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सरकारी धन से चलेगा एएमयू, फिर कैसा अल्पसंख्यक दर्जा?

भारत धर्मनिरपेक्ष राज्य है, इसलिए एएमयू को करदाताओं का पैसा नहीं मिल सकता.

Tufail Ahmad | Published On: Nov 21, 2016 06:07 PM IST | Updated On: Nov 21, 2016 06:09 PM IST

सरकारी धन से चलेगा एएमयू, फिर कैसा अल्पसंख्यक दर्जा?

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) का अल्पसंख्यक दर्जा हाल के समय में कानूनी और राजनीतिक बहस का विषय रहा है.

17 जुलाई को केंद्रीय कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा, “सरकारी पैसे से चलने वाला एएमयू अल्पसंख्यक टैग नहीं रख सकता.”

इससे पहले, 11 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने एएमयू को सरकार के कदम पर जबाव देने के लिए चार हफ्ते का समय दिया था.

सरकार ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले का बचाव किया कि यह यूनिवर्सिटी एक अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है. 2005 में हाई कोर्ट के एक जज ने आदेश पास किया जिसमें एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे और मुसलमानों को 50 प्रतिशत आरक्षण देने के उसके फैसले को 'असंवैधानि' बताया गया.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत, अल्पसंख्यक समुदायों के पास अपनी सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण और शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने का अधिकार है. अनुच्छेद 30(1) कहता है,

'सभी अल्पसंख्यक समुदाय, चाहे वे धर्म पर आधारित हो या भाषा पर, उनके पास अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उन्हें चलाने का अधिकार होगा.'
इसलिए संविधान मुसलमानों या अन्य अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और चलाने से नहीं रोकता.

एएमयू की स्थापना मुसलमानों की वैज्ञानिक प्रगति के लिए एक कॉलेज के तौर पर हुई थी. ऐसे अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए जरूरी धन खुद अल्पसंख्यक समुदाय की तरफ से दिया जाना चाहिए, ना कि भारतीय राज्य की तरफ से.

एएमयू में भेदभाव

जिस मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना सर सैयद अहमद खान ने 1875 में की थी, उसे भंग करके अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को भारतीय संसद में पारित एक कानून के जरिए दोबारा स्थापित किया गया था.

इसी वजह से एएमयू पर संविधान के प्रावधान लागू होंगे. चूंकि संविधान अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने का अधिकार देता है, लेकिन अगर उन्हें चलाने के लिए पैसा भारतीय राज्य की तरफ से आए तो ये संस्थान अपना अल्पसंख्यक चरित्र बनाए नहीं रख सकते.

भारत धर्मनिरपेक्ष राज्य है, इसलिए एएमयू को करदाताओं का पैसा नहीं मिल सकता. अनुच्छेद 30(2) के अनुसार राज्य अल्पसंख्यक संस्थानों को आर्थिक मदद दे सकता.

लेकिन एएमयू का मामला सरकारी आर्थिक मदद का मामला नहीं है, बल्कि ये भारतीय राज्य की तरफ से मुख्यतः अल्पसंख्यक समुदाय के लिए चल रहे एक संस्थान को पूरी मदद देने और उसे चलाने का मामला है.

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एएमयू के साथ एक अन्य मुद्दा यह भी है कि यह एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी है. इसका मतलब है कि देश में राष्ट्रीय महत्व का एक संस्थान किसी धर्म के साथ जुड़ाव नहीं रख सकता, न किसी एक धर्म की शिक्षाओं को बढ़ावा दे सकता है और न ही किसी एक धार्मिक समुदाय के छात्रों को बड़ी संख्या में दाखिला दे सकता है.

सभी सेंट्रल यूनिवर्सिटियों को छात्रों के बीच राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत करना चाहिए. ऐसा तभी होगा जब भारत के सभी समुदायों और धर्मों के लोगों को एएमयू में प्रतिनिधित्व दिया जाएगा और वह भी धर्म, क्षेत्र या जाति के आधार पर भेदभाव किए बिना.

एएमयू ने 2004 में मेडिकल कोर्सों में 50 प्रतिशत सीटें मुसलमानों के लिए आरक्षित कर दीं जो संविधान का उल्लंघन है क्योंकि भारतीय संसद में पारित कानून के तहत बनाई गई कोई यूनिवर्सिटी धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं कर सकती.

सरकारी पैसे से रुढ़िवाद की पढ़ाई

एएमयू नेतृत्व को अल्पसंख्यक मानसिकता से बाहर निकलना होगा. वे अपना अल्पसंख्यक चरित्र बनाए रखने की जिद छोड़ दें क्योंकि इससे भारतीय मुसलमानों के बीच यह गलत संदेश जाता है कि उनकी परवाह करने वाली सिर्फ एक ही यूनिवर्सिटी है. तथ्य इसके विपरीत है: भारत के मुसलमान देश के अन्य नागरिकों के समान अपने शैक्षिक उत्थान के लिए हजारों कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों में पढ़ सकते हैं.

उत्तर भारत और खास तौर से उत्तर प्रदेश और बिहार के मुसलमान एएमयू को ही अपने लिए अकेला विकल्प मानते हैं.
ये रुझान उनके भीतर भारत की सामाजिक मुख्यधारा से बौद्धिक अलगाव को जन्म देता है.

यह अलगाववाद मुसलमानों के हितों को नुकसान पहुंचाता है. एएमयू से उठा बौद्धिक अलगाववाद ही था जिसने पाकिस्तान के आंदोलन को जन्म दिया और फिर पाकिस्तान बना. आज भी भारत की पीड़ा का कारण है.

