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क्या वाकई अमीर खुसरो ना होते तो ख़याल गायकी ना होती!

ख़याल गायकी को ध्रुपद और ठुमरी के बीच की शैली माना गया है

Shivendra Kumar Singh | Published On: Jul 02, 2017 02:36 PM IST | Updated On: Jul 02, 2017 07:16 PM IST

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क्या वाकई अमीर खुसरो ना होते तो ख़याल गायकी ना होती!

शास्त्रीय संगीत में आपने एक शब्द कई बार सुना होगा- ख़याल गायकी. आखिर क्या है ये ख़याल गायकी? इसे कैसे गाते हैं? इसकी खासियत क्या क्या है? इस तरह के सवाल अगर आपके मन में आते हैं तो आज हम आपको गायकी की इस शैली के बारे में बताएंगे.

इसके बाद अगर आपको शास्त्रीय संगीत के किसी कार्यक्रम में जाने का मौका मिला तो जरूर जाइएगा. अगली बार आपको ख़याल गायकी समझ आएगी. पूरी तरह ना सही तो कम से कम इतना फर्क तो जरूर पड़ेगा कि आप ये महसूस करेंगे कि आपको कुछ समझ में आ रहा है.

पुरानी और सबसे प्रचलित शैली 

ख़याल गायकी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सबसे पुरानी शैलियों में से एक है. पुरानी होने के साथ साथ आज भी शास्त्रीय गायकी का ये अंदाज सबसे ज्यादा प्रचलित और प्रमुख माना जाता है.

ख़याल गायकी को ध्रुपद और ठुमरी के बीच की शैली माना गया है. जिसमें राग की शुद्धता के साथ साथ भाव पक्ष पर भी पूरा जोर दिया जाता है. इस शैली को खोजने और अपनाने वाले पहले कलाकार हैं हजरत अमीर खुसरो. वैसे अगर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में हजरत अमीर खुसरो के दूसरे योगदानों की भी चर्चा करें तो समझ आता है कि अमीर खुसरो ना होते तो शायद हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत भी नहीं होता.

ख़याल गायकी के विस्तार की बात करें उससे पहले भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी का राग खमाज भटियार सुनिए

ऐसे शुरू हुई ख़याल गायकी

माना जाता है कि ख़याल गायकी का अविष्कार 12वीं शताब्दी में महान संगीतकार और कवि हजरत अमीर खुसरो ने किया था. ये उस दौर की बात है जब अमीर खुसरो गयासुद्दीन बलवन के आश्रय में रहते थे. इतिहास में दर्ज है कि जब गुलाम घराने का अंत हो गया तो अमीर खुसरो खिलजी वंश के नौकर हो गए. अलाउद्दीन खिलजी ने युद्ध में देवगिरी के राजा को हराया था. उस वक्त अमीर खुसरो उनके साथ थे.

देवगिरी में एक महान शास्त्रीय विद्वान रहा करते थे गोपाल नायक. अमीर खुसरो चाहते थे कि वो उन्हें अपने साथ दिल्ली ले चलें. खुसरो को लगा कि गोपाल नायक इसके लिए सहजता से तैयार नहीं होंगे इसके लिए उन्होंने एक प्रतियोगिता की, जिसमें छल करके गोपाल नायक को हराया और उसके बाद उन्हें अपने साथ दिल्ली ले आए.

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अमीर खुसरो ने दक्षिण के शुद्ध स्वरों को प्रचलित किया. नए-नए रागों की रचना की. इसके अलावा इन नए नए रागों में गाने के लिए गीतों की रचना की. यही गीत दरअसल आज ‘ख़याल’ के नाम से मशहूर हैं. यही वजह है कि कहा जाने लगा कि खुसरो ना होते तो ख़याल गायकी भी ना होती.

हजरत अमीर खुसरो के बाद जौनपुर के सुल्तान मोहम्मद शारूकी और हुसैन शारूकी ने भी 14वीं शताब्दी में इस शैली को खूब बढ़ावा दिया. यहां आपको बताते चलें कि शास्त्रीय रागों में प्रचलित राग जौनपुरी को यहीं की पैदाइश माना जाता है.

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इसके बाद जिन दो कलाकारों की बात करना बहुत जरूरी है वो हैं अदारंग और सदारंग. ये दोनों ही कलाकार 18वीं शताब्दी में मुगल शासक मोहम्मद शाह रंगीला के दरबारी गायक थे. कहते हैं कि इनके पास ख़याल गायकी की बंदिशों का भंडार था. ख़याल गायकी लोकप्रिय तो हो रही थी लेकिन अब भी आम लोगों तक, संगीत रसिकों तक नहीं पहुंची थी. उसका गाना बजाना राजमहलों में ही चल रहा था.

