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महिलाओं अधिकार पर कुरान का नहीं, संविधान का हवाला दें

संविधान में मुस्लिम महिलाओं की आजादी के पर्याप्त प्रावधान हैं.

Tufail Ahmad | Published On: Nov 22, 2016 08:37 AM IST | Updated On: Nov 24, 2016 09:47 PM IST

महिलाओं अधिकार पर कुरान का नहीं, संविधान का हवाला दें

सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की बढ़ती हुई भूमिका आधुनिक सभ्यता की एक बड़ी खासियत है. आज हम इसलिए ज्यादा सभ्य हैं क्योंकि सड़कों, दुकानों, सरकारी दफ्तरों, सेना और खेल के मैदानों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है. इसी वजह से महिलाओं को हाजी अली दरगाह में बिल्कुल अंदर तक जाने की अनुमति देने वाला बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला बिल्कुल सही कदम है. इससे भारतीयों की मानसिकता बदलेगी और मुस्लिम महिलाओं की नई पीढ़ी के बीच भी बहस शुरू होगी.

हाजी अली दरगाह ट्रस्ट को चलाने वाले मुस्लिम पुरुषों की तरफ से दलील यह दी जाती है कि महिलाएं माहवारी के कारण अपवित्र होती हैं. महिलाएं फिजिक्स पढ़ रही हैं, लेबोरेट्रीज में काम कर रही हैं, ओलंपिक में मेडल जीत रही हैं, लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं और अंतरिक्ष में जा रही हैं. इस स्थिति में महिलाओं के बारे में ऐसी बात कहना मानवता की स्वतंत्र गरिमा पर चोट है. कोर्ट के फैसले ने दरगाह को नियंत्रित करने वाले मुस्लिम पुरुषों को दोटूक अंदाज में बता दिया है कि उनकी बात जायज नहीं है और उसके लिए आज के भारत में कोई जगह नहीं है.

इबादत पर कोर्ट का क्रांतिकारी फैसला

कहने की जरूरत नहीं है कि समीक्षक कहेंगे कि इस्लाम तो महिलाओं के लिए बराबरी की वकालत करता है और अदालत का फैसला इस्लाम के दस्तूर के मुताबिक ही है. देश की ज्यादातर सुन्नी दरगाहों पर महिलाओं के प्रवेश की अनुमति है, और यह सही भी है. मिसाल के तौर पर सबसे लोकप्रिय अजेमर की ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह पर महिलाओं को पवित्रतम स्थान पर भी जाने से नहीं रोका जाता. लेकिन एक बात स्पष्ट होनी चाहिए.

मुद्दा यह नहीं है कि इस्लाम महिलाओं को मस्जिदों, कब्रिस्तानों और दरगाहों में जाने से रोक रहा है या नहीं. बुनियादी मुद्दा महिलाओं की आजादी है, जिसकी रक्षा की जानी चाहिए, भले इस्लाम इसकी इजाजत देता हो या न देता हो.

हाल में न्यायपालिका जिस तरह के फैसले देती रही है, उसे देखते हुए भी बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला क्रांतिकारी कदम है. हाल के सालों में मुस्लिम विषयों पर दिए गए उच्च न्यायपालिका के बहुत से फैसलों में संविधान को तवज्जो न देकर कुरान और हदीस (पैगंबर मोहम्मद की बातें और उनके कामों का संकलन) का हवाला दिया गया है. मिसाल के तौर पर नवंबर 2015 में एक से ज्यादा शादी के मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जीबी पर्दीवाला ने कहा-

मुस्लिम पुरुष एक से ज्यादा पत्नी रखने के लिए कुरान की गलत व्याख्या कर रहे हैं. जब कुरान में एक से ज्यादा शादी की अनुमति दी गई थी तो ये एक उचित कारण से दी गई थी.
इसी तरह केरल हाई कोर्ट के जज बी कमाल पाशा ने इसी साल मार्च में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की: मुस्लिम महिलाएं क्यों चार पति नहीं रख सकतीं?

