S M L

एक चायवाला जिसकी चाय में खौलता है साहित्य, उबलती है लेखनी

लक्ष्मण राव आईटीओ के पास हिंदी भवन के सामने एक छोटी सी चाय की दुकान चलाते हैं

Ravishankar Singh | Published On: Dec 15, 2016 09:59 AM IST | Updated On: Dec 15, 2016 10:03 AM IST

एक चायवाला जिसकी चाय में खौलता है साहित्य, उबलती है लेखनी

दिल्ली के आईटीओ के सामने बनी एक चाय की दुकान एक खास वजह से चाय पर चर्चा के लिये जानी जाती है. यहां चाय की केतली में देश की राजनीति उबाल नहीं भरती है बल्कि एक चायवाले की कहानी किसी फिल्म की तरह आंखों के सामने से गुजरती है.

64 साल की उम्र में हिंदी साहित्य से मास्टर की डिग्री हासिल करने वाला झुर्रियों से भरा एक चेहरा बिल्कुल किसी आम से चायवाले जैसा ही है. लेकिन इस चेहरे की एक और पहचान है जो इस शख्स की उम्र भर की गाढ़ी कमाई का पुरजोर दस्तावेज है. यह चायवाला अबतक 25 किताबें लिख चुका है.

महाराष्ट्र के अमरावती के लक्ष्मण राव आईटीओ के पास हिंदी भवन के सामने एक छोटी सी चाय की दुकान चलाते हैं. लक्ष्मण राव की लेखनी के कथासागर को सुनकर आपको इनके बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ेगी.

दूसरों के लिये इनकी चाय एकदम अलग होती है. एक पढ़ा-लिखा, व्यवहार कुशल इंसान, जिसने सत्तर के दशक से इस दिल्ली को बनते और बदलते देखा है. उसके अनुभव की कई कहानियां लोग चाय की चुस्कियों के साथ सुनते हैं.

लेकिन सबको इंतजार रहता है खुद लक्ष्मण से ये जानने का कि कैसे वो चाय बनाते-बनाते इतनी किताबें लिख गए.

laxman rao 1

मीठी जुबान, नफासत भरा अंदाज

राव की संघर्षगाथा अनुभवों के पन्नों और मेहनत की तहरीरों से बुनी है. राव अपने किस्सों से चाय के जायके को फीका नहीं होने देते हैं. मीठी जुबान, नफासत भरा अंदाज और आदर्श विचारों की खुद अपने आप में एक किताब हैं लक्ष्मण राव.

लक्ष्मण राव सिर्फ एक कामयाब चायवाले बनकर ही संतुष्ट नहीं थे. उनकी हसरतों की उड़ान आसमान में कुछ नया लिखने को बेताब थी. लक्ष्मण राव ने उम्र को आड़े नहीं आने दिया और 40 की उम्र में बारहवीं, 50 की उम्र में ग्रेजुएशन और 64 साल की उम्र में हिंदी साहित्य से मास्टर की डिग्री हासिल कर जिंदगी का नया अध्याय लिखा.

लक्ष्मण राव की अभी तक 25 किताबें प्रकाशित हो चुकी है. इनमें 5 उपन्यास, 5 नाटक, 5 वैचारिक रचनाएं, 5 प्रतिनिधि कहानियां और 5 शोध और दर्शन की किताबें शामिल हैं.

लक्ष्मण राव की कहानी में कई किरदार हैं. राव के मुताबिक पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल तक ने उन्हें मिलने का न्योता दिया था.

राव की किताबों में चाय पीने वाले ग्राहकों और उनके आस-पास से जुड़े लोगों की कहानियां शामिल होती हैं. लक्ष्मण राव को कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं. इनका फेसबुक पेज भी है.

इनकी किताबें अमेजन, फ्लिपकार्ट स्नैपडील, पर भी मिल रही हैं. इनकी किताबों का अंग्रेजी अनुवाद भी हो रहा है. इन्होंने खुद भी एक बुक स्टॉल चाय बेचने की जगह पर लगा रखा है.

लक्ष्मण राव 22 साल की उम्र में पिता से 40 रुपए ले कर दिल्ली आए थे. राव का महाराष्ट्र के अमरावती जिले से दिल्ली का सफर काफी मुश्किल और परेशानी से भरा रहा है.

