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शकील बदायूंनी पुण्यतिथि विशेष: हज़ार ख़ुशियों के भूले हुए पते याद आते हैं...

उन्होंने फिल्मों में अंधाधुंध गीत लिखने के ऊपर अपनी इल्मी शायरी को क़ुरबान नहीं किया.

Raajkumar Keswani | Published On: Apr 20, 2017 11:46 AM IST | Updated On: Apr 20, 2017 12:05 PM IST

शकील बदायूंनी पुण्यतिथि विशेष: हज़ार ख़ुशियों के भूले हुए पते याद आते हैं...

इस एक नाम के साथ हज़ार नग़मे फज़ाओं में गूंज उठते हैं. इस एक नाम के साथ हज़ार ख़ुशियों के भूले हुए पते याद आते हैं. यह एक नाम है शकील बदायूंनी का.

13 अगस्त सन 1916 को जन्में शकील बदायूंनी के पिता मौलवी जमील अहमद क़ादरी सिलसिले के सूफ़ी थे. जमील साहब शायर भी थे और तख़ल्लुस था ‘सोख़्ता’. शकील की शुरूआती शिक्षा घर पर ही हुई.

मौलवी अब्दुल ग़फ़्फार, मौलवी अब्दुल रहमान और बाबू रामचंद्र जैसे उस्तादों से उर्दू, अरबी,फ़ारसी और अंग्रेज़ी के सबक सीखते रहे. बाद को बदाऊं के ही जामिया हाई स्कूल से 1936 में हाई स्कूल परीक्षा पास की और सीधे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की तरफ रुख किया.

1942 में बी.ए. की डिग्री हासिल की और रोज़गार की तलाश करते उन्हें दिल्ली में एक अदद सरकारी नौकरी मिल गई. लेकिन कुछ बरस बाद ही यह नौकरी छोड़ उन्होने बंबई की तरफ कूच फ़रमाया. फिल्मी दुनिया की तरफ.

असल में शकील को लड़कपन से ही शेर-ओ-शायरी का चस्का लग चुका था. उनके पिता के बेहद करीबी दोस्त मौलवी ज़िया-उल-क़ादरी की संगत और इस्लाह के साथ 13 बरस की उमर में ही पहली ग़ज़ल लिख डाली.

एक स्थानीय अख़बार में उसी साल मतलब साल 1929 में यह प्रकाशित भी हो गई. बाद को उनका राब्ता कायम हुआ मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी से, जिनकी संगत में हीरे ने अपनी चमक हासिल कर ली.

कुदरत ने शकील को बड़ा पुर-असर गला बख़्शा था. लिहाज़ा मुशायरों में उन्हें जी भर के दाद मिलने लगी. साल 1944 में उनकी पहली ग़ज़ल संग्रह ‘रानाइयां’ छपकर सामने आयी तो पहचान और मज़बूत हुई.

साल 1946 में बंबई के एक मुशायरे में शकील बदायूंनी ने जिस तरन्नुम से अपनी ग़ज़लें सुनाई उससे सुनने वालों की तरफ से जो ‘वाह-वाह’ का शोर बरपा उसमें एक मुतावातिर 'वाह-वाह' की एक आवाज़ थी निर्माता-निदेशक ए.आर.कारदार की.

जब मुशायरा ख़त्म हुआ तो कारदार साहब ने आगे बड़कर शकील की शान में कसीदे पढ़ते हुए उन्हें अपनी फिल्म कंपनी कारदार प्रोडक्शन्स की आईंदा फिल्मों के लिए गीत लिखने की पेशकश कर डाली.

तनख़्वाह भी इतनी ऊंची कि इंकार की गुंजाइश ही न बची. पूरे 400 रुपए. ज़रा सोच कर देखें जिस शख़्स को सरकारी नौकरी में महज़ 60 रुपए मिलते हों उसे कोई 400 रुपए दे तो उसके क्या मायने होते हैं.

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किस्सा कोताह यह कि शकील साहब ने दिल्ली से अपना बोरिया-बिस्तर समेटा और बंबई जा बसे. पहली फिल्म थी ‘दर्द’ और संगीतकार थे नौशाद. अब नौशाद साहब ने जो शकील के गीतों में रंग भरे तो जादू हो गया. पहली ही फिल्म के गीत हिट साबित हुए.

उनके लिखे पहले तीन गीत उमा देवी उर्फ टुनटुन की आवाज़ में हैं जो उनके सबसे पहले फिल्मी गीत भी हैं - 'अफ़साना लिख रही हूं', 'आज मची है धूम, झूम खुशी में झूम', और 'ये कौन चला, हाय ये कौन चला', सुरैया की आवाज़ में 'हम थे तुम्हारे, तुम थे हमारे, हाय वो भी ज़माना याद करो', 'बीच भंवर में आन फंसा है दिल का सफीना, शाहे मदीना' और शमशाद बेग़म में की आवाज़ में - 'हम दर्द का अफ़साना, दुनिया को सुना देंगे' और 'ये अफ़साना नहीं ज़ालिम, मेरे दिल की हक़ीक़त है.'

