बिपिन चंद्र पाल: जिनसे विरासत में 'स्वराज' ही नहीं, बेहतरीन सिनेमा भी मिला

राजनीतिक रेखाओं से भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन के वक्त भले ही सिलहट बांग्लादेश में चला गया हो पर बिपिन चंद्र पाल की विरासत देश में गहरे पैठी है

Avinash Dwivedi

सिनेमा वर्तमान की सबसे परिष्कृत कला विधा है और चूंकि भारतीय सिनेमा एक शताब्दी से ज्यादा पुराना हो चला है, ऐसे में आप ढूंढ़ें तो पिछली शताब्दी के अधिकांश कलाकारों, लेखकों, विचारकों का इससे जुड़ाव पा सकते हैं. आपको ऊपर लिखी हैडिंग अजीब लग सकती है पर बिपिन चंद्र पाल के परिवार के चलते ही सिनेमा में भारतीय सिनेमा में कई अभूतपूर्व बदलाव संभव हुए हैं, यही सच्चाई है. आइए आपकी बढ़ी उत्सुकता का शमन करते हैं-

बिपिन चंद्र पाल के बेटे निरंजन बॉम्बे टॉकीज के संस्थापकों में से एक थे. विचारों के धनी बिपिन चंद्र पाल का रंग-ढंग उनके परिवार में भी देखने को मिला. बिपिन चंद्र पाल के बेटे निरंजन पाल अपनी किशोरावस्था से ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कूद चुके थे. उन्होंने विनायक दामोदर सावरकर और मदनलाल धींगरा के साथ लंदन में क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया था. पर बाद में उन्होंने एक्टिविज्म की बजाए कला को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बना लिया.


निरंजन लंदन प्रवास के दौर से ही नाटककार, कथा-पटकथा लेखक और डायरेक्टर बन चुके थे. लंदन में उन्होंने कई नाटक लिखे और प्रदर्शित किए थे. वतन वापसी के बाद निरंजन भारतीय फिल्मों के शुरुआती दौर (मूक फिल्मों का दौर) से ही सिनेमा के निर्माण में सक्रिय हो गए. निरंजन पाल, 'हिमांशु राय' और 'फ्रैंज ऑस्टन' के करीबी थे और इन लोगों ने ही मिलकर बॉम्बे टॉकीज की स्थापना की थी.

'बॉर्डर', 'बैंडिट क्वीन' और 'दिल से' तक से जुड़े हैं परिवार के तार

ये तो शुरुआत थी. निरंजन पाल के बाद उनके बेटे कॉलिन पाल हिंदी फिल्मों के अभिनेता, टेक्नीशियन, जर्नलिस्ट रहे. कुल मिलाकर उनके नाम के साथ 175 हिंदी फिल्में जुड़ी हुई हैं. कॉलिन पाल ने 'बिमल राय' की दो फिल्मों 'परिणिता' और 'नौकरी' में अभिनय भी किया है. कॉलिन पॉल ने भारतीय सिनेमा के इतिहास पर 'शूटिंग स्टार्स' और 'ऐ जीबोन' नाम की किताबें भी लिखी हैं

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कॉलिन पाल के बेटे दीप पाल सिनेमैटोग्राफर हैं. पाल को भारत में 'स्टीडीकैम कैमरावर्क' (इसमें कैमरा शरीर पर बांध कर शूट किया जाता है ताकि हिले नहीं) की शुरुआत करने वाले माने जाते हैं. पाल ने जिस फिल्म में सबसे पहले स्टीडीकैम जिस फिल्म में प्रयोग किया वो नागार्जुन स्टारर सुपरहिट फिल्म 'शिवा' थी.

स्टीडीकैम ऑपरेटर.

ये फिल्म रामगोपाल वर्मा की डेब्यू फिल्म 'सिवा'(तेलुगू, 1989) की रीमेक थी. बाद में उन्होंने शेखर कपूर के साथ 'बैंडिट क्वीन' और मणि रत्नम के साथ 'दिल से' में काम किया है. दीप 'बॉर्डर' फिल्म के भी सिनेमैटोग्राफर रहे हैं. खैर वापस बिपिन चंद्र के जीवन की ओर आते हैं. जिन्होंने ऐसी समृद्ध विरासत दी.

