अल्लामा का वतन: ‘ढूंढ़ता फिरता हूं ऐ इक़बाल अपने आप को...’

इक़बाल आखिरी वक्त तक चाहते थे कि भारत के भीतर ही मुस्लिम बहुल प्रांत एक उप-राष्ट्रीयता बनकर रहें जैसे कि भाषा के आधार पर बने भारत के अन्य सूबे आज रहते हैं

Chandan Srivastawa

‘ढूंढ़ता फिरता हूं ऐ इक़बाल अपने आप को/ आप ही गोया मुसाफिर, आप ही मंजिल हूं मैं- ’अल्लामा इक़बाल का यह शेर तो मंजिल और मुसाफिर को एक ही में मिला देने की बात कहता है, इसमें मोहब्बत की बात कत्तई नहीं है. मोहब्बत के बारे में तो कहा जाता है कि ‘ना मंजिल है, ना मंजिल का पता है/ मोहब्बत रास्ता ही रास्ता है...

तो फिर क्या है इस शेर में ? कोई बताये कि अल्लामा का सफर क्या, इक़बाल की मंजिल कहां ?


इक़बाल, दो मुल्क और दरम्यानी जगह

क्या इक़बाल इस्लाम के मुसाफिर हैं और उनकी मंजिल पाकिस्तान है? ना, हरगिज नहीं. वो अविभाजित हिंदुस्तान के सियालकोट में पैदा हुए (9 नवंबर, 1877) और उनकी कब्र को मिट्टी ( 21 अप्रैल, 1938) भी अविभाजित भारत के लाहौर में नसीब हुई. उनकी देह को सुपुर्द-ए-खाक किए जाने तक ना तो पाकिस्तान बना था ना ही उसका अंतिम प्रस्ताव ही मुस्लिम लीग के जलसे में मंजूर हुआ था. इक़बाल की कहानी कहते हुए कोई-कोई यह भी याद दिलाता है कि उनके पुरखे कश्मीरी पंडित थे, अल्लामा अपने पूर्वजों पर नाज करने वालों में थे.

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तो फिर ऐसा क्यों है कि पाकिस्तान में उन्हें मुफ्फकिर-ए-पाकिस्तान (पाकिस्तान का विचार का जन्मदाता), मुसव्विर-ए-पाकिस्तान (पाकिस्तान का चितेरा) और हकीम-उल-उम्मत (उम्मा यानी मुस्लिम जगत का संत) कहा जाता है, उनके नाम पर ‘इक़बाल डे’ मनाया जाता है? पाकिस्तानी अवाम की नुमाइंदगी करने वाली हुकूमत के दस्तावेजों में यह क्यों लिखा मिलता है कि पाकिस्तान का बुनियादी विचार इक़बाल की देन है? वो पाकिस्तान के कौमी शायर क्यों कहलाते हैं?

और जो, इक़बाल पाकिस्तान के विचार के जन्मदाता हैं तो फिर हिंदुस्तान की फौज सारे ‘जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा’ की धुन क्यों बजाती है? देश के विश्वविद्यालयों में बतौर शायर और चिंतक उन्हें यों क्यों पढ़ा-पढ़ाया जाता है मानो इक़बाल ना होते तो हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहजीब के ताज में ‘कोहिनूर’ कम पड़ जाता? क्या वजह है जो उनकी शायरी देवनागरी लिपि में छपकर आ जाए तो खरीदारों के हाथों के आगे वह किताब तादाद में कम पड़ जाती है?

आखिर वो कौन सी बात है जो हमेशा से एक-दूसरे को फूटी आंख से भी ना सुहाने वाले दो मुल्कों के अवाम के दिल में इक़बाल के लिए कमोबेश एक-सी मोहब्बत बनी चली आई है? क्या इक़बाल भारत और पाकिस्तान नाम के दो मुल्कों की सरहद के बीचों-बीच पड़ने वाली एक दरम्यानी जगह का नाम है?

तक़रीर की लज़्ज़त: गोया ये भी मेरे दिल में है

इक़बाल को लेकर सवाल बहुत हैं लेकिन मुकम्मल जवाब एक का भी नहीं. और इसकी वजह है इक़बाल की शायरी का मिजाज- वह एक के नहीं, हरेक के दिल के दरवाजे खटखटाती है.

