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जीएसटी 1 जुलाई से लागू: सरकार के पास ट्रायल का भी वक्त नहीं

जीएसटी के सॉफ्टवेयर का ट्रायल नहीं हुआ और ना ही हर जगह इंटरनेट का इंतजाम किया गया है

Murlidharan Shrinivasan Updated On: Jun 29, 2017 01:00 PM IST

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जीएसटी 1 जुलाई से लागू: सरकार के पास ट्रायल का भी वक्त नहीं

जीएसटीएन के चेयरमैन नवीन कुमार ने कहा है कि जीएसटी सॉफ्टवेयर के लिए ट्रायल रन का वक्त नहीं है क्योंकि जीएसटी सिस्टम को हर हाल में 30 जून 2017 की आधी रात से लॉन्च किया जाना तय है. 1 जुलाई से सभी लेनदेन जीएसटी के जरिए होंगे.

जीएसटी जैसे बेहद प्रभावी सिस्टम को बिना ड्राई रन के शुरू करने के लिए जीएसटीएन (गुड्स एंड सर्विस टैक्स नेटवर्क) या इसके चेयरमैन नवीन कुमार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है. लेकिन, जीएसटी के साथ कई दूसरी समस्याएं भी होंगी क्योंकि यह पूरी तरह से देशभर में बिना बाधा वाले इंटरनेट कनेक्टिविटी पर आधारित है.

जिद पर अड़ी सरकार

सरकार पहली जुलाई 2017 से जीएसटी को लागू कर देना चाहती है क्योंकि जेटली हर हाल में अपना वादा पूरा करना चाहते हैं. 14 अगस्त 1947 की आधी रात को भारतीय संसद में एकजुटता के साथ आजादी हासिल करने का ऐलान हुआ था, लेकिन क्या इस वक्त इसी तरह से जीएसटी को भी लागू किया जाना चाहिए?

खासतौर पर ऐसे वक्त पर जबकि इस हड़बड़ी के चलते जीएसटी के चलते होने वाले सुधारों की नींव हिल सकती है. राजनीतिक श्रेष्ठता के दंभ की कीमत भारतीय अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ सकती है.

सबको कैसे मिलेगी इंटरनेट की सुविधा?

बैल के आगे गाड़ी को लगाना हमेशा से गलत होता है. जब यही चीज एक ऐसी स्कीम के साथ की जाए जिसमें पूरे देश और इसकी वाणिज्यिक गतिविधियों में आमूलचूल बदलाव लाने की संभावना हो तो यह काफी खतरनाक साबित हो सकता है.

जीएसटी को लेकर कहा जा रहा है कि आजाद भारत का यह सबसे बड़ा टैक्स रिफॉर्म है

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हालांकि, यह कोई बड़ी बात नहीं है कि देश में 24 घंटे इंटरनेट कनेक्टिविटी की गारंटी नहीं दी जा सकती है, लेकिन फूल-प्रूफ सॉफ्टवेयर की गारंटी नहीं देना छोटी चीज नहीं है. पुख्ता सॉफ्टवेयर की गारंटी के लिए देशभर में अलग-अलग आकार के नकली लेनदेन के ड्राई रन किए जा सकते थे और इसकी सुरक्षा की जांचा की जा सकती थी.

छोटे शहरों में दिख सकता है सामाजिक विद्रोह

हार्डवेयर की गैर-उपलब्धता या इसमें गड़बड़ियों के गहरे दुष्परिणाम दिखाई दे सकते हैं. इसमें मेट्रोपॉलिटन शहरों में छोटे शहरों के मुकाबले ज्यादा भयंकर असर दिख सकते हैं. छोटे शहरों में इसका असर देशभर में शुरू हुए किसान विरोध-प्रदर्शनों के जैसे सामाजिक विद्रोह के तौर पर नजर आ सकते हैं.

'भीम' जैसी जुगाड़ की सोच

सरकार को यह 'भीम' ऐप जैसी पहल या जुगाड़ जैसा लग रहा था. इसमें आधार नंबर को डेबिट कार्ड की तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है. इसे चीजों और सर्विसेज खरीदने के लिए ऐसे लोग इस्तेमाल कर सकते हैं जिन्होंने अब तक डेबिट या क्रेडिट कार्ड नहीं छुआ है. इसमें आपका आधार नंबर आपके बैंक खाते से जुड़ा हुआ होना चाहिए.

इन लोगों के पास इंटरनेट भी नहीं है और स्मार्टफोन भी नहीं है. सरकार ने उन्हें टेंपरेरी इंटरनेट का एक्सेस *99# के डायल करने के जरिए दिया है. इसके जरिए ट्रेडर और कस्टमर के बैंक के बीच भीम आधारित लेनदेन हो जाता है.

अमेरिका में कैसी है प्रक्रिया?

ऐसा ही कुछ सोचा गया है ताकि इंटरनेट से अछूते ट्रेडर्स भी नुकसान में न रहें. अमेरिका में रेस्टोरेंट्स अपने कस्टमर्स को बिल देते हैं जो कि तुरंत अपना कार्ड निकाल कर देते हैं. कैशियर कार्ड को न केवल पेमेंट के लिए स्वाइप करता है बल्कि एक टेंपरेरी नंबर भी इससे जनरेट होता है. वेटर इसके बाद कार्ड इनवॉयस सहित कस्टमर को वापस कर देता है जो कि वेटर को टिप देकर चला जाता है.

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अकाउंटेंट बाद में आराम से (एक हफ्ते के भीतर) कार्ड को फिर से स्वाइप करता है, इसे बिजनेस के वक्त जेनरेट हुए टेंपरेरी नंबर के साथ किया जाता है ताकि वह टिप्स समेत पेमेंट्स पा सके. पहला स्वाइप केवल इसलिए जरूरी है ताकि यह पता चल सके कि कस्टमर के पास पर्याप्त बैलेंस या लिमिट है या नहीं.

बात यह नहीं है कि यूएस प्रैक्टिस जरूरी है या नहीं. मामला यह है कि इससे मुश्किल हालात में फंसे जीएसटीएन को निकलने का मौका मिलेगा. जल्द ही जीएसटीएन को ऐसे लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ेगा जिनके पास इंटरनेट से जुड़ी हुई दिक्कतें हैं.

इनके पास कम से कम इतना तो दिलासा होना चाहिए कि उनकी इनवॉयसेज हार्डवेयर के चलते रातों-रात रिजेक्ट तो नहीं कर दी जाएंगी, बल्कि इन्हें तेजी से प्रोसेस किया जाएगा ताकि एक टेंपरेरी कोड जनरेट हो सके जिसे वे बाद में जीएसटीएन सिस्टम को संतुष्ट करने के लिए इस्तेमाल कर पाएं.

नाकामी से डरने की बजाय इसका सामना करे सरकार

जीएसटीएन सॉफ्टवेयर पर बाकायदे सैंपल ट्रांजैक्शंस को टेस्ट करने पर वापस लौटते हैं. इस बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि सरकार को इस मोर्चे पर नाकाम होने से डरना नहीं चाहिए. बेहतर यही होगा कि शुतुरमुर्ग की तरह सिर को रेत में छिपा लेने की बजाय नाकामी का सामना किया जाए और तत्काल खामियों को दूर किया जाए.

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