वो बिपिन चंद्र ही थे जिन्होंने 'स्वराज' का प्रयोग शुरू किया था

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नेता बिपिन चंद्र पाल का जन्म 7 नवंबर, 1858 को सिलहट में हुआ था. राजनीतिक रेखाओं से भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन के वक्त भले ही सिलहट बांग्लादेश में चला गया हो पर बिपिन चंद्र पाल की विरासत देश में गहरे पैठी है.

बाद में बिपिन चंद्र उच्च शिक्षा के लिए सिलहट से कलकत्ता आ गए थे और प्रेसीडेंसी कॉलेज में एडमिशन ले लिया था. पर किन्हीं वजहों से उन्होंने ग्रेजुएट होने से पहले ही पढ़ाई छोड़ दी. फिर उन्होंने एक स्कूल शिक्षक के रूप में पढ़ाना शुरु कर दिया. वह 'कलकत्ता पब्लिक लाइब्रेरी' में लाइब्रेरियन भी रहे.

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यहीं पर वह केशव चंद्र सेन और शिवनाथ शास्त्री, बी.के. गोस्वामी और सुरेंद्र नाथ बनर्जी के संपर्क में आए. इन नेताओं के प्रभाव में बिपिन चंद्र ने भी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कदम रखा. उन्हें उग्र राष्ट्रवादियों जैसे तिलक, लाला लाजपत राय और अरविंद घोष के विचारों ने भी प्रभावित किया.

1898 में उन्हें इंग्लैण्ड जाकर 'तुलनात्मक धर्मशास्त्र' पढ़ने का अवसर मिला. इंग्लैण्ड से लौटकर उन्होंने स्वदेशी के फायदों के बारे में लोगों को बताना शुरू किया. कांग्रेस में सक्रिय होने के बाद ही उन्होंने अपने मित्रों लाला लाजपत राय और बाल गंगाधर तिलक के साथ मिलकर पूरी तरह से भारतीय शासन स्थापित करने की बात शुरू कर दी थी.

बाद में ये तिकड़ी (लाल-बाल-पाल) कांग्रेस के गरम दल का पर्याय बन गई. इन्होंने अंग्रेजों से किसी भी कीमत पर जिस पूर्ण स्वतंत्रता की मांग उठाई थी, उसे ही स्वराज कहा गया. भारतीय राजनीति में इस शब्द ने आज भी अपनी अर्थवत्ता बनाई हुई है. हालांकि स्वराज का सबसे पहला लिखित प्रयोग स्वामी दयानंद सरस्वती ने शुरू किया था. मगर इसको जन आंदोलन का शब्द इन तीनों ने ही बनाया.

कुछ साल पहले ही नई तरह की राजनीति का वादा करने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की लिखी किताब 'स्वराज' आई थी. योगेंद्र यादव ने भी 'स्वराज दल' नाम से एक राजनीतिक का निर्माण किया है. जो इस बार के आम चुनावों से भारत की चुनावी राजनीति में कदम रख रही है. शायद अरविंद घोष बिपिन चंद्र की ऐसी बुद्धिमत्ता से परिचित थे. यूं ही नहीं उन्हें अरविंद घोष राष्ट्रीयता के सबसे प्रतापी पैगंबरों में से एक माना करते थे.

तस्वीर: लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल (बाएं से दाएं)

एक साधारण घटना ने दी थी बिपिन चंद्र को असाधारण सीख

बिपिन चंद्र पाल का जन्म हबीगंज जिले (सिलहट) के पोली गांव में एक वैष्णव हिंदू परिवार में हुआ था. उनके पिता रामचंद्र पाल एक फारसी भाषा के विद्वान और छोटे जमींदार थे. अपने परिवार के बारे में अपनी आत्मकथा 'सत्तार बतसार' में बिपिन चंद्र एक किस्से का जिक्र करते हैं.