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पुराने वक्तों में शायरी को इंसान के दिल का आईना कहा जाता था, जिस भावना से देखोगे सूरत कुछ वैसी ही नजर आएगी, गोया कविता ना हुई भगवान हो गई! कुछ वैसा ही आईना है अल्लामा की शायरी भी. तुलसीदास ने कहा तो भगवान राम के बारे में था कि ‘जाकी रही भावना जैसी- प्रभु मूरत देखि तिन तैसी’ लेकिन इस बात का क्या कीजिएगा कि महान कविता भी बहुत कुछ भगवान की ही तरह होती है. वह हरेक को अपने दिल की आवाज लगती है. गालिब ने लिखा है ना कि-

देखना तकरीर की लज्जत कि जो उस ने कहा,

मैं ने ये जाना कि गोया ये भी मेरे दिल में है

बड़े हद तक इक़बाल भी शायरी के ऐसे ही आईने का नाम है, उसमें सबको अपने दिल की आवाज की शक्ल दिखाई देती है. और, खुद इक़बाल को अपनी शायरी के इस पैगंबराना मिजाज का अहसास था, तभी तो उनको लेकर हिंदुस्तान के विश्वविद्यालयों में उर्दू जुबान और अदब के शिक्षक दबी जुबान में बताया करते हैं कि अल्लामा ने एक शेर ऐसा भी कहा जो बहुतों को कुफ्र के काबिल (धर्मद्रोह) लगेगा. वो शेर कुछ यों सुना-सुनाया जाता है-

माना कि मैं नबी हूं अशआर के खुदा का/कुरआन बनके उतरी मुझपर दीवान-ए-हाली.

(हिंदुस्तान में 19वीं सदी के नव-जागरण के अग्रदूतों में गिने जाने वाले ख्वाजा अल्ताफ हुसैन हाली से अल्लामा इकबाल के रिश्ते को परखना हो तो नीचे लिखे चार मिसरे पढ़िए. चारो हुब्बे-वतनी (देशभक्ति) पर हैं, दो मिसरे हाली के हैं और दो इकबाल के.

हाली कहते हैं-

तेरी एक मुश्ते खाक के बदले लूं न हरगिज अगर बहिश्त मिले!

जान जब तक न हो बदन से जुदा कोई दुश्मन न हो वतन से जुदा!!

और इक़बाल का ख्याल है-

पत्थर की मूरतों में समझा है तू खुदा है,

खाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है

इक़बाल की शायरी हरेक को अपने दिल की आवाज जैसी लगती है, यही उनकी शायरी की महानता भी है. शायरी में सांप्रदायिक सौहार्द का पैगाम सुनने वाले आपको बताएंगे कि इक़बाल ने तो अपने जाविदनामा में भतृहरि और महात्मा बुद्ध पर भी लिखा है, उन्होंने तो भगवान राम को ‘हिंद का इमाम’ तक कहा है:

है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज,

अहले नजर उसको समझते हैं इमामे हिंद

जो इक़बाल की शायरी में हिंदुस्तान के लिए मोहब्बत देखना चाहते हैं उन्हें ‘तराना-ए-हिन्दी’ का ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां’ याद आएगा. इनसे अलग जो इस्लाम को तमाम तरह की विभिन्नताओं के साथ मेल बैठाने वाली सभ्यता के रुप में देखना चाहते हैं वो ‘तराना-ए-मिल्लत’ गुनगुनाएंगे कि- ‘चीनो अरब हमारा हिन्दुस्तां हमारा/ मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहां हमारा.’ और, जो अपने मजहब के आगे किसी चीज को तरजीह नहीं देते, यहां तक कि वतनपरस्ती को भी मूर्ति पूजा (इस्लाम के मुताबिक कुफ्र) का ही एक सुथरा हुआ रुप मानते हैं उनके लबों पर ‘जवाब-ए-शिकवा’ की यह पंक्ति मानो अल्लाह की आवाज बनकर नुमायां होगी:

की मोहम्मद से वफा तूने तो हम तेरे हैं,

ये जहां चीज है क्या लौह-ओ-कलम तेरे हैं

जिन्हें लगता है अपनी आजाद-ख्याली में इंसान फरिश्तों से बढ़कर है और आसमानी बातें अपनी जगह चाहे ठीक हों लेकिन सामने नजर आती दुनिया में जौहर दिखाने का नाम ही इंसान है, सो कुछ निहायत निजी बातों को छोड़कर आसमानी किताबों के कहे पर अमल जरुरी नहीं वो आपको अल्लामा का यह शेर सुना सकते हैं:

बाग-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफर दिया था क्यों,

अब कार-ए-जहां दराज है मेरा इंतिजार कर

और जो इस विचार से सहमत नहीं हैं वे इक़बाल के एक शेर के सहारे ही आपको टोक सकते हैं कि-

जो मैं सर-ब-सज्दा हुआ कभी तो जमीं से आने लगी सदा,

तिरा दिल तो है सनम-आश्ना तुझे क्या मिलेगा नमाज में

जो हर तरह की बराबरी के पैरोकार हैं उन्हें अपने दिल की आवाज इक़बाल के इन पंक्तियों में सुनाई देगी-

आ गया ऐन लड़ाई में अगर वक्त-ए-नमाज

किब्ला रू हो के जमीं बोस हुई कौम-ए-हिजाज

एक ही सफ में खड़े हो गए महमूद -ओ- अयाज

न कोई बंदा रहा, और न कोई बंदा नवाज

लेकिन बराबरी के लिए क्रांति की पैरोकारी वाले कहेंगे कि हमें तो साहब इक़बाल के इस शेर में अपने दिल की धड़कन सुनाई देती है-

उट्ठो मेरी दुनिया के गरीबों को जगा दो

काख-ए-उमरा के दरो-दीवार हिला दो

जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोजी

उस खेत के हर खोशा-ए-गंदुम को जला दो

(काख-ए-उमरा मतलब अमीरों के महल, दहकां का मायने किसान और खोशा-ए-गंदुम अनाज की बाली)

शायर को राजनेता से अलग कीजिए

बेशक, इक़बाल की शायरी में ज्यादातर लोगों को अपने किसी ना किसी अहसास की गूंज सुनाई देती है लेकिन यही बात उनकी राजनीति के बारे में नहीं कही जा सकती. कोई और शै है इकबाल के दिल में बैठा शायर और उनके दिमाग के सतरों में समाया इस्लामी चिंतक एक अलग ही शै है. गड़बड़ी दोनों को एक में मिलाने की वजह से होती है.

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इक़बाल ने जहां अपनी शायरी को अपने सियासी ख्यालों का परचम बनाया उस हद तक सबके जज्बातों का नुमाइंदगी का उसका दावा भी कमजोर होता है. ‘शिकवा’ और ‘जवाबे शिकवा’ को हिंदुस्तान का सेक्युलर राष्ट्रवादी बनकर पढ़ने पर उसकी पंक्तियों से गहरा जुड़ाव नामुमकिन है. ‘तराना-ए-हिंदी’ से पाकिस्तान का कोई राष्ट्रवादी क्योंकर मोहब्बत करेगा और ‘तरान-ए-मिल्लत’ से किसी हिंदुस्तान के किसी वतन परस्त को क्योंकर यारी होगी?

इकबाल का राजनीतिक चिंतन उनके धार्मिक-चिंतन से प्रेरित है और धर्म की उनकी धारणा इस एक सवाल से जूझती है कि आखिर, असली इस्लाम क्या है, यह इस्लाम दरअसल ठीक-ठीक कहता क्या है.

इकबाल के ऐसा सोचने की वजह है अंग्रेजी हुकूमत. गुलाम हिंदुस्तान में 19वीं सदी के आखिर के दशकों में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के सबसे चिंतनशील लोगों के सामने एक बड़ी चुनौती अपने-अपने धर्म की व्याख्या इस तरह करने की थी कि वह धर्म से अलग सेक्युलर कानूनों पर आधारित अंग्रेजी राज के मुकाबिल जान पड़े, धर्म का तत्व मौजूद रहे साथ ही लोकतांत्रिक मिजाज का समाज (व्यक्ति, उसके हक, बराबरी और आजादी) बनाने की राह भी सूझे. अंग्रेजी-राज ने अपने बाहुबल और ज्ञान-बल से साबित कर दिया था कि हिंदू या इस्लाम धर्म में व्यक्ति, उसकी आजादी और लिंग, जाति, धर्म आदि के बंधनों से ऊपर उठकर हर व्यक्ति को बराबर मानकर व्यवस्था कायम करने की सलाहियत नहीं है.