Haji_Ali_Mosque,_Mumbai

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार जस्टिस पाशा ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को सही झाड़ लगाई जो पुरुषों को चार पत्नियों से शादी करने की अनुमति देता है. हालांकि उच्च न्यायपालिका की तरफ से इस तरह की बातें आना ही चिंता का कारण है क्योंकि जजों का काम है संविधान के मुताबिक चलना और उसकी व्याख्या करना, न कि कुरान और हदीसों का हवाला देना. मुस्लिम पर्सनल लॉ कहीं लिखा नहीं है. यही जजों के लिए पर्याप्त आधार होना चाहिए कि वे अपने फैसले लिखित संविधान की बुनियाद पर ही दें.

धर्म पर आधारित बहसों का कानूनी पहलू

इस तरह, किसी भी व्यक्ति के बुनियादी अधिकारों पर दिया गया बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला एक सकारात्मक बदलाव की तरफ इशारा करता है. अपने आदेश में जस्टिस वीएम कानाडे और रेवती मोहिते डेरे की डिविजन बेंच ने कहा-

हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 25 के विपरीत है. महिलाओं को पुरुषों की तरह ही दरगाह में प्रवेश करने दिया जाए.
कुछ मुसलमान कहेंगे कि उन्हें अनुच्छेद 25 के तहत धर्म का मौलिक अधिकार प्राप्त है, लेकिन इस अधिकार के बारे में दो गंभीर बिंदुओं पर विचार करना होगा.

पहला, अनुच्छेद 25 में धर्म का अधिकार किसी एक समुदाय को नहीं बल्कि भारतीय नागरिकों को दिया गया है. यह अधिकार मुस्लिम संगठनों या मुसलमानों के समूह को नहीं दिया गया है. दूसरा, इसके उपबंध 25 (1) और 25 (2) स्पष्ट करते हैं कि धर्म के मौलिक अधिकार के साथ शर्त जुड़ी है. यह अन्य मौलिक अधिकारों की तरह नहीं है. उदाहरण के लिए उपबंध 25 (1) में इस अधिकार को सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के साथ जोड़ा गया है. वहीं उपबंध 25 (2) में कहा गया है कि इस अनुच्छेद की कोई बात किसी अन्य मौजूदा कानून के अमल को प्रभावित नहीं करेगी और न ही राज्य को धर्म से जुड़े आर्थिक, वित्तीय या राजनीतिक मुद्दों पर कानून बनाने से रोकेगी. भारतीय संविधान में मुस्लिम महिलाओं की आजादी की रक्षा करने के लिए पर्याप्त प्रावधान हैं.

Haji_Ali,_Mumbai

ऐसे खुलेंगे नए रास्ते

एक बात साफ होनी चाहिए.

हाजी अली दरगाह का फैसला इसलिए संभव हो पाया क्योंकि आम जनता में मुस्लिम महिलाओं की आजादी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्ष में आवाज मजबूत हो रही है. इस वजह से सामाजिक स्तर पर जागरुकता बढ़ाने के काम को करना जरूरी है.
इस सिलसिले में, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की जाकिया सोमन और नूरजहां नियाज के काम को पूरा श्रेय जाता है. जिन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में केस लड़ा और जिनका संगठन इस्लामी शिक्षाओं के दायरे में रहते हुए ही मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ रहा है.

आखिर में, जहां तक मुस्लिम महिलाओं की स्वतंत्रता की बात है तो कोर्ट का यह फैसला एक सांकेतिक कदम है. मुस्लिम महिलाएं अब भी बुर्का पहने बिना से बाहर नहीं जा सकतीं. असली आजादी की शुरुआत तब होगी जब जमीयत उलेमा ए हिंद और जमात ए इस्लामी अपना नेता महिलाओं को चुनें, जब मुस्लिम लड़कियां राजनेता बनें या कुश्ती और साइकलिंग में मेडल जीतें, वह भी अपवाद के रूप में नहीं, बल्कि नियमित तौर पर. हाजी अली दरगाह फैसले को भले ही सुप्रीम कोर्ट रद्द कर दे लेकिन यह एक मील का पत्थर है और मुसलमानों के बीच इस पर व्यापक बात होगी, खास कर फेसबुक पर मौजूद उन महिलाओं के बीच जो अभी किशोरावस्था में है या 20 की उम्र में हैं. इस तरह की चर्चा और सवालों से नए रास्ते तैयार होंगे.

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