इससे भी अधिक चिंता वाली स्थिति यह है कि धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणतंत्र इस बारे में स्पष्ट नहीं है कि सभी धर्मों से दूरी कैसे बनाए. सभी राजनेताओं के भीतर पॉलिटिकल करेक्टनेस की मानसिकता के कारण, धर्मनिरपेक्ष भारतीय राज्य इस्लाम और उसके धार्मिक रुढ़िवाद के लिए पैसा मुहैया कराता है.

उदाहरण के लिए एएमयू में, भारतीय राज्य शिया और सुन्नी धर्मशास्त्रों के अध्ययन के विभागों को पैसा मुहैया करा रहा है. नॉन टीचिंग स्टाफ के अलावा इन विभागों में दर्जनों शिक्षाविदों को नौकरी दी गई है, जिनमें कुछ प्रोफेसर रैंक के हैं और ये लोग मुसलमानों को धार्मिक रुढ़िवादिता पढ़ाने के लिए एक धर्मनिरपेक्ष राज्य से वेतन ले रहे हैं.

इन दोनों विभागों को भारतीय राज्य की तरफ से धन मुहैया कराना संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र का उल्लंघन है. न सिर्फ एएमयू में बल्कि कई और यूनिवर्सिटियों में, भारतीय राज्य इस्लामी अध्ययन के विभागों के लिए पैसा मुहैया करा रहा है जिसे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में स्वीकार नहीं किया जा सकता है.

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धर्म की जाल में मुसलमान

एएमयू मुद्दे के व्यापक परिणाम होंगे. यह धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए बिल्कुल उचित नही है कि वह मदरसे चलाने के लिए पैसे दे. ये मदरसे शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि धार्मिक विचारों की आजादी के आंदोलन में बाधा हैं और मुसलमानों के बीच धार्मिक रुढ़िवाद को बढ़ावा देते हैं.

इस तरह भारतीय राज्य मुसलमानों को उनके धार्मिक खोल में बनाए रखने के लिए मदरसों और धार्मिक शिक्षा के विभागों को आर्थिक मदद दे रहा है.

मदरसों और इस्लामी अध्ययन विभागों को भारतीय राज्य की तरफ से पैसा दिए जाने से ऐसे मौलवियों और प्रोफेसर की जमात तैयार होगी जो मुसलमानों के बीच रुढ़िवाद को फैलाएंगे. लगता है भारतीय राज्य ने मुस्लिम बच्चों को पढ़ाने की अपनी जिम्मेदारी त्याग दी है.

भारत के मुस्लिम नेतृत्व को यह बात भी माननी होगी कि एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा मुसलमानों के बीच घेटो (अपने ही सीमित दायरे में रहने) की मानसिकता को जन्म देगा और वह सोच ही नहीं पाएंगे कि दूसरी यूनिवर्सिटीज में भी वो दाखिला ले सकते हैं.

इस तरह की घेटो मानसिकता मुसलमानों के बीच पीड़ा, हार मान लेने और पीड़ित बने रहने की भावना को जन्म देगी. एएमयू में छात्रों के बीच इस तरह का सामाजिक अलगाव तब उनकी प्रगति और एकीकरण में बाधा बनता है जब वह यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद देश की मुख्यधारा में कैरियर बनाने निकलते हैं.

आमतौर पर एएमयू से पढ़ाई करने वाले युवा मुसलमान सिर्फ मुसलमानों के फायदे की बात सोचते हैं, सारे भारतीयों के फायदे की नहीं. एनडीए सरकार की तरफ से एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे का विरोध न सिर्फ संवैधानिक रूप से सही है बल्कि इसके जरिए मुसमलानों को देश का पूरा नागरिक माना जा रहा है. इससे पहले की कांग्रेस सरकारें तो मुसलमानों को आधा ही नागरिक समझती रही है जो उनकी वोट बैंक की राजनीति के लिए बिल्कुल माकूल हैं.

भारत की सामाजिक मुख्यधारा में मुसलमानों के एकीकरण के लिए भारत सरकार को न सिर्फ एएमयू पर नजर रखनी चाहिए बल्कि सरकारी पैसे से चलने वाली दूसरी यूनिवर्सिटियों को भी देखना चाहिए कि कहीं वो मुसमलानों को देश की मुख्यधारा से अलग तो नहीं कर रही हैं.

उदाहरण के लिए, नई दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया में भारतीय राज्य धर्म का तुलनात्मक अध्ययन करने वाले एक केंद्र को पैसे देता है, जो ठीक है. लेकिन वहीं इस्लामिक अध्ययन केंद्र को भी पैसा दिया जा रहा है जो ठीक नहीं है. भारत की विभिन्न यूनिवर्सिटियों में इस्लामी अध्ययन विभाग पूरी तरह भारतीय राज्य के पैसे से चल रहे हैं लेकिन भारत के व्यापक लोकतांत्रिक बौद्धिक संवाद में उनका कोई योगदान नहीं है. उनका काम सिर्फ मुसलमान समुदाय को धर्म के जाल में फंसाए रखना है और इस काम के लिए धन मुहैया कराना भारतीय राज्य की जिम्मेदारी नहीं हो सकती.

यह लेख सबसे पहले न्यू एज इस्लाम में प्रकाशित हुआ था जो इस्लाम को जकड़ने वाली रुढिवादिता का विरोध करने वाले मुसलमानों का एक डिजिटल नेटवर्क है. ये लोग सहिष्णुता बहुलतावाद और बहुसंस्कृतिवाद की आध्यात्मिक परंपराओं की समृद्ध विरासत को बढ़ावा देते हैं. उनकी अनुमति से यहां इसे फिर से छापा गया है.

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