1975 में पहली बार लक्ष्मण राव ने आईटीओ इलाके में ही पान की दुकान खोली थी जो चल नहीं सकी. पांच साल के बाद राव ने आईटीओ के विष्णु दिगम्बर मार्ग पर चाय बेचना शुरू किया.

लक्ष्मण राव कुछ ही दिनों में अपने साहित्यिक प्रेम की वजह से लोगों के बीच लोकप्रिय होते चले गए. लक्ष्मण राव के भीतर एक लेखक बनने का सपना पल रहा था.

लेखक बनने की ललक को लेकर एक दिन राव एक प्रकाशक के पास पहुंच गए. लेकिन जब उन्होंने बोला कि मैं एक चाय वाला हूं तो उन्हें यह कर बाहर निकला दिया गया कि ‘एक चायवाला उपन्यास लिखेगा?’

जिद्द के आगे जीत है

लक्ष्मण राव ने ‘जिद्द के आगे जीत है’ के हौसले को जिंदा रखा. उनकी मेहनत और धैर्य के चलते उन्हें अपनी किताब का प्रकाशक मिल गया. राव की पहली किताब ‘नई दुनिया की नई कहानियां’ 1979 में आई . लक्ष्मण राव की दूसरी किताब ‘प्रधानमंत्री’ साल 1984 में छपी.

laxman rao 2

जिस किताब से राव की सबसे ज्यादा चर्चा हुई थी वह किताब थी ‘रामदास’  जो साल 1992 में आई थी. ‘रामदास’ के तीन संस्करण आ चुके है. चौथा संस्करण भी बहुत जल्द  निकलने वाला है. ‘रामदास’ किताब ने लक्ष्मण राव को एक अलग पहचान दी. इस किताब को साल 2003 में 'इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती अवार्ड' मिला.

राव ने अपनी पहली किताब के लिए 7 हजार रुपए जमा किए थे. राव का सपना था कि वह अपनी पहली किताब अपने पैसों से छपवाएं. रामदास, नर्मदा, अभिव्यक्ति, रेणु, अहंकार और दंश इनकी प्रमुख रचनाएं हैं.

आज भी चाय बेच रहे हैं  

एक महीने में लगभग 15-20 किताबें ऑन लाइन बिक जाती हैं. 50 से 60 किताबें तो केवल चाय स्टॉल से ही बिक जाती हैं. कुल मिलाकर 10 हजार रुपए प्रति महीने किताबों से आ रहे हैं.

लक्ष्मण राव आज भी लक्ष्मी नगर में किराये के मकान में रहते हैं. उनके दो बच्चे हैं. बड़ा बेटा हितेश चार्टेड एकाउंटेंट की पढ़ाई कर रहा है और छोटा बेटा एमबीए कर रहा है. राव के बेटे उनकी किताबों की बिक्री के लिये सोशल साइट से लेकर ई-कॉमर्स पर प्रचार-प्रसार का काम भी देखते हैं.

साहित्यकार बनने की ललक बचपन से ही

लक्ष्मण राव कहते हैं, ‘जब मैं आठवीं क्लास में था तभी मेरे अंदर किताब पढ़ने में दिलचस्पी जगी. मैं उस समय गुलशन नंदा को बड़े शौक से पढ़ा करता था. मैं शरत चंद्र और मुंशी प्रेमचंद की किताबें भी बड़े चाव से पढ़ा करता था.

राव बताते हैं, ‘ मेरी अमरावती से दिल्ली तक की यात्रा इतनी आसान नहीं थी. मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं कुछ कमाना शुरू करूं इसीलिए मैंने दसवीं पास करके एक डॉक्टर के साथ काम करना शुरू कर दिया. बाद में मैंने अमरावती जिले के एक कपड़े के कारखाने में भी पांच साल तक काम किया.’

यह एक महज संयोग ही है कि देश-विदेश की मीडिया में लक्ष्मण राव की भी चर्चा हुई है और प्रधानमंत्री मोदी की भी. दोनो में एक खास समानता है. दोनो चाय बेच कर ही आगे बढ़े हैं. एक चाय बेचते बेचते साहित्यकार बन गया और दूसरा प्रधानमंत्री बनकर देश बदल रहा है.

पॉपुलर

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi