बदले में पैसा दिया जाए.

अपील का असर हुआ. एक ट्रस्ट के रूप में 'मुस्लिम-फंड' बना और एक हजार बयालीस रुपए और पचास पैसे पहले ही दिन जमा हो गये. इन पैसों के साथ एक स्थानीय व्यक्ति हसीब सिद्दीकी को इसे चलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई.

जब हमने मुस्लिम फंड ट्रस्ट, देवबंद के ऑफिस में प्रवेश किया तो जनरल-मैनेजर के केबिन में एक बूढ़े शख्स ने अपनी चमकती आंखों से हमारा स्वागत किया. जी हां, ये वही हसीब सिद्दीकी साहब हैं जो पिछले 55 सालों से उस वादे को निभा रहे हैं जो उन्होंने 1961 में किया था. हसीब साहब से मिलते वक्त जेहन में कई सवाल थे.

सवाल: जनाब जो कुछ सुन के आया हूं, वो कमाल का विचार है. इसके पीछे क्या कल्पना थी आप लोगों की?

जवाब: देखिए इसे शुरू तो किया था मौलाना सय्यद असद अली मदनी ने जो सांसद भी रहे हैं उन्होने इस तसव्वुर (कल्पना) को आगे बढ़ाया. तसव्वुर ये है कि लोग अपनी अमानतों को जो उनके घर में अधिक है हैं वो किसी एक जगह जमा करें. और उस पैसे का इस्तेमाल ये है कि जो जरूरतमंद हैं, उनको, उनके जेवरात के बदले लोन दिया जाय बिना किसी इंटरेस्ट के.

सवाल- क्या ये सिर्फ मुसलमानों के लिए है...?

जवाब: नहीं…नहीं… ऐसा नही है इसका दरवाजा सबके लिए खुला है. हिंदुस्तान का मिजाज किसी कौम के साथ नहीं जुड़ा है. हम किसी एक कौम के साथ ये मुआमला  (व्यवहार) करें ये मुनासिब नहीं है. गरीबी हर जगह पैर पसारे रहती है इसलिए हमारा लक्ष्य वो लोग हैं जो जरूरतमंद हैं.

सवालक्या हमारा कानून इसकी इजाजत देता है

जवाब: हिंदुस्तान का आईना इसकी इजाजत नहीं देता कि किसी खास मजहब के कॉन्सेप्ट को कानून में शामिल किया जाए. खुशकिस्मती है हमारी कि मोदी जी सऊदी-अरब गए और वहां उनको सऊदी अरब का सबसे बड़ा अवॉर्ड मिला और वो वहां इस्लामी बैंकिंग पर दस्तखत करके आए.  इसीलिए गुजरात में उन्होंने सबसे पहले इस्लामी बैंकिंग की व्यवस्था कायम करने की कोशिश की है.

islamic banking 2

सवालअब तक कितने लोगों को फायेदा मिला है इस ट्रस्ट से?

जवाब: इन 55 सालों में एक अरब रुपए से भी ज्यादा लोगों को बांटा है, और खास बात ये है कि इस 55 सालों में किसी का भी जेवर हमने नहीं बेचा. अगर किसी वजह से वो छुड़ा नहीं पा रहा है. हम बार-बार तकाजा भी कर रहे हैं तो उसका एक तरीका ये होता है कि भई अपने जेवल लो और बाजार चले जाओ, जितने का आपका समान बिके उसे बेचो और हमारा पैसा हमें दो, जो अधिक निकले, उसे अपने पास रखो. ये सूदखोर कभी नही करता था. हमारी कोशिश होती है कि जो समान गिरवी रखा है वो छूट कर जाए. किसी की बेटी बैठी है, बहन बैठी है, उसके काम आए.

सवाल : इन 55 बरसों में ऐसा अकेला यही सेंटर है या और जगह भी लोगों ने इसे अपनाया है?

जवाब: देखिए मैं तो सबको कहता हूं कि आकर देखो, इसे समझो, हमने एक नियम चलाया है, इसमें मुश्किलें तो बहुत हैं. मेहनत करनी पड़ती है. न करो तो वो अलग बात है. लेकिन कोई ये नहीं कह सकता कि इसे किया ही नहीं जा सकता. हमने करके दिखाया है. इन 55 वर्षों में करीब 65 करोड़ लोगों ने हमारे पास पैसा जमा कराया है. हमने सरकार से 80जी ले रखा है, 12ए ले रखा है, हम इनकम टैक्स भरते हैं. सोसाएटी एक्ट के अंदर हमारा राजिस्ट्रेशन है और हम चेरीटेबल ट्रस्ट के रूप में इसे चलाते हैं.

सच है, अच्छे काम करने के लिए कोई खास जगह नहीं होती है. कहीं से भी और कभी भी इन्हें शुरू किया जा सकता है. हमने बुज़ुर्गों से हमेशा ये सुना है कि अच्छी बातों को कहीं से भी सीखा जा सकता है.

 

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi