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सच्चे इस्लाम की खोज है जिहाद की जड़

सच्चे इस्लाम की अपनी खोज में मुसलमानों के ज्यादातर पंथ दूसरों को गैर-मुसलमान या कमतर मुसलमान समझते हैं.

Tufail Ahmad | Published On: Dec 03, 2016 03:18 PM IST | Updated On: Dec 03, 2016 03:33 PM IST

सच्चे इस्लाम की खोज है जिहाद की जड़

मुस्लिम समाजों में आज जो इतना उबाल है, उसकी एक बड़ी वजह इस्लामी मौलवियों का अन्य मुसलमानों को मुनफकीन (पाखंडी), काफिर या फिर कमतर मुसलमान घोषित करना है.

5 अगस्त को मुंबई से निकलने वाले एक उर्दू अखबार रोजनामा इंकलाब ने अपने पहले पन्ने पर एक रिपोर्ट छापी जिसमें 2011 की जनगणना रिपोर्ट में कादयानियों को मुसलमान बताए जाने को लेकर सावधान किया गया था.

असली मुसलमान कौन?

अहमदी मुसलमानों को कादियानी कह कर दुत्कारा जाता है. ये नाम उन्हें उनके आध्यात्मिक नेता मिर्जा गुलाम अहमद (1835 -1908) के जन्मस्थान के नाम पर दिया गया है जो मौजूदा भारतीय पंजाब के कादियान में पैदा हुए थे.

महाराष्ट्र के मुसलमानों के बीच काफी लोकप्रिय अखबार इंकलाब ने लिखा, ‘2011 की जनगणना रिपोर्ट को लेकर सनसनीखेज बात सामने आई है कि इसमें कादियानियों को मुसलमान के तौर पर रजिस्टर किया गया है.’ अखबार कहता है कि, 'पहले सिर्फ सुन्नी, शिया, बोहरा और आगाखानियों को मुसलमानों के पंथ के तौर पर देखा जाता था.’

2011 की जनगणना के समय नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं थे. लेकिन एक अन्य उर्दू अखबार रोजनामा उर्दू टाइम्स ने 5 अगस्त को अपने पहले पन्ने पर एक रिपोर्ट छापी जिसके मुताबिक मोदी अहमदी मुसलानों के पक्ष में एक साजिश रच रहे हैं. रिपोर्ट का शीर्षक था, ‘मोदी सरकार ने कादियानियों को इस्लाम के पंथ के तौर पर स्वीकार कर लिया.’

सूफी-इस्लाम

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘एक बात साफ है कि इस्लाम की सभी विचारधाराओं ने कादियानियों को इस्लाम से बाहर निकाल दिया गया है. मोदी सरकार पिछले साल तक कादियानियों को इस्लाम का एक पंथ मानने से हिचक रही थी. हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कादियानियों के उदारवाद और उनके शांति से रहने की तारीफ की.’

अहमदी मुसलमानों पर इस्लाम के प्रभावशाली पंथों की तरफ से हमेशा से यह गलत इल्जाम लगाया जाता रहा है कि वह मोहम्मद को आखिरी पैगंबर नहीं मानते. यह आरोप सच्चे इस्लाम के लिए जारी आध्यात्मिक खोज का हिस्सा हैं.

सच्चे मुसलमानों की खोज करने के चक्कर में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने 1974 में एक कानून बनाया जिसके तहत अहमदी मुसलमानों को गैर-मुसलमान घोषित कर दिया गया. यह इतिहास में पहला मौका था, जब सांसदों को यह तय करने की ताकत दी गई कि कौन मुसलमान है और कौन नहीं. पाकिस्तान में अहमदी मुसलमान न खुद को मुसलमान कह सकते हैं और न ही अपने पूजास्थलों को मस्जिद. उन्हें एक दूसरे से अस्लाम-ओ-अलैकुम कहने का भी हक नहीं है.

हर जगह प्रताड़ित

अहमदी मुसलमानों को सऊदी अरब और इंडोनेशिया समेत बहुत सारे देशों में रोजमर्रा की जिंदगी में प्रताड़ित किया जाता है. यह सही है कि आज अहमदी मुसलमान इस्लाम का सबसे प्रताड़ित पंथ है. भारतीय राज्य भी इस प्रताड़ना में शामिल है.

