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प्रेम पर पहरा: तुम मेरे साथ रहो... मेरे कातिल, मेरे दिलदार...

जब आप प्रेम करते हैं तो वे तमाम दीवारें दरकती हैं जिन्हें धर्म ने समाज के ठेकेदारों ने अपने फायदे के लिए बनाया है

Nivedita Jha | Published On: Apr 02, 2017 08:09 AM IST | Updated On: Apr 02, 2017 08:09 AM IST

प्रेम पर पहरा: तुम मेरे साथ रहो... मेरे कातिल, मेरे दिलदार...

मेरे लिये प्रेम उतना ही सहज है जितना धूप, बारिश ,बादल, पानी. प्रेम तो घटा की तरह उमड़ कर आता है, जिससे आप भीतर तक भीग जाते हैं.

बारिश की झिर-झिर जैसे सुनाई देती है, प्रेम आपके भीतर वैसे ही बजता है. मैंने हर दिन प्रेम किया है. मुझे राम रधुराई के सांवले रंग से प्यार है. मुझे कामदेव से प्यार है. जिनकी वजह से पूरी कायनात मुहब्बत में गिरफ्तार है.

जब आपको लगे दरख्त झुककर बेलों पर छा गए, नदियां समंदर में जा मिलीं, जल-थल एक हुए, कोकिल की आवाज खुद मुहब्बत की आवाज बन गई. तो यकीनन आप प्रेम में हैं. प्रेम यही तो है. जो आपको यकीन दिलाए कि आप जिंदा कौम है.

अगर आप मनुष्य हैं तो प्रेम तो होगा ही. क्या कोई प्रेम विहीन दुनिया में जी सकता है? मनुष्य होने की पहली शर्त प्रेम ही है. इस देश के संविधान ने भी दो बालिग लोगों को प्रेम करने, अपने प्रेम के साथ रहने और जीने की आजादी दी है.

प्रेम आखिर अपराध क्यों?

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फिर क्या वजह है कि आज हमारे देश में प्रेम के विरुद्ध अभियान चलाया जा रहा है. प्रेम को अपराध की तरह देखा जा रहा है. कौन लोग हैं, जो प्रेम को हिंसा में बदलने की साजिश कर रहे हैं? कौन लोग हैं जो प्रेम को हिंसक और बदबूदार विचारों की आग में जला देना चाहते हैं?

प्रेम का जादू एक ऐसा विविधतापूर्ण कथानाक है, जिसे कितने ही स्वरों में गाया जा सकता है. और हर एक आदमी का प्रेम दूसरे आदमी के प्रेम से उतना ही अलग होगा जितने संगीत के दो स्वर. प्रेम का यह स्वर हर युग में हम सुनते रहे हैं.

सोहनी-महीवाल, हीर-रांझा, शीरी-फरहाद, लैला-मजनू और सस्सी-पुन्नु जैसे प्रेमी युगल सदियों से हमारे देश के जनमानस में रचे बसे हैं. जिनका प्रेम सांस्कृतिक प्रतीकों में बदल गया जिसे ना तो सामाजिक निषेध और ना ही दुनियाबी रस्मों-रिवाज छू पाते हैं.

उसी देश में प्रेम एक अपराध है. उसी देश में प्रेम को ‘लव जेहाद’ कहा जा रहा है. उसी देश में प्रेमियों पर पहरा बिठाया जा रहा है. जिस रोमियों को इतिहास में हम प्रेम के लिए मर मिटने के लिए जानते हैं, आज उसे हमारी सत्ता प्रेम पर पहरा बिठाने के लिए इस्तेमाल कर रही है.

सिर झुकाने का मतलब है प्रेम

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नाटक रोमियो जूलियट का एक दृश्य

ये हमारी सभ्यता और इतिहास के साथ बलात्कार है. जो लोग प्रेम के विरुद्ध खड़े हैं वे भाषा, जाति, धर्म, संप्रदाय, लिंग-विभेद के साथ खड़े हैं. जब आप किसी से प्रेम करते हैं तो उस समय सारी दीवारें टूट जाती हैं.

प्रेम करने का मतलब है एक-दूसरे के लिए सर झुकाना. एक-दूसरे की खुशी में शामिल होना. महान नाटककार कामू कहते हैं- प्यार तो धीरे-धीरे सर झुका देता है.

जिनकी गर्दन अकड़ी हुई हो, सिर उठा हुआ हो, आंखें जमी हुई हों उनके अभिमानी दिल में प्यार क्या करेगा?

महान नर्तकी इजाडोरा कहती हैं- 'कितना अजीब और परेशानी भरा है एक मनुष्य के हाड़-मांस के माध्यम से उसकी आत्मा तक पहुंचना. हांड, मांस के आवरण के जरिए आंनद, उत्तेजना और मोह को तलाशना. सबसे बढ़कर इस आवरण के जरिए उस चीज को तलाशना, जिसे लोग खुशी कहते हैं और उस चीज को जिसे लोग प्रेम कहते हैं.’

सत्ता के सम्मुख सच कहने का साहस है प्रेम 

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प्रेम दरअसल तमाम सत्ता को चुनौती देता है. इस वजह से प्रेम उन लोगों के लिए खतरा है जो अपनी अपनी सत्ता बनाये रखना चाहते हैं. जब आप प्रेम करते हैं तो वे तमाम दीवारें दरकती हैं जिन्हें धर्म ने समाज के ठेकेदारों ने अपने फायदे के लिए बनाया है.

सबसे पहले घर की जंजीरें टूटती हैं. यही वजह है जब यूपी में प्रेम पर पहरा बिठाया गया तो मां-बाप खुश हुए. हम ऐसा माहौल नहीं बनाना चाहते जहां हमारी नई पीढ़ी खुली हवा में सांस लें, जहां वे जान सके की प्रेम का सही मतलब क्या होता है और एक जिम्मेदार प्रेमी होना क्या होता है.

इस वजह से अब यूपी के शिक्षण संस्थानों में पुलिस सादे वेश में पहरा देगी. ये पहरा सिर्फ प्रेम पर नहीं है. ये पहरा हमारे खान-पान, पहने, ओढ़ने, सोचने, विचारने और बोलने-लिखने पर भी है.

मनुष्यता की कसौटी है प्रेम 

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यह संयोग नहीं है कि जब कोई कविता लिखती है तो उसे बलात्कार की धमकी दी जाती है. हमारा समाज स्त्री को एक माल की तरह देखता है. उसे लगता है कि किसी कौम, समुदाय या व्यक्ति से बदला लेने का यह तरीका सबसे कारगर है कि एक स्त्री के साथ बलात्कार कर दिया जाय.

स्त्री गुलाम है, भोगने की वस्तु है इसलिए उसपर हमला परिवार के पौरुष पर हमला है. इतने हिंसक और घृणा के इस वातावरण में मुझे लगता है प्रेम ही है, जो हमें बचा सकता है.

प्रेम ही है जो हमें मनुष्य बने रहने में मददगार हो सकता है. मेरी उम्मीद नई पीढ़ी है. मैं यकीन के साथ कह सकती हूं कि ये पीढ़ी प्रेम के पक्ष में रहेगी. ये पीढ़ी सारी वर्जनाओं के विरुद्ध खड़ी होगी. मैं फैज की तरह कहना चाहती हूं अपनी नयी पीढ़ी से- ‘तुम मेरे साथ रहो मेरे कातिल मेरे दिलदार.’

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