किंगमेकर लालू के लिए इतना आसान नहीं है बेटे तेजस्वी को सीएम बनवाना

तेजस्वी यादव का नाम सीएम कैंडिडेट के तौर पर भले ही उछाल दिया गया है लेकिन लालू यादव के सामने परिस्थितियां बीस साल पहले जैसी आसान नहीं हैं

Amitesh

रामचंद्र पूर्वे के आरजेडी के बिहार अध्यक्ष चुने जाने के मौके पर उनकी तरफ से तेजस्वी के नाम को आगे बढ़ाने की कोशिश की गई. लेकिन, इस कोशिश पर आरजेडी के भीतर भी दबी जुबान में ही सही, झटका देने की कोशिश की गई.

बेशक लालू यादव के छोटे पुत्र तेजस्वी यादव ही उनके असली वारिस के तौर पर उभर रहे हैं. उन्हें नीतीश सरकार में पहले उपमुख्यमंत्री बनाया गया और फिर नीतीश के अलग होने के बाद बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भी जिम्मेदारी दे दी गई. लेकिन, ऐसा पहली बार हुआ कि आरजेडी के मंच से किसी जिम्मेदार नेता की तरफ से उनके नाम को बतौर मुख्यमंत्री दावेदार के तौर पर सामने लाया गया.


बिहार आरजेडी अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे ने तेजस्वी यादव को अगले मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर सामने ला दिया. उस वक्त किसी को ज्यादा आश्चर्य भी नहीं रहा होगा, क्योंकि सार्वजनिक तौर पर यह लगने लगा है कि लालू यादव भी अपने छोटे बेटे को ही अपना तख्तो-ताज सौंपना चाहते हैं.

तेजस्वी यादव

लेकिन, पूर्वे के वक्त से पूर्व दिए गए बयान ने पार्टी के भीतर के एक तबके को नाराज कर दिया. लालू यादव के साथ-साथ चलने वाले नेताओं को पूर्वे का बयान रास नहीं आया. उन्हें लगने लगा कि एक बार फिर से उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है. हालांकि यह कोई नई बात नहीं है. वक्त-वक्त पर इन वरिष्ठ नेताओं को इस तरह के हालात का सामना करना पड़ता रहा है जब लालू यादव ने बेपरवाह होकर पार्टी पर परिवार को हावी होने दिया. फिर भी 2020 के विधानसभा चुनाव से काफी पहले ही इस तरह की घोषणा कई नेताओं को नागवार गुजर गई.

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आरजेडी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री अब्दुल बारी सिद्दीकी की तरफ से कहा गया कि मुख्यमंत्री की उम्मीदवारी पर फैसला आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव ही करेंगे. अब्दुल बारी सिद्दीकी ने खुलकर विरोध तो नहीं किया लेकिन, रामचंद्र पूर्वे की बात को काटकर अंतिम फैसला लालू यादव पर छोड़ दिया. इशारों ही इशारों में सिद्दीकी की तरफ से मुख्यमंत्री पद को लेकर वक्त से पहले चर्चा तेजस्वी को तख्तो-ताज दिए जाने के संकेत का स्वागत नहीं किया गया.

यह पूरा ड्रामा आरजेडी के भीतर की इस उलझन को ही दिखाता है जो अभी जारी है. लालू की पार्टी के अलावा परिवार के भीतर भी चल रही खींचतान उनके लिए परेशानी का सबब बन सकती है.

विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता में आने के बाद लालू यादव ने ‘क्षमता’ के आधार पर बड़े बेटे की जगह छोटे बेटे को ही वारिस बनाने की कोशिश की. उस वक्त बड़े बेटे तेजप्रताप यादव को दरकिनाकर छोटे बेटे तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री और फिर विपक्ष का नेता बना दिया. लेकिन, आरजेडी के सूत्रों के मुताबिक, इसको लेकर परिवार में भी असंतोष का ही माहौल है.

तेजप्रताप सत्ता के सिंहासन पर अपना दावा छोड़ने के मूड में नहीं हैं. उधर, लालू की बड़ी बेटी और राज्यसभा सांसद मीसा भारती भी लालू परिवार से राजनीति के मैदान में एक बड़ी किरदार के तौर पर हैं. मीसा भारती भी लालू की विरासत को संभालने को आतुर दिखी हैं. पहले लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन, हार मिली तो राज्यसभा से ही सही संसद में पहुंच गईं. 2020 के पहले लालू को परिवार के भीतर के सत्ता संतुलन को भी बनाना होगा, वरना तेजस्वी को आगे करने की उनकी मंशा धरी की धरी ही रह जाएगी.

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हालांकि, लालू यादव के करीबी सूत्रों का मानना है कि इस बार लालू यादव अपने परिवार से बाहर किसी दूसरे व्यक्ति को आगे करने के मूड में नहीं हैं. यहां तक कि लालू की पसंद तेजस्वी यादव ही हैं जिन्हें वो अगले मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश करना चाहते हैं.

लेकिन, एक संभावना इस बात की भी जताई जा रही है कि लालू यादव आज की तारीख में अपने सबसे बड़े सियासी दुश्मन नीतीश कुमार को हराने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. लालू यादव इस हालात में अपने साथ कुशवाहा समाज के लोगों को जोड़ने की कोशिश भी कर सकते हैं.

सियासी गलियारों में इस बात को लेकर चर्चा काफी लंबे वक्त से चल रही है कि राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष और केंद्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा को अपने पाले में लाकर लालू यादव  उनके चेहरे को आगे कर सकते हैं.

सियासत के जानकार बताते हैं कि अगर लालू यादव कुशवाहा समाज को अपने साथ जोडने के लिए किसी कुशवाहा नेता को बतौर मुख्यमंत्री पद उम्मीदवार आगे करते हैं तो एक नया समीकरण देखने को मिल सकता है.

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वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेल्लारी का कहना है कि ‘अगर नीतीश कुमार के सामने तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री पद के दावेदार होते हैं तो फिर नीतीश को पटखनी देना असंभव है. क्योंकि लालू यादव सिर्फ माई (एम-वाई) समीकरण के सहारे  नीतीश को पटखनी नहीं दे सकते. लेकिन, अगर इसमें पिछड़े तबके के कुशवाहा समाज शामिल कर दिया जाए तो फिर एक बड़ी चुनौती हो सकती है.’

अब सबकुछ निर्भर करेगा लालू यादव की सोच और उनकी रणनीति पर. क्या लालू नीतीश को हटाने के लिए परिवार और पुत्र का मोह त्याग पाएंगे. यह सबसे बड़ा सवाल है. लेकिन, लालू के इतिहास को देखकर नहीं लगता कि वो इतना बडा दिल दिखा पाएंगे. लेकिन, वक्त से पहले तेजस्वी के नाम को आगे बढ़ाकर बिहार आरजेडी अध्यक्ष ने एक नई परिपाटी को जन्म दे दिया है.