मदरसे में कुरआन की पढ़ाई से जिंदगी की शुरुआत करके बाद को बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड और बाद को फिलॉस्फी में डाक्टरेट के लिए जर्मनी पहुंचे इक़बाल के सामने भी अपने धर्म को नए सिरे से परिभाषित करने की चुनौती थी. उन्हें बताना था कि आजादी, बराबरी और भाईचारे के मूल्य को मुस्लिम बिरादरी बिना सेक्युलर हुए साध सकती है क्योंकि इस्लाम की शिक्षाएं इन मूल्यों के अनुकूल हैं. धार्मिक पहचान कायम रखनी थी और मुश्किल यह कि अपने को सार्वजनिक जीवन (राजकाज) में लोकतांत्रिक भी साबित करना था जो सेक्युलर हुए बिना संभव नहीं.

इस चुनौती के मद्देनजर इक़बाल ने इस्लाम की व्याख्या की और 1920 के दशक के आखिर में इस विश्वास तक पहुंचे कि हिंदुस्तान में असली इस्लाम, उसका जोश-ओ-जज्बा और उसूलों पर अमल की सलाहियत अगर कहीं बची है तो बंगाल और पश्चिमोत्तर प्रांत के मुसलमानों में.

इस लंबी कथा को एकदम थोड़े में एक चिट्ठी के सहारे कहा जा सकता है. इक़बाल मोहम्मद अली जिन्ना को ऐसा 'इकलौता मुसलमान' मानते थे जिसकी तरफ संकट की घड़ी में मुस्लिम कौम अपना रहबर मानकर दिशा-निर्देश के लिए देख सकती थी. उन्होंने 21 जून, 1937 को जिन्ना को चिट्ठी लिखी और कहा: 'मुस्लिम (बहुल) प्रांतों का एक अलग फेडरेशन का निर्माण ही वह एकमात्र रास्ता है जिसपर चलकर एक सुरक्षित भारत का निर्माण हो सकता है और मुसलमानों को गैर-मुसलमानों के दबदबे से बचाया जा सकता है. आखिर पश्चिमोत्तर भारत और बंगाल के मुसलमानों को एक कौन (नेशन) क्यों ना माना जाए, उसे भी आत्मनिर्णय का वैसा ही हक क्यों ना हो जैसा कि हिंदुस्तान की बाकी कौमों को है.'

मुस्लिम लीग के अध्यक्ष के रुप में दिए गए उनके मशहूर भाषण (1930, इलाहाबाद) में भी कमोवेश यही बात मिलती है. अब यह आप पर है कि ऊपर की चिट्ठी में आए फेडरेशन (परिसंघ), सेल्फ-डिटर्मिनेशन (आत्मनिर्णय) और मुसलमानों के ऊपर गैर-मुसलमानों के दबदबे जैसे शब्दों का आप क्या अर्थ निकालते हैं.

जिन्होंने पाकिस्तान बनाया उन्हें ‘फेडरेशन’ और ‘सेल्फ-डिटर्मिनेशन’ का अर्थ किया- भारत को बांटकर बनाया जाने वाला एक आजाद मुल्क और ‘मुसलमानों को गैर-मुसलमानों के दबदबे से बचाने’ का अर्थ निकाला गया- नए आजाद मुल्क में इस्लामी शासन की स्थापना. जो यह अर्थ नहीं निकालते वो कहते हैं इक़बाल आखिरी वक्त तक चाहते थे कि भारत के भीतर ही मुस्लिम बहुल प्रांत एक उप-राष्ट्रीयता बनकर रहें जैसे कि भाषा के आधार पर बने भारत के अन्य सूबे आज रहते हैं.

आखिर को बात यह कि इक़बाल की राजनीति पाकिस्तान चली गई और इस राजनीति से प्रेरित कुछ कविताएं भी पाकिस्तान के ही मन को भायी, इक़बाल में बाकी जो कुछ है वह बंटवारे के बाद बचे हिंदुस्तान की तरह हर हिंदुस्तानी को अजीज है, और इक़बाल खुद दोनों मुल्कों के बीच दरम्यानी जगह में अपने ख्यालों में गुम कि- ‘आप ही गोया मुसाफिर आप ही मंजिल हूं मैं!'