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भारत के लिए कितना गंभीर है जिहादी खतरा?

भारत के बहुत से राज्यों में कट्टरपंथ बढ़ रहा है.

Tufail Ahmad | Published On: Dec 02, 2016 08:08 AM IST | Updated On: Dec 02, 2016 08:08 AM IST

भारत के लिए कितना गंभीर है जिहादी खतरा?

13 अगस्त को तुफैल अहमद ने अपनी नई किताब 'जिहादिस्ट थ्रेट टू इंडिया: द केस फॉर इस्लामिक रिफॉर्मेशन बाई एन इंडियन मुस्लिम' के लॉन्च पर एक व्याख्यान दिया. हैदराबाद में इस कार्यक्रम को सोशल कॉज ने कराया था. इस्लाम के विभिन्न पहलुओं, इस विभिन्न व्याख्याओं और धारणाओं को छूते हुए तुफैल के व्याख्यान को यहां तीन हिस्सों में पेश किया जा रहा है. इसका पहला हिस्सा  'इस्लाम लोगों के बीच भेद पैदा करता है ' के नाम से और दूसरा  हिस्सा 'क्या आतंकवाद इस्लामी है? जिहादियों की पांच दलीलें ' के नाम  से पहले ही प्रकाशित हो चुका है.यहां इसका तीसरा और आखिरी हिस्सा दिया जा रहा है-

भारत को इन छह स्रोतों से जिहादी खतरा है-

1. पाकिस्तान सरकार समर्थित जिहाद, खास कर कश्मीर में 2. बांग्लादेश, जहां जिहादी मजबूत हो रहे हैं 3. पश्चिम एशिया के जिहादी गुटों में वृद्धि 4. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिहाद को नियंत्रित करने में बड़ी शक्तियों की नाकामी 5. कानून के राज को मजबूत करने में भारतीय राज्य की नाकामी 6. उर्दू अखबारों, इस्लामी मौलवियों और साथ ही मुसलमान और हिंदू-इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा भारतीय मुसलमानों को कट्टर बनाया जाना. हिंदू-इस्लामी कट्टरपंथी, मतलब वो हिंदू जो इस्लामी कट्टरपंथियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देते हैं.

इनमें से पाकिस्तानी खतरे से निपटने में भारत सैन्य रूप से सक्षम है. पश्चिमी एशिया से पैदा होने वाले जिहाद का खतरा अगले दशक में भी बना रहेगा. लेकिन इस्लामिक स्टेट जैसे गुट अगर भारत से भर्तियां करने में कामयाब होते हैं तो इसके लिए उर्दू पत्रकार और इस्लामी मौलवी जिम्मेदार हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनका समर्थन करते हैं.

भारत के बहुत से राज्यों में कट्टरपंथ बढ़ रहा है, खासकर महाराष्ट्र, हैदराबाद और केरल में. यह एक गंभीर खतरा है.

सुल्तान शाहीन ने लिखा है कि भारत से और खास तौर से हैदराबाद से 1920 दशक में लगभग 18 हजार मुसलमान ओटोमान खिलाफत के समर्थन में लड़ने के लिए तुर्की गए थे. पाकिस्तान के उर्दू अखबार रोजनामा एक्सप्रेस के 20 जुलाई 2016 के अंक में पाकिस्तानी लेखक अब्दुल कादिर हसन ने लिखा कि 1920 के दशक की शुरुआत में भारत की मुस्लिम महिलाएं तुर्की के पुरूषों को अपने गहने भेजती थीं ताकि वे जिहाद कर सकें.

तलवार से जिहाद

आज के दौर में, यहां हैदराबाद में, भाई इमरान, जो जाकिर नायक का छोटा संस्करण हैं, अपने भाषणों से मुसलमानों में कट्टरपंथ फैला रहे है. भाई इमरान का असली नाम मुजतबा हुसैन है और वह हैदराबाद इस्लामिक रिसर्च एंड एजुकेशनल फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं. इस साल मार्च में मुसलमानों से उन्होंने कहा, 'कुछ लोग कहते हैं कि इस्लाम ने जब भी तलवार उठाई तो अपनी रक्षा के लिए उठाई. ऐसा वे लोग कहते हैं जिन्हें ज्यादा जानकारी नहीं है.' फिर वह अल्लाह की तरफ से बताए गए जिहाद के दो प्रकारों की बात करते हैं- जिहाद बिस सैफ (तलवार से जिहाद) का आक्रामक स्वरूप और रक्षात्मक स्वरूप. एक अन्य कार्यक्रम में उन्होंने कहा- 'जब तवहीद (इस्लामी एकेश्वरवाद) की बात करें तो रक्षात्मक होने की जरूरत नहीं है. अगर तवहीद के लिए मर जाते हैं तो हमें इसका कोई मलाल नहीं होना चाहिए क्योंकि हमारा जन्म ही इसी के लिए हुआ है. अल्लाह के लिए हमारी कुरबानी से अच्छी मौत भला और क्या होगी.'