मिसाल के तौर पर अहमदी मुसलमानों ने 2011 में कुरान के 53 भाषाओं में अनुवाद पर दिल्ली में एक प्रदर्शनी आयोजित की. दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम ने इस प्रदर्शनी के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन किया. इस वजह से इसे बंद कर दिया गया क्योंकि भारतीय राज्य ने प्रदर्शनी के आयोजकों को सुरक्षा देने की बजाय बुखारी के नेतृत्व में आए गुंडों के आगे आत्मसमर्पण कर दिया. भारतीय राज्य का इस तरह आत्मसमर्पण करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्व तरीके से जमा होने के अधिकार और बहुलतावाद के हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा है.

अपनी रिपोर्ट में रोजनामा उर्दू टाइम्स ने इस्लामी उलेमा मौलाना मोइन अशरफ़ के हवाले से कहा कि 'अहमदियों को मुसलमान कहकर सरकार ने हद कर दी है.’ रिपोर्ट में उलेमा काउंसिल के महासचिव मौलाना महमूद दरियाबदी के हवाले से कहा गया कि, '2011 की जनगणना रिपोर्ट में 'अहमदियों को मुसलमान बताना मुसलमानों के मामलों में दखलंदाजी’ है और भारत सरकार के पास यह तय करने का कोई अधिकार नहीं है कि मुसमलानों में कितने पंथ होंगे.’ जबकि वास्तव में यह विरोधाभासी बात है. हर मौलवी को लगता है कि उसे हर मुसलमान के धार्मिक मामलों में दखलंदाजी करने का पूरा हक है.

जिहाद

जिहादी चलन पर करना होगा काबू

समस्या का निचोड़ यह है: सच्चे इस्लाम की अपनी खोज में मुसलमानों के ज्यादातर पंथ दूसरों को गैर-मुसलमान या कमतर मुसलमान समझते हैं. मसलन, इस्लाम की तथाकथित शांतिपूर्ण बरेलवी विचारधारा के संस्थापक अहमद रज़ा ख़ान (1856-1921) ने शियाओं को गैर-मुसलमान घोषित किया था.

आज भी बहुत से देशों में बरेलवी संगठन, खासकर दक्षिण अफ्रीका में, शियाओं को खुले आम काफिर घोषित करते हैं. पाकिस्तानी-कनाडाई मौलवी ताहिर उल क़ादरी जिहादी संगठनों के खिलाफ फतवा देने के लिए मशहूर हैं, उन्होंने भी शियाओं को काफिर कहा है. उन्हीं की तरह तालिबान, अल कायदा और इस्लामिक स्टेट शियाओं को मुसलमान नहीं मानते. इसी वजह से वे सुनियोजित ढंग से उनकी हत्या कर रहे हैं.

इस्लामिक स्टेट के पैदा होने से बहुत पहले इस्लाम के चौथे खलीफा हज़रत अली के दौर में आईएस की तरह ही पवित्र मुसलमानों का एक गुट उभरा था जिसे खरीजित कहते थे. उसने हजारों मुसलमानों को धर्मभ्रष्ट बताते हुए कत्ल किया था.

सच्चे इस्लाम की इस खोज की जड़ें पैगंबर मोहम्मद के दौर से ही जुड़ी हैं, जिन्होंने ‘मस्जिद-ए-जर्रार’ को इसलिए ढहा दिया था क्योंकि इस मस्जिद को ‘मुनफकीन यानी पाखंडी’ समझे जाने वाले मुसलमानों ने बनाया था.

वे मुसलमान जो खुद को दूसरे से ज्यादा पवित्र समझते हैं, वह अक्सर दूसरे लोगों के लिए यह वाक्य बोलते हैं, ‘वह मुसलमान नहीं है.’ रोजमर्रा की जिंदगी में इस जिहादी चलन पर काबू करने की जरूरत है क्योंकि इस्लाम के सभी पंथों और गैर-मुसलमानों के सह-अस्तित्व के लिए यह बहुत जरूरी है.

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