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जीएसटी लागू: अनुशासन में रहेंगे तो सुखी रहेंगे

जीएसटी लागू होने के बाद ग्राहकों और कारोबारियों दोनों के लिए अनुशासन में रहना जरूरी है

Pratima Sharma Pratima Sharma Updated On: Jul 01, 2017 06:43 PM IST

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जीएसटी लागू: अनुशासन में रहेंगे तो सुखी रहेंगे

जीएसटी आज से लागू हो गया. उदारीकरण के बाद यह देश के आर्थिक इतिहास की सबसे बड़ी घटना है. देश की जीडीपी पर जीएसटी का असर निश्चित तौर पर होगा. लेकिन ये तमाम बातें बड़ी हैं और शायद आम आदमी की समझ से परे भी. लेकिन कुछ ऐसी बातें भी हैं, जो सीधे आम आदमी पर असर डालेंगी.

जी नहीं, यह सामान की कीमतें बढ़ने या घटने से नहीं है. यह सबक है अनुशासन का. जीएसटी से निश्चित तौर पर अगले एक-डेढ़ साल तक महंगाई में तेजी बनी रहेगी. लिहाजा अब वक्त आ गया है कि भारतीय वित्तीय अनुशासन सीख लें. एक पुरानी कहावत है ' तेते पांव पसारिए जेती लंबी सौर.' नब्बे के दशक तक देशवासी इस कहावत को जानते भी थे और मानते भी.

संयम का वक्त

लेकिन आईटी जेनरेशन के बाद यह कहावत सिर्फ कहने के लिए रह गई. क्रेडिट कार्ड से अपने शौक पूरे करने वाली इस पीढ़ी को जीएसटी के बाद अपनी आदतें बदलनी होंगी. सरकार ने जीएसटी में टैक्स का रेट इस तरह तय किया है कि सबसे ज्यादा सर्विस लेने वाले या लग्जरी पर ज्यादा खर्च करने वाले को सबसे ज्यादा टैक्स चुकाना पड़ेगा.

अगर आप 500 रुपए से सस्ती चप्पल से काम चला सकते हैं तो आपको जीएसटी से फायदा होगा. लेकिन अगर आपको 5000-10000 रुपए के ब्रांडेड रीबॉक, नाइकी या एडीडास के जूते पसंद आते हैं तो आपको पहले से ज्यादा जेब ढीली करनी होगी.

शौक महंगी चीज है

कुछ यही मामला कपड़ों को लेकर भी है. अगर आप 1000 रुपए तक के कपड़ों में खुद को फैशनेबल बना पाते हैं तो यह आपकी जेब को भी सूट करेगा. लेकिन महंगे कपड़ों का शौक आपको ज्यादा खर्च करने पर मजबूर कर सकता है. अगर आपको डिजाइनर या ब्रांडेड कपड़ों का शौक है तो फिर आपको जेब की फिक्र नहीं करना चाहिए.

एक तरफ अर्थव्यवस्था की ग्रोथ नोटबंदी से कम हुई है. दूसरी तरफ जीएसटी लागू होने से अगले एक-डेढ़ साल तक महंगाई का कहर भी बना रहेगा. यानी इकनॉमिक ग्रोथ कमजोर रहने के कारण आमदनी में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी की उम्मीद नहीं है. दूसरी तरफ जीएसटी के कारण निश्चित तौर पर खर्च बढ़ेगा. ऐसे में संतुलन बनाए रखने के लिए अपने खर्चों पर काबू पाना बेहद जरूरी है.

जीएसटी लागू होने के बाद अनुशासन ही मूल मंत्र है. सर्विस पर सबसे ज्यादा टैक्स लगा है. और सर्विस ही ऐसी चीज है जिस पर काबू पाकर आप अपने दूसरे खर्चों की भरपाई कर सकते हैं. बात चाहे फिल्म के टिकट की हो या फिर होटलों की. हर जगह अब आपको अनुशासन की जरूरत होगा.

अगर आपको मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने का शौक है तो ज्यादा टैक्स चुकाने के लिए भी तैयार रहना होगा. 100 रुपए तक के मूवी टिकट पर 18 फीसदी की टैक्स देना होगा. वहीं 100 रुपए से महंगे टिकट पर 28 फीसदी टैक्स लगेगा. अगर आप 7500 रुपए से महंगे होटल में ठहरते हैं तो आपको टोटल बिल पर 28 फीसदी टैक्स चुकाना पड़ेगा. इससे सस्ते होटल में आपकी बात बनती है तो आपको सिर्फ 18 फीसदी टैक्स देना होगा. यानी 2500 रुपए से लेकर 7500 रुपए तक के होटलों पर 18 फीसदी टैक्स चुकाना होगा.

कर चोरी की लत नहीं चलेगी

कुछ यही आलम छोटे कारोबारियों का भी है. छोटे कारोबारी जीएसटी को लेकर छाती पीट रहे हैं. उनकी दलील है कि जीएसटी समझने-समझाने के लिए सरकार ने उन्हें पर्याप्त वक्त नहीं दिया. लेकिन यह बात भी सच नहीं है. सरकार पिछले 14 साल से जीएसटी पर काम कर रही है. लेकिन कारोबारियों ने पहले इसे गंभीरता से नहीं लिया. वे इस उम्मीद में रहे कि अभी यह लागू नहीं होगा.

छोटे कारोबारियों को जीएसटी से एक नुकसान यह भी है कि वे सीधे-सीधे टैक्स के दायरे में आ जाएंगे. जब तक कारोबारियों की टैक्स चोरी की आदत नहीं जाएगी, जीएसटी से उनका विरोध कम नहीं होगा. कंज्यूमर की तरह कारोबारियों को भी अपनी वित्तीय आदतों में अनुशासन लाना होगा.

कुछ दिक्कतें तकनीक और आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर है. लेकिन जीएसटी के पहले ही कदम पर अगर हम रुक गए तो इन दिक्कतों को कभी दूर नहीं किया जा सकता. लिहाजा वित्तीय अनुशासन के साथ कंज्यूमर और कारोबारियों, दोनों को जीएसटी का स्वागत करना चाहिए.

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