इस फ़िल्म से जो शकील-नौशाद की संगत का सिलसिला शुरू हुआ तो उस दिन तक चला जिस दिन तक शकील साहब की सांसें चलीं. फिल्म संगीत के इतिहास में ऐसी बेमिसाल जोड़ी कभी दूसरी नहीं हुई.

वजह यह कि पेशे से अलग हटकर भी शकील और नौशाद के बीच एक मुहब्बत और इज्ज़त का रिश्ता था. क्या मजाल कि कभी दोनो के बीच कोई ऐसी बात हो जाए कि जिसे झगड़े का नाम दिया जा सके और यह बात इनके गीतों में खुलकर नुमाया होती है.

साल 1948 में इस जोड़ी की अगली फिल्म आई 'मेला'. इस फिल्म के गीत तो 'दर्द' की कामयाबी से भी आगे निकल गए. 'ये ज़िंदगी के मेले, दुनिया में कम न होंगे, अफसोस हम न होंगे' (रफी), 'गाए जा गीत मिलन के, तू अपनी लगन के, सजन घर जाना है' (मुकेश), शमशाद बेगम की आवाज़ में 'मोहन की मुरलिया बाजे', 'ग़म का फ़साना किसको सुनाएं', 'धरती को आकाश पुकारे, आ जा आ जा प्रेम द्वारे.'

साल 1950 के आते-आते एक फिल्म आई 'बाबुल'. ज़रा इस फिल्म के गीत याद कीजिए. तलत महमूद की लहराती-बलखाती मखमली आवाज़ में 'हुस्न वालों को न दिल दो ये मिटा देते हैं' और 'मेरा जीवन साथी बिछड़ गया, लो ख़त्म कहानी हो गई'. शमशाद बेगम के 'छोड़ बाबुल का घर, मोहे पी के बगर, आज जाना पड़ा'. 'पंछी बन में पिया-पिया गाने लगा' और 'लगन मोरे मन की बलम नहीं जाने' (लता मंगेशकर), शमशाद-तलत के दो युगल गीत- 'मिलते ही आंखें दिल हुआ दीवाना किसी का' और 'दुनिया बदल गई, मेरी दुनिया बदल गई' जैसे नग़मों की दौलत ज़माने को बतौर सौग़ात दिए हैं.

यह बात काबिले ज़िक्र और काबिले दाद है कि अपने दौर के कई सारे गीतकारों की तरह उन्होंने फिल्मों में अंधाधुंध गीत लिखने के ऊपर अपनी इल्मी शायरी को क़ुरबान नहीं किया.

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शकील बदायूनी के बारे में हमारे दौर के अज़ीम शायर फिराक़ गोरख़पुरी ने कभी जो कुछ कहा था वह उनके किरदार की एक झलक ज़रूर पेश करता है.

फिराक़ ने कहा था, 'फिल्मों में अपनी एक हद तक क़ाबिल-ए-रश्क कामयाबी के बाद भी वह शायरी और ग़ज़ल के मैदान से रू-पोश होने पर आमादा नज़र नहीं मालूम होते. उनके लिए हमको यह कहने का हक़ बिल्कुल नहीं रहा कि वो अपनी पुरानी शायरी की पिंशन पर ही सब्र कर चुके हैं.'

मशहूर प्रगतिशील शायर और फिल्म गीतकार मजरूह़ सुल्तानपुरी की बात सुन लें. उन्होंने शकील बदाऊंनी के बारे में कहा था, 'एक ग़ज़लगो शायर की हैसियत से मुझे शकील के मक़्तबे ख़याल से इख़तिलाफ़ (विरोध) सही, लेकिन ईमान की बात तो यह है कि जब भी मैने उनके मुंह से अच्छे शेर सुने हैं, रश्क (ईर्ष्या) किए बग़ैर नहीं रह सका.'

इंसान का वजूद कुल जमा दो तारीख़ों के बीच का वक़्फा भर है. शकील बदांयूनी के लिए यह दो तारीख़ें हैं-13 अगस्त और दूसरी 1970 की  20 अप्रैल. इन दो तारीख़ों के बाद इस दुनिया में उन दो तारीख़ों के बीच इंसान के अंजाम दिए हुए कारनामे होते हैं.

शकील बदायूंनी के कारनामे आज भी इस दौर में महज़ अपने उन्हीं बा-कमाल कारनामों की वजह से हमारे बीच मौजूद हैं. कुछ इल्मी और कुछ फिल्मी.

इस दुनिया का हर बशर मौत की हक़ीक़त से वाक़िफ होता है और ख़ासकर फनकार. शकील बदायूनी ने जाने से बहुत पहले ही हम सबके नाम एक पैग़ाम लिख दिया था जो इस तरह से है:

'न फ़ना मेरी, न बक़ा मेरी / मुझे ऎ शकील न ढूंढिये / मैं किसी का हुस्न-ए-ख़याल हूं / मेरा कुछ वजूदे-अदम नहीं.'

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