sword and islam

23 जून को पटना के रोजनामा संगम, लखनऊ के रोजनामा सहाफत और मुंबई के रोजनामा इंकलाब समेत बहुत से उर्दू अखबारों ने 'गजवा ए बदर' का जश्न मनाते हुए संपादकीय लिखे. 'गजवा ए बदर' पैगंबर मोहम्मद के नेतृत्व में काफिरों के खिलाफ पहला युद्ध था. जब 2014 में घर वापसी (मुसलमानों को फिर से हिंदू बनाए जाने) का विवाद चल रहा था तो मुंबई से निकलने वाले रोजनामा उर्दू टाइम्स ने एक बड़ा सा लेख छापा जिसमें पैगंबर मोहम्मद, इस्लाम के पहले चार खलीफाओं के साथ साथ पैगंबर की पत्नी हजरत आयशा के हवाले से कहा गया कि इस्लाम को छोड़ने वाले मुसलमान का सिर कलम कर दिया जाना चाहिए. इसमें कहा गया- 'कुरान की पहली व्याख्या करने वाले पैगंबर मोहम्मद ने साफ तौर पर धर्मभ्रष्ट होने वाले की हत्या का आदेश दिया है.'

journalism

जहरीली पत्रकारिता

शाहिद सिद्दिकी के संपादन में निकलने वाली साप्ताहिक पत्रिका 'नई दुनिया' मुसलमानों के बीच षड्यंत्रकारी बातों को हवा दे रही है. अपने एक अंक में, पत्रिका ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मक्का के काबा में परमाणु हमला करने की योजना बनाई है. इससे भारतीय मुसलमानों को अमेरिका के खिलाफ जिहाद करने के लिए सीधे तौर पर भड़काया गया. एक अंक में पत्रिका ने लिखा कि पाकिस्तान की इंटर सर्विसेज इंटेलीजेंस (आईएसआई) और भारतीय खुफिया एजेंसियों ने मिलकर नरेंद्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बनाने की योजना तैयार की है. हाल ही में नई दुनिया ने एक किताब 'और तलवार टूट गई' को सिलसिलेवार प्रकाशित करना शुरू किया है. इस किताब को उर्दू लेखक नसीम हिजाजी ने लिखा है जो जिहादी मानसिकता को पालने पोसने के लिए जाने जाते हैं.

मेरा निष्कर्ष ये है कि आईएस और अल कायदा भारत से मुसलमानों को आकर्षित करने और भर्ती करने में इसलिए कामयाब होते हैं क्योंकि यहां पहले से ही जिहाद से हमदर्दी रखने वालों का एक ढांचा मौजूद है जिसे इस्लामी मौलवी, जाकिर नाइक और भाई इमरान जैसे उपदेशक और उर्दू अखबारों-पत्रिकाओं के लिए काम कर रहे पत्रकारों के रूप में छिपे हुए कट्टरपंथी बढ़ावा देते हैं.

सवाल यह है कि क्या हमें चिंतित होना चाहिए? मेरा जबाव यह है: अगर आप एक भारतीय हो और किशोर अवस्था से जवानी में दाखिल हो रहे हैं, तो आपका काम है खूब पढ़ो, खूब काम करो और मोहब्बत करो. मोहब्बत हर जगह है और इंसानों के तौर पर यह हमें ऊपर उठाती है. लेकिन जब आप प्यार में पड़ें तो इसे शादी में तब्दील करने की कोशिश न करें. अपने प्यार को पवित्र रहने दें. और फिक्र न करें. जिहादी कभी हमारी सड़कों, हमारे शहरों और हमारी सरकारों पर कब्जा नहीं कर सकते. लेकिन अगर आप एक पुलिसकर्मी, एक सैनिक, एक सरकारी अधिकारी या एक खुफिया एजेंट हैं तो मैं कहूंगा कि सियासत की परवाह किए बिना सुरक्षा खतरों को गंभीरता से लेना चाहिए.