20वीं शताब्दी की शुरुआत में ख़याल गायकी राजदरबारों से निकलकर मंच तक पहुंची. ग्वालियर, किराना, आगरा, पटियाला और मेवाती घरानों के कलाकारों ने ख़यालगायकी की लोकप्रियता को चार चांद लगा दिए. बड़े गुलाम अली खान ख़याल गायकी सुनाते हैं आपको

ख़याल की खासियत 

ये बात तो समझ में आ ही जाती है कि ख़याल एक फारसी शब्द है जिसका मतलब होता है कल्पना या विचार. ख़याल गायकी के साथ आम तौर पर ये धारणा है कि ये एकल गायन है. हां, कुछ कलाकार ऐसे जरूर हुए हैं जो ख़याल गायकी को जोड़ी में गाते हैं. पद्मभूषण से सम्मानित कलाकार पंडित राजन-साजन मिश्र का उदाहरण दिया जा सकता है.

ख़याल गायकी के दो मुख्य अंग होते हैं- स्थायी और अंतरा. इसमें राग के विस्तार, श्रृंगार और भक्ति की पूरी संभावना होती है.

ख़याल गायकी की लोकप्रियता को कुछ ऐसे भी समझा जा सकता है कि अलग अलग घराने के कलाकार इसे गा तो रहे ही थे धीरे-धीरे वाद्ययंत्रों पर ख़याल बजाया जाना भी शुरू हो गया. दिग्गज कलाकार नजाकत-सलामत अली का ये वीडियो देखिए

ख़याल गायकी की खूबियों को भी आपको बताते हैं. इस गायकी में किसी भी राग के स्वरों में आलाप षडज के साथ शुरू किया जाता है. साथ ही ये जानना भी बहुत जरूरी है कि ख़याल गायकी में छोटा ख़याल और बड़ा ख़याल गाया जाता है.

बड़े ख़याल में स्थायी का विस्तार विलंबित लय में किया जाता है. ख़याल का विस्तार आलाप, बोल-आलाप, सरगम और तान के साथ किया जाता है. ज्यादातक मौकों पर ये एक ताल, तीन ताल, तिलवाड़ा, झुमरा या रुपक में होता है. बड़े ख़याल को खत्म करते वक्त द्रुत लय में तानों को गाया जाता है. इसके बाद छोटा ख़याल शुरू होता है जो ज्यादातर एक ताल या तीन ताल में होता है.

छोटा ख़याल में आलाप, बोल-आलाप के साथ स्थायी और अंतरे पर तान, सरगम और लयकारी का प्रदर्शन किया जाता है. आखिर में स्थायी की तिहाई लेते हुए सम पर गायकी को खत्म किया जाता है.

ब्रज और अवधी में हैं ख़याल की बंदिशें 

ब्रज और अवधी में लिखी गई बंदिशें राग के स्वरों में सजकर जब संगीत प्रेमियों के बीच पहुंचती है तो ख़याल गायकी को एक नया विस्तार मिलता है. ज्यादातर बंदिशें प्रेम, गुरू वंदना, भक्ति, श्रृंगार, कृष्णलीला जैसे विषयों को ध्यान में रखकर लिखी गई हैं. जो सदारंग-अदारंग, प्रेमपिया, सनदपिया, सबरंग ने लिखी हैं.

ख़याल गायकी का माधुर्य पक्ष यानी इसकी सुंदरता राग, स्वर, ताल, बंदिश और लयकारी में है. इसके विस्तार पक्ष में आलाप, बहलावा, तान, बोलतान और सरगम है. भाव पक्ष में स्वर सौंदर्य, रंजक्ता, प्रकृति, मींड, गमक और खटका का प्रयोग होता है. ख़याल गायकी में संगत के तौर पर तबला, तानपुरा, सुरमंडल, हारमोनियम और सारंगी का इस्तेमाल किया जाता है.

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ख़याल गायकी में उस्ताद अमीर खान, बड़े गुलाम अली खान, पंडित भीमसेन जोशी, मल्लिकार्जुन मंसूर, पंडित कुमार गंधर्व जैसे कलाकारों का नाम अमर है. मौजूदा समय में पंडित जसराज, पंडित राजन साजन मिश्रा, पंडित अजय चक्रवर्ती, उस्ताद राशिद खान, श्रीमती प्रभा आत्रे, शुभा मुदगल जी ख़याल गायकी के बड़े नाम हैं.

इस नई सीरीज में पिछली बार हमने आपको शास्त्रीय गायन की सबसे पुरानी शैली ध्रुपद के बारे में बताया था. इस बार बात हुई ख़याल गायकी की, अगली बार हम आपको ख़याल गायकी के घरानों से परिचित कराएंगे. आपको बताएंगे उन घरानों की खासियतें और उनके बड़े कलाकारों की कहानी.

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