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संकिसा: जहां बुद्ध के नाम पर जान देने और लेने की बातें होती हैं

शांति का संदेश फैलाने वाले भगवान बुद्ध के अनुयायी उनके नाम पर हिंसा तक के लिए तैयार हैं

Animesh Mukharjee Updated On: May 10, 2017 09:51 AM IST

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संकिसा: जहां बुद्ध के नाम पर जान देने और लेने की बातें होती हैं

बुद्ध के जीवन से जुड़ा एक धार्मिक स्थल है संकिसा. उत्तर प्रदेश में फर्रुखाबाद जिले के बॉर्डर पर बसे इस छोटे से गांव से कुछ दूर कंपिल है. वही कंपिल जिसका जिक्र महाभारत में द्रौपदी के मायके के तौर पर आता है.

दूसरी तरफ कुछ किलोमीटर पर बाबा नीम करोली का आश्रम है. ऐपल के संस्थापक स्टीव जॉब्स इन्हीं नीमकरोली बाबा से मिलने हिंदुस्तान आए थे. वो अलग बात है कि बाबा तब तक दुनिया छोड़ चुके थे और उनके एक दूसरे आश्रम में मिले कथित चेलों ने नौजवान स्टीव के साथ ऐसा व्यवहार किया कि वो अध्यात्म से उलट टेक्नोलॉजी की तरफ मुड़ गए.

मिस्टर जॉब्स की बात कभी और करेंगे फिलहाल बात करते हैं संकिसा की, जहां एक और छोटा-मोटा बाबरी-रामजन्मभूमि जैसा मुद्दा बना हुआ है. एक तरफ से बुद्ध के नाम पर खून बहाने और करारा जवाब देने की बातें होती हैं. दूसरा पक्ष भी सनातन धर्म की सहिष्णुता की कसमें खाकर तोड़फोड़ और गाली गलौज करता है.

संकिसा का इतिहास

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संकिसा बौद्ध स्तंभ

रामायण में संकिसा का जिक्र महाराज जनक के छोटे भाई कुशध्वज के राज्य के रूप में आता है. वहीं महाभारत और महाजनपद काल में इसे पांचाल का हिस्सा माना गया था. बौद्ध इतिहास में संकिसा का जिक्र अलग-अलग तरीके से आता है. बुद्ध साहित्य में इसकी गणना 20 महान शहरों में की गई है और गांव के 6 किलोमीटर की परिधि तक मिलने वाले अवशेष इसके उस काल में बड़े स्तर पर फैले होने की तस्दीक करते हैं.

बौद्ध मत के अनुसार, भगवान बुद्ध अपने शिष्य आनंद के कहने पर यहां आए थे. यहीं उन्होंने बौद्ध धर्म का द्वार स्त्रियों के लिए खोल दिया था. एक और कहानी की मानें तो मरने के बाद बुद्ध स्वर्ग से सीढ़ी के जरिए यहां उतरे थे. मगर जीवित रहते बुद्ध के संकिसा आने का जिक्र त्रिपिटक में नहीं है.

बुद्ध के खुद संकिसा आने या न आने की बात से इतर इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि संकिसा बौद्ध धर्म का बड़ा शहर रहा है. फाह्यान यहां आया था और उसने यहां हजार भिक्षुओं के रहने की बात कही थी. यहां स्कंदगुप्त के शासनकाल से जुड़े प्रमाण भी मिलते हैं.

सबसे बड़ी बात ये है कि अशोक का बनवाया एक स्तूप और स्तंभ भी यहां है. ये स्तंभ सारनाथ के शेर वाले स्तंभ जैसा ही है बस शेर की जगह यहां पर हाथी है. खुद को सनातन धर्म का मानने वाले लोग कहते हैं कि ये बिसारी देवी का मंदिर है. बिसारी देवी की पौराणिक या ऐतिहासिक मान्यता क्या है, कब से है, इसकी कोई ठोस जानकारी कम से कम इंटरनेट पर तो नहीं मिलती. मगर अशोक के बनवाए स्तूप पर एक छोटा सा 4-5 फीट का मंदिर बना हुआ है. हर साल बिसारी देवी के नाम पर एक मेला भी लगाया जाता है.

हर साल बुद्ध पूर्णिमा और शरद पूर्णिमा जैसे मौकों पर बिसारी देवी के भक्त और बौद्ध अनुयायी आमने-सामने हो जाते हैं. दोनों तरफ से भड़काऊ भाषणबाजी होती है. नारे लगते हैं. कुछ साल पहले तक पत्थरबाजी भी हो जाती थी. मगर फिलहाल मामले के अदालत में होने के कारण पुलिस ज़बरन शांति बनाए रखती है.

2014 में इस मामले ने खूब तूल पकड़ा था. दोनों तरफ से धर्म की खातिर जान देने की बातें भी हुई थी. स्थानीय दलितों के बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म अपना लेने के चलते घर वापसी, और अस्मिता के संकट जैसे ऐंगल भी आ गए थे.

2015 में यहां आए थे दलाई लामा और अखिलेश यादव

DALAI LAMA

इस विवाद का सबसे बड़ा नुकसान ये है कि दुनिया के 8 महत्वपूर्ण बौद्ध धार्मिक स्थानों में शामिल ये जगह पूरी तरह से पिछड़ी हुई है. जापान, म्यांमार, चीन, कंबोडिया जैसे देशों के मठ इस छोटे से गांव में बने हुए हैं. 2015 में दलाई लामा और अखिलेश यादव भी यहां आए थे. मगर स्थानीय लोगों को इन सबका या अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के आने का कोई भी फायदा नहीं मिलता.

आज की तारीख में संकिसा के आस-पास लोगों के पास रोजगार नहीं है, अच्छी पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं है. मगर हर कोई धर्म के नाम पर लड़ने और जान देने के लिए तैयार है. लखनऊ के आस-पास एक मजाकिया शेर अक्सर सुनाया जाता है. ओरिजनल शेर में सिरफिरे की जगह कोई और शब्द इस्तेमाल होता है आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं.

अपनी रजाई फूंक कर बैठे हैं तापने, ऐसे भी भला सिरफिरे देखे हैं आपने.

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