बिपिन चंद्र बालक ही थे जब सिलहट में एक सोडा नींबूपानी बनाने की फैक्ट्री लगी. इस फैक्ट्री में ज्यादातर मुस्लिम काम करते थे. इसलिए उच्च जाति के हिंदू उस नींबूपानी सोडा को नहीं पीते थे. पर बिपिन चंद्र पाल के मन में बचपन का भोलापन था. वो कभी-कभी छिपकर नींबूपानी पी लेते थे. एक रोज उनके पिताजी ने उन्हें सोडा पीते हुए पकड़ लिया. उन्होंने बिपिन चंद्र की जमकर पिटाई की.

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इस घटना के कुछ ही वक्त बात बिपिन चंद्र बहुत बीमार हो गए. जब डॉक्टर को इलाज के लिए बुलाया गया तो उन्हें डॉक्टर ने दवा के साथ नींबूपानी सोडा भी पीने की सलाह दी. उनके पिताजी ने तुरंत ही बाजार से नींबूपानी सोडा मंगवाया और अपने हाथ से उसे खोलकर, ग्लास में डालकर बिपिन चंद्र के आगे बढ़ाया. बिपिन चंद्र को पिछली बार की मार अभी भूली नहीं थी. उन्होंने तुरंत अपना मुंह दूसरी ओर कर लिया. उन्होंने एक मुस्लिम के हाथ का छुआ कुछ भी खाने से मना कर दिया. पर उनके पिता ने उन्हें बताया कि दवा ईश्वर के रूप की तरह होती है. इसके लिए शुद्ध-अशुद्ध कुछ नहीं होता. ये स्वयं ईश्वर होती है, अत: बिपिन चंद्र नींबूपानी पी लें.

इस घटना से बिपिन चंद्र के मन में सांप्रदायिक सौहार्द के बीज तो पनपे ही साथ ही इंसानी व्यवहार की गुत्थियों के बारे में भी उनकी समझ बनी. बाद में इस घटना का वो कई बार जिक्र करते थे. अपनी आत्मकथा में बिपिन चंद्र ने इसका भी जिक्र किया है कि कैसे इसी तरह बंगाल में ब्रेड और बिस्कुट बनाने के काम में भी ज्यादातर मुस्लिम ही लगे थे और शुरुआत में तथाकथित उच्च जातियों ने उसे खाने से परहेज किया पर अंग्रेजों को चाय के साथ बिस्किट खाते देख धीरे-धीरे सभी ने संभ्रांत होने के दिखावे में खाना शुरू कर दिया.

 आखिरी वक्त तक लिखते रहे बिपिन चंद्र 

कभी बिपिन चंद्र कांग्रेस के गरम दल के नेताओं की तिकड़ी लाल-बाल-पाल में से एक थे और राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्र में थे. पर 1920 के बाद बिपिन चंद्र पाल राष्ट्रीय राजनीति से तो कट गए. फिर भी बंगाली पत्र-पत्रिकाओं में वो लिखते रहे. बिपिन चंद्र पाल को ही भारत में क्रांतिकारी विचारों का जनक माना जाता है. साथ ही वो स्वयं भी शुरुआती क्रांतिकारी नेताओं में से एक थे.

उन्हें भारतीय उत्पादों और वस्तुओं पर पूरा विश्वास और गर्व था और इसीलिए उन्होंने भारत से गरीबी और बेरोजगारी मिटाने के लिए विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार पर जोर दिया था. चूंकि बिपिन चंद्र पाल आर या पार की लड़ाई में विश्वास करते थे इसलिए गांधी के सरकार के साथ असहयोग के तरीके में उनका विश्वास नहीं था.

अपने जीवन में उन्होंने एक ही साथ कई तरह की भूमिकाएं मसलन एक नेता, शिक्षक, पत्रकार, वक्ता, लेखक और लाइब्रेरियन की अदा कीं. 'परिदर्शक' (1886, बंगाली साप्ताहिक), 'न्यू इंडिया' (1902, अंग्रेजी साप्ताहिक), 'बंदे मातरम्' (1906, बंगाली साप्ताहिक) और 'स्वराज' उनकी शुरु की हुई कुछ पत्रिकाएं हैं. प्रतापी पत्रकार बिपिन चंद्र पाल ने 22 साल की उम्र में ही 'परिदर्शक' पत्रिका का संपादन शुरू कर दिया था.