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...और इसलिए चेतन भगत मुझे पसंद है, आपको नहीं तो न सही

आज चेतन भगत का बर्थ डे है

Animesh Mukharjee | Published On: Apr 22, 2017 01:50 PM IST | Updated On: Apr 22, 2017 01:51 PM IST

...और इसलिए चेतन भगत मुझे पसंद है, आपको नहीं तो न सही

आज चेतन भगत का बर्थ डे है. इस लाइन के अलावा कोई और तरीका समझ ही नहीं आया बात शुरू करने का. चेतन भगत यानी वो आदमी जिसके बारे में उसकी किताबों से ज्यादा लिखा जा चुका है.

जिसकी किताबों की बिक्री किसी भी अच्छी खासी फिल्म को टक्कर दे सकती है. इसकी बुराई करने का सुख किसी भी हिंदी वाले के लिए बौद्धिक ऑर्गैजम की तरह है.

चेतन की तमाम बुराइयां कर लेने के बाद आज मुझे वो अचानक से सबसे अंडररेटेड लेखकों में से एक लगने लगे हैं. हो सकता है आप इस बात को पढ़कर हंस रहे हों मगर मेरे पास वजह हैं गिनाने के लिए.

अपने आप को पढ़वाने की काबिलियत उनसे ज्यादा किसी में नहीं

2005 की बात है हम हिंदीपट्टी के उन लोगों में से थे जिन्हें उस जमाने में अंग्रेजी की कॉमिक्स पढ़ने में डर लगता था. अंग्रेजी अच्छी करने के नाम पर संडे के रंगीन फीचर पेज की तस्वीरें पलटते-पलटते एक दिन अचानक से एक किताब का जिक्र सुना.

'5 पॉइंट समवन' इस किताब के टाइटल के बाद लिखी कैच लाइन 'वाट नॉट टु डू इन IIT' ने हमारी पूरी पीढ़ी को कैच कर लिया. वो लाखों लड़के जो अंग्रेजी फिल्म सबटाइटल के साथ भी नहीं देख पाते थे, उनको 250 पन्नों की एक बिना तस्वीरों वाली किताब जोंक की तरह पढ़वा डालने की कुव्वत किसी और में नहीं दिखी थी.

भगवान का कॉल आना अच्छा लगा था मुझे

हम सबको गोविंदा की तमाम फिल्में अच्छी लगीं थीं. हमें अजय देवगन का दो बाइक वाला स्टंट बहुत कूल लगा था. मिथुन की गुंडा, शक्तिमान और अल्ताफ राजा के गाने सब बड़े अच्छे लगे थे उस दौर में.

इसी तरह मुझे 'वन नाइट एट कॉल सेंटर' अच्छी लगी थी. अपनी-अपनी संघर्षों के साथ काम करते किरदार अच्छे लगे थे. भगवान का फोन आना भी बड़ा मजेदार लगा था.

आज हम क्रिस्टोफर नोलान की फिल्में और गेम ऑफ थ्रोन्स की बातें करते हुए 'चिल' होते हैं. 90 के अंत से 2000 के दशक के शुरुआती कुछ सालों की ज्यादातर चीजों को कल्ट और नॉस्टैल्जिया मानते हैं.

बस चेतन की किताबों को अछूत मान लेते हैं. यकीन मानिए अगर 'वन नाइट और पाइव पॉइंट जैसी किताबें ही थी जिन्होंने एक पूरी पीढ़ी को यकीन दिलाया कि वो बिना डिक्शनरी बगल में रखे अंग्रेजी की किताबें और लेख पढ़ समझ सकता है.

एक लेखक के तौर पर उसने हर तरह से मेरा खयाल रखा

मुझे भरपूर मनोरंजन देने वाली किताबें मिलीं. जब हमारी पीढ़ी आईआईटी के सपने देख रही थी तो आईआईटी के अंदर की सैर कराई. छोटे शहर से महानगर आकर चमकते शीशों वाली बिल्डिंग में करियर बनाने के दौर में कॉल सेंटर के किस्से सुनाए.

दोस्त की बहन से प्यार हो जाना मिस्टेक है पर पाप नहीं बताया. वो भी जेब पर बोझ डाले बिना. कॉलेज के समय में 90 रुपए की अंग्रेजी किताब खरीदने का सुख क्या होता है भूले तो नहीं है न.

सिर्फ मार्केटिंग नहीं है चेतन का लेखन

तीन दोस्तों की कहानियां, प्रेम कहानी, क्रिकेट और सफलता असफलता के दौर. इन सबको गुजरात दंगों की पृष्ठभूमि में समेट देना. 6 किरदारों के आपसी संघर्ष उनकी निजी जिंदगी की कड़वी हकीकतें.

ऑफिस में प्रोफेशनल बने रहने की सबकी मजबूरी को एक रात की कहानी में बैठाना पूरी तरह से मार्केटिंग नहीं है. चेतन भगत की किताबों को कालजयी क्लासिक मानने की बात तो शायद खुद चेतन भी न करें.

मगर चेतन की आलोचना अक्सर उनकी लोकप्रियता से पैदा हुई जलन के कारण होती है वाजिब वजहों से कम. और अगर सिर्फ मार्केटिंग से ही कॉन्टेंट बिकता तो लव स्टोरी लिख कर बढ़िया मार्केटिंग करने वाले तमाम दूसरे बेस्ट सेलिंग लेखक आज भी अपनी पहचान तलाश ही रहे हैं.

हां, मुझे कोफ्त होती है जब चेतन भगत उन चीजों पर राय देने की कोशिश करते हैं जिन पर कई बार उनकी समझ शायद दुरुस्त नहीं होती.

कई बार सरकार के खिलाफ या पक्ष में गलत तरीके से बातें रखने पर हंसी भी आती है. किताबों की मार्केटिंग के नाम पर कभी कभी कुछ उल-जुलूल हो जाता है. फिर भी मुझे उनकी ईमानदारी पसंद आती है.

वो अपनी राय रखते हैं, सही-गलत, कच्ची-पक्की, गंभीर-हास्यास्पद, मैं हंस लेता हूं, सोचता हूं कि ये आदमी क्यों हर मामले में टांग फंसाता है, पर अब लगता है कि ये ऐसा ही है. और दुआ करता हूं कि ऐसा ही रहे.

शुक्रिया चेतन तुम्हारे चेतन बने रहने के लिए.

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