एक साल बाद दोबारा नोटबंदी के विरोध की वजह गुजरात-हिमाचल चुनाव तो नहीं ?

नोटबंदी की बरसी के अगले दिन 9 नवंबर को हिमाचल प्रदेश में चुनाव है. उसके बाद पूरा फोकस गुजरात की तरफ ही होगा. लेकिन, इससे पहले ही नोटबंदी पर माहौल फिर से गरम है.

Amitesh

नोटबंदी लागू होने की पहली बरसी पर ढोल नगाड़े लेकर सभी मैदान में उतर गए हैं. फिर से वही मुहिम शुरू हो गई है. नोटबंदी पर वही पुराना राग. सरकार इसे कालेधन के खिलाफ सबसे बड़े कदम के तौर पर पेश कर रही है. लेकिन, विपक्षी अभी भी इसे काला दिवस बताने में लगे हैं.

नोटबंदी के एक साल पूरा होने के मौके पर जेहन में एक सवाल बार-बार आ रहा है. आखिर एक साल बीत जाने के बाद भी क्यों इस मुद्दे को इस कदर उछाला जा रहा है? वो भी तब जबकि नोटबंदी पर रेफरेंडम पहले ही हो चुका है. जी हां, रेफरेंडम की बात इसलिए कहनी पड़ रही है, क्योंकि नोटबंदी के तुरंत बाद देश भर में मुहिम चलाने वालों को यूपी में हार का सामना करना पड़ा था.


उस वक्त नोटबंदी के मुद्दे को आधार बनाकर आम लोगों को हो रही परेशानी को भुनाने की कोशिश की गई. राहुल गांधी से लेकर अखिलेश यादव और मायावती तक सबको लगा कि घंटों लाइन में खड़ी जनता जब इस बार लाइन में खड़ी होगी तो मोदी को सबक सिखाकर ही दम लेगी.

जनता लाइन में भी लगी और अपनी मुहर भी लगाई लेकिन, एक सुनामी की तरह बीजेपी को लखनऊ के सिंहासन पर बिठा दिया. इसे नोटबंदी पर मोदी के इम्तिहान में बड़ी जीत के तौर पर देखा गया. क्योंकि सबने नोटबंदी को लेकर अपनी पूरी भड़ास मोदी पर निकाल दी थी.

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अब एक साल पूरा होने के बाद दोबारा नोटबंदी के मुद्दे को विरोधियों की तरफ से उठाने के पीछे का गणित भी कुछ वैसा ही लग रहा है. गुजरात का विधानसभा चुनाव नहीं होता तो शायद इस कदर कांग्रेस समेत सारे विरोधी मोदी को फिर से कठघरे में खड़ा नहीं करते. लेकिन, गुजरात चुनाव के बीच नोटबंदी की सालगिरह के बहाने फिर से मोदी को घेरा जा रहा है. नोटबंदी के बाद जीएसटी ने तो फिर से कांग्रेस को वो एक और हथियार थमा दिया है जिसके बहाने कांग्रेस मोदी का दूसरा इम्तिहान ले रही है.

अगर ऐसा ना होता तो शायद मनमोहन सिंह फिर से इस मुद्दे पर गुजरात की धरती से वार ना करते. उन्होंने संसद में दिए अपने बयान को दोहराते हुए कहा कि यह एक ‘संगठित और कानूनी’ लूट थी. इसके साथ ही उन्होंने जीएसटी को लेकर भी सरकार को आड़े हाथों लिया. उन्होंने कहा कि नोटबंदी के बाद जीएसटी को गलत ढंग से लागू करने से अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई. इसने खासतौर से छोटे व्यापारियों को बड़ा नुकसान पहुंचाया.

गुजरात में व्यापारियों की तादाद काफी ज्यादा है जो अक्सर बीजेपी के साथ रहे हैं. कांग्रेस की कोशिश है कि अब नोटबंदी के बाद जीएसटी के पचड़े से परेशान कारोबारियों को सहानुभूति के दो शब्दों से अपने पाले में लाया जा सके. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यही करने गुजरात पहुंच गए हैं.

कांग्रेस समेत विपक्षी पार्टियां आठ नवंबर को नोटबंदी की बरसी को काला दिवस के तौर पर मना रही हैं. लेकिन, बीजेपी इसे कालाधन विरोधी दिवस के रूप में मना रही है. बीजेपी और सरकार की कोशिश है कालेधन पर लगाम लगाने के लिए सबसे बड़े कारगर कदम के तौर पर नोटबंदी को पेश कर फिर से पहली सालगिरह पर वाहवाही बटोरी जाए.

बीजेपी की तरफ से  प्रधानमंत्री तो लगातार इस मुद्दे पर बोलते ही रहे हैं. अब नोटबंदी की पहली बरसी पर सबके निशाने पर रहे वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कमान संभाल ली है. जेटली की फिर से वही कोशिश है मनमोहन से लेकर राहुल तक सबको जवाब देने के साथ-साथ देश की जनता को नोटबंदी के फायदे समझाने की.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने मनमोहन सिंह के हमले का जवाब दिल्ली में दिया. जेटली ने कहा कि नोटबंदी तो नैतिक रूप से की गई लेकिन, लूट तो वो होती है जो 2 जी , कॉमनवेल्थ और कोल ब्लॉक आबंटन के दौरान हुई. लेकिन, मनमोहन पर निशाना साधते-साधते जेटली का हमला कांग्रेस के परिवार की तरफ हो गया. जेटली ने कहा कि बीजेपी और कांग्रेस का दृष्टिकोण अलग है. कांग्रेस का प्राथमिक उद्देश्य परिवार की सेवा है जबकि बीजेपी का प्राथमिक उद्देश्य राष्ट्र सेवा है.

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नोटबंदी की सालगिरह के अगले दिन 9 नवंबर को हिमाचल प्रदेश में चुनाव है. उसके बाद पूरा फोकस गुजरात की तरफ ही होगा. लेकिन, इससे पहले ही नोटबंदी पर माहौल फिर से गरम है. जीएसटी को लेकर भी सियासत खूब होगी. लेकिन, 18 दिसंबर को गुजरात-हिमाचल के चुनाव नतीजों पर फिर सबकी नजर होगी. क्योंकि इन नतीजों को मोदी के नोटबंदी पर दूसरे और जीएसटी पर पहले इम्तिहान के तौर पर देखा जाएगा. यहां मिली जीत विरोधियों के हाथ से इन मुद्दों को हमेशा के लिए छीन लेगी. वरना, अपने घर से ही मोदी के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं.