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नीति आयोग के अरविंद पनगढ़िया का इस्तीफा, राह सीधी नहीं हैं यहां

क्या अरविंद पनगढ़िया का स्वदेशी जागरण मंच और बीजेपी के वैचारिक परिवार से जुड़े दूसरे संस्थानों से मतभेद चल रहा है

Alok Puranik Alok Puranik Updated On: Aug 01, 2017 06:39 PM IST

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नीति आयोग के अरविंद पनगढ़िया का इस्तीफा, राह सीधी नहीं हैं यहां

हाल के समय में वह दूसरे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के अर्थशास्त्री हैं, जो प्रतिष्ठित भारतीय संस्थान को छोड़कर अमेरिका में पढ़ाने के काम में लौटना चाहते हैं. अरविंद पनगढ़िया नीति आयोग से इस्तीफा देकर वापस अमेरिका में अपने अध्यापन के काम में लौटेंगे. इससे पहले रघुराम राजन ने भी रिजर्व बैंक की गर्वनरी में दोबारा दिलचस्पी ना दिखाते हुए वापस अमेरिकन प्रोफेसरी की तरफ जाने का घोषणा की थी.

इन दोनों प्रोफेसरों के मामले में बुनियादी फर्क यह है कि रघुराम राजन और मोदी सरकार के बीच एक खाई दिखायी पड़ रही थी. लेकिन प्रोफेसर अरविंद पनगढ़िया की तो नियुक्ति ही मोदी सरकार ने की थी, उन्हें नीति आयोग का पहला उपाध्यक्ष बनाकर.

नीति आयोग का पूर्वज योजना आयोग हुआ करता था. वह अपने दौर का बहुत शक्तिशाली संगठन था. योजना आयोग भंग हुआ और नीति आयोग बना. इसके पहले संस्थापक उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया बने. अरविंद पनगढ़िया और नीति आयोग के दूसरे सदस्य बिबेक देबरॉय नोटबंदी के फैसले पर केंद्र सरकार के मजबूत समर्थक के तौर पर उभरे थे.

सरकार और शक्ति केंद्र

खबरें थी कि अरविंद पनगढ़िया का स्वदेशी जागरण मंच और बीजेपी के वैचारिक परिवार से जुड़े दूसरे संस्थानों से मतभेद चल रहा है. बीजेपी के वैचारिक परिवार में कई संगठन शामिल हैं और इनकी अपनी स्वतंत्र शक्ति है-भारतीय मजदूर संघ भारत का सबसे ताकतवर श्रमिक संगठन है.

भारतीय किसान संघ किसानों का संगठन है और स्वदेशी जागरण मंच भी बीजेपी के व्यापक वैचारिक परिवार का एक अंग है. पर जाहिर है ये संघ और मंच उस तरह से राजनीति में नहीं हैं, जिस तरह से बीजेपी है.

नीति आयोग भी उस तरह से राजनीतिक संगठन नहीं है, इसलिए इन सबके बीच मतभेद स्वाभाविक हैं और ये मतभेद कई बार इस हद तक हो जाते हैं कि इस तरह के इस्तीफे आ जाते हैं.

खेती, फार्मा को लेकर मतभेद

नीति आयोग की तरफ से सुझाव आया था कि किसानों पर भी आयकर लगना चाहिए. इस पर खासा विवाद हुआ था. बीजेपी के एक किसान नेता ने इस सुझाव पर कहा था कि नीति आयोग के अफसर विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़े-लिखे हैं. उन्हें भारतीय सचाईयों का पता नहीं है. बाद में केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली बाद में यह मसला खारिज किया यह कहकर कि भारत में अभी कृषि पर कर लगाने की स्थिति नहीं है. यानी इस मामले में केंद्र सरकार की तरफ से नीति आयोग को संकेत मिले कि उनका सुझाव मानने योग्य नहीं है.

फार्मा सेक्टर को लेकर स्वदेशी जागरण मंच और नीति आयोग में मतभेद रहे. स्वदेशी जागरण मंच का कहना रहा कि नीति आयोग फार्मा उद्योग के हित में लाबिंग कर रहा है और दवाओं के सस्ते होने के राह में रोड़े अटका रहा है.

मतभेदों की विरासत

बीजेपी की सरकार केंद्र में हो, तो बीजेपी के वैचारिक परिवार के संगठनों का सरकार से झगड़ा अतीत में भी होता रहा है. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के वक्त संघ परिवार के महत्वपूर्ण नेता और भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक स्वर्गीय दत्तोपंत ठेंगड़ी का सरकार के साथ लंबा वैचारिक मतभेद चला था.

वैचारिक अधिष्ठान के सोचने का दायरा और सरकार के काम करने के तरीकों में अंतर स्वाभाविक है. अरविंद पानगढ़िया आम तौर पर अर्थव्यवस्था के उस रास्ते के पक्षधर थे, जो अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र के भरपूर योगदान की वकालत करता है.

हाल में नीति आयोग के एक अधिकारी की तरफ से बयान आया, उसमें जेलों के प्रबंधन को भी निजी क्षेत्र में देने की वकालत की गई थी. अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र के योगदान, खुले बाजार के योगदान को लेकर मतभेद स्वाभाविक हैं.

स्वदेशी जागरण मंच फार्मा सेक्टर में इतना खुलापन नहीं चाहता कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खुलकर खेलने का मौका मिले. खेती पर कर, यहां तक अमीर किसानों की आय पर कर (भले ही अमीर किसानों की तादाद बहुत ही कम हो) लगाने जैसे राजनीतिक संवेदनशील कदम कोई भी सरकार उठाने में हिचकेगी, भले ही इन कदमों के आर्थिक तर्क चाहे जितने मजबूत हों.

विरोधाभासों की अर्थव्यवस्था

अमेरिकन व्यवस्था अर्थशास्त्रियों को यह बनाम वह के खांचे में सोचना सिखाती है-सरकार के काम के परिणाम ठीक नहीं आ रहे, तो निजी क्षेत्र के ले आओ. सरकार को बाहर करो, निजी क्षेत्र को और खुले बाजार की ताकतों को मौका दो.

यह गलत वह सही, यहां साफ विभाजन है, अमेरिकन सोच और कर्म के ढांचे में. भारतीय मामले अलग हैं। यह बनाम वह नहीं है, कई बार यह के साथ वह भी है. खुले बाजार की नीतियां चलेंगी, पर सरकार को भी मौजूद रहना चाहिए सीन में.

इस तरह के विरोधाभास अमेरिकन फ्रेमवर्क के अर्थशास्त्रियों को समझ नहीं आते और उन्हे काम करने में अड़चन होती है. ऐसी ही अड़चन नीति आयोग के कई अफसर महसूस कर रहे हैं. देखना यह है कि उनमें कितने अरविंद पानगढ़िया की तरह विदा ले लेते हैं.

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