मैं नहीं चाहता कि आप मेरे बारे में कोई गलतफहमी रखें कि मैं धर्म के तौर पर इस्लाम के बारे में बात कर रहा हूं. यहां मैं इस्लाम के किस्सों, नजरिए और विचारों के प्रवाह की बात कर रहा हूं. पैगंबर मोहम्मद सिर्फ ईसा मसीह और महात्मा गांधी की तरह एक पैगबर नहीं थे, जो जीवन से कोई भौतिक सुख नहीं चाहते थे. वह पैगंबर थे, राजनेता थे, योद्धा शासक थे, एक ऐतिहासिक नेता थे जिनके विचार आज भी महत्व रखते हैं. सुल्तान शाहीन साहब ने कहा था कि अगर आप हिंसक धर्म के तौर पर इस्लाम में विश्वास करते हैं, तो फिर सुधार कैसे शुरू होगा? असल में जब तक आप यह नहीं मानोगे कि इस्लाम शांति का धर्म होने के साथ-साथ शांति का धर्म नहीं है, तब तक आप इस्लामी सुधार शुरू नहीं कर सकते.

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कट्टरपंथ से निपटने के शांतिपूर्ण तरीके

जहां कही आतंकवाद होगा, पुलिसकर्मी और सैनिक उससे सैन्य और कानूनी तरीकों से निपटेंगे. लेकिन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में भी जिहादवाद से निपटने के शांतिपूर्ण तरीके हैं. मिसाल के तौर पर सऊदी अरब सिनेगॉग बना सकता है, अपने यहां काम करने वाले भारतीयों के लिए चर्च और मंदिर बना सकता है. इससे दुनिया भर के मुसलमानों में बहुलतावाद का शक्तिशाली संदेश जाएगा. पाकिस्तान भी अपना संविधान बदलते हुए किसी गैर मुसलमान को अपना राष्ट्राध्यक्ष बना सकता है. इंडोनेशिया अहमदी मुसलमानों से भेदभाव को अपराध घोषित करने का कानून बना सकता है. मोरक्को के शाह मोहम्मद पंचम शियाओं को प्रताड़ित किए जाने से रोक सकते हैं. ईरान एक कानून पास कर सकता है कि समलैंगिक लोगों को फांसी पर नहीं चढ़ाया जाएगा. भारत, कुछ उर्दू पत्रकारों और निर्दोष मुसलमान युवाओं को बरगला कर कट्टरपंथी बनाने वाले भाई इमरान जैसे उपदेशकों को गिरफ्तार कर सकता है.

हाल के सालों में भारत और विदेशों में इस्लामी मौलवियों की तरफ से अल कायदा, तालिबान और आईएस के खिलाफ बहुत से फतवे जारी किए गए हैं. हालांकि इनमें से किसी भी फतवे में उन धार्मिक सिद्धांतों की तरफ ध्यान नहीं दिया गया है जिन पर ये जिहादी संगठन खड़े हैं. इसलिए जिहादवाद से शांतिपूर्वक तरीके से निपटने के लिए मैं इस्लामी उलेमाओं से कहता हूं कि वे शांति और बहुलतावाद के लिए मेरे छह बिंदुओं वाले फतवे का समर्थन करें. ऐसे फतवे में निम्न बातें होनी चाहिए-

1. शिया मुसलमान हैं 2. अहमदी मुसलमान हैं 3. इस्लाम छोड़ने पर किसी मुसलमान का सिर कलम नहीं होगा 4. पैगंबर मोहम्मद एक विश्व नेता थे और आलोचनात्मक रूप से उनकी भूमिका की समीक्षा करने वाले लेखकों को कत्ल नहीं किया जाएगा. 5. एक मुस्लिम महिला आधुनिक दौर में राष्ट्राध्यक्ष बन सकती है. 6. हिंदू और गैर मुसलमान किसी मुस्लिम देश का राष्ट्राध्यक्ष बनने के योग्य हैं.

शुक्रिया

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