हिमाचल प्रदेश चुनाव 2017: क्या वोटरों की चुप्पी के बड़े मायने हैं?

हिमाचल प्रदेश के चुनाव प्रचार के दौरान वोटरों की चुप्पी नतीजे आने पर नेताओं को चौंका भी सकती है

Anant Mittal

हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दों और मतदाताओं की चुप्पी ने उम्मीदवारों और उनके कार्यकर्ताओं के पसीने छुड़ा रखे हैं. 9 नवंबर को होने जा रहे चुनाव की सबसे जटिल पहेली मतदाता की चुप्पी है जिसकी कोख से परिवर्तन की सुनामी का कयास लगाया जा रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्षी नेता राहुल गांधी द्वारा एक-दूसरे की पार्टी व नेतृत्व को कोसने के बावजूद चुनाव आखिरी दौर में उम्मीदवारों के व्यवहार, पार्टियों के वायदों और पार्टी के नेता की छवि पर आकर टिक गया है. इस खूबसूरत पहाड़ी राज्य में बीजेपी ने छप्पर फाड़ बहुमत की भविष्यवाणियों के बावजूद इसीलिए अपने काडरों को घर-घर प्रचार में झोंक रखा है. मतदान के ऐन मौके पर भी आश्चर्य यह है कि भ्रष्टाचार को यहां निर्णायक मुद्दा नहीं माना जा रहा.


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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अपनी जानी-पहचानी शैली में मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को जमानतशुदा राजा बताकर भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने की जीतोड़ कोशिश दांव पर है. दिक्कत यह भी है कि बीजेपी के मुख्यमंत्री चेहरे प्रेमकुमार धूमल और उनके सांसद बेटे अनुराग ठाकुर पर भी स्टेडियम की जमीन के दुरुपयोग में भागीदारी का आरोप है. वीरभद्र सिंह पर तो 2012 में भी आय से अधिक संपत्ति की जांच का यही मामला चल रहा था.

उसके बावजूद हिमाचलियों ने लोकतंत्र में विपक्षी दल के सिर पर सत्ता की टोपी रखने की अपनी परंपरा निभा कर कांग्रेस को राज और उन्हें मुख्यमंत्री पद सौंपा था. जागरूक हिमाचलियों द्वारा इसी परंपरा के निर्वाह के तहत अबकी बीजेपी को जिताने की भविष्यवाणी की जा रही है. बीजेपी द्वारा प्रधानमंत्री मोदी सहित अपने नेताओं द्वारा सभाओं की ‘कारपेट बांबिंग’ करने का असर भी मतदाताओं के मानस पर दिखेगा.

अब 83 साल उम्र के वीरभद्र 2012 में 78 साल के थे. शायद उन्ही से प्रेरणा लेकर मोदी-शाह जोड़ी ने पार्टी के बुजुर्ग नेताओं के प्रति पूर्वग्रह छोड़ कर 73 साल के धूमल को नेतृत्व की टोपी पहनाई है. ठंडा प्रदेश होने के कारण हिमाचल में टोपी पहनने और उससे जुड़े सम्मान की बड़ी भारी मान्यता है.

पहाड़ी राज्य होने के कारण यहां की विधानसभा सीटों का क्षेत्रफल आकार में भले ही ज्यादा हो, मगर मतदाताओं की औसत संख्या यहां 76,000 प्रति सीट ही है. यह संख्या दिल्ली के नगर निगम वार्ड के औसतन एक लाख वोटर से भी कम है. इसी वजह से हिमाचल में उम्मीदवारों और स्थानीय मुद्दों की पूछ अधिक है. लोग एक-दूसरे को पीढ़ियों से जानते हैं.

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इसीलिए वीरभद्र हों, पंडित सुखराम हों, ठाकुर रामलाल हों अथवा प्रेमकुमार धूमल, किसी पर भी भ्रष्टाचार का मुद्दा यहां टिक नहीं पाता. पंडित सुखराम तो टेलीकॉम घोटाले में करोड़ों रूपए नगदी सहित पकड़े जाने के ठीक बाद हुए चुनाव में मंडी जिले में पांच सीट जीतने का रिकॉर्ड बना चुके हैं. उनका यह जलवा 1998 में दिखा था और उनकी पार्टी हिमाचल विकास कांग्रेस से गठबंधन के बूते ही बीजेपी राज्य में दूसरी बार सत्तारूढ़ हुई थी.

यह बात दीगर है कि बीजेपी ने तब चुनाव उनके भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ा था और इस बार तो वह उन्हें गले लगाने के बूते ही दो-तिहाई सीट जीतने की आस लगाए हैं. राज्य की विधानसभा कुल 68 सीट वाली हैं. उसमें बीजेपी को अब तक दो बार स्पष्ट बहुमत मिला और उसने कुल तीन बार सरकार बनाई है.

इसी तरह राज्य के मुख्यमंत्री रहते जंगलों की अवैध कटाई करवा कर ‘लकड़़ी चोर’ का तमगा पाने वाले ठाकुर रामलाल को भी जनता जिताने में गुरेज नहीं कर रही. रामलाल तो आंध्र प्रदेश की पहली गैर कांग्रेसी एनटी रामाराव सरकार को बतौर राज्यपाल अवैध रूप में बर्खास्त करने के दागी भी रहे हैं. निजी वाकफियत की ही वजह से प्रदेश में कम से कम एक-तिहाई सीटों पर वंशवाद हावी है.

इसकी बानगी वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष ब्रजबिहारी बुटैल का चुनाव क्षेत्र पालमपुर है. उन्होंने राजनीति में सक्रिय रहते ही अपनी सीट अपने बेटे आशीष बुटैल को चुनाव लड़ने के लिए थमा दी है. इसी तरह वीरभद्र भी खुद अर्की से खड़े होकर अपने बेटे को अपनी शिमला ग्रामीण सीट से चुनाव लड़ा रहे हैं.

यहां वोटर के लिए देश की अर्थव्यवस्था से ज्यादा जरूरी हैं रोजगार, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल की सुविधा. कांग्रेस का दावा है कि पिछले पांच साल में उसने 60,000 सरकारी नौकरियों में रोजगार दिया है. सरकारी नौकरी प्रदेश में लॉटरी लगने के समान है. हरेक परिवार की हसरत रहती है कि उसके कम से कम एक सदस्य को सरकारी नौकरी मिल जाए.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इसी बहाने गुजरात मॉडल की छीछालेदर भी कर दी. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसा कि उनके गुजरात में तो पिछले पांच साल में 20,000 लोगों को भी सरकारी नौकरी नहीं मिली, जबकि उनकी पार्टी की सरकार ने उसी दौरान वहां से तीन गुना ज्यादा नौकरी हिमाचल में दी हैं. इसके बावजूद चुनाव पूर्व सर्वेक्षण कांग्रेस का सूपड़ा साफ होने और दो-तिहाई सीट पर बीजेपी के जीतने की भविष्यवाणी कर रहे हैं.

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चुनाव के दौरान वीरभद्र और कांग्रेस की मजबूत रणनीति भी दो मामलों में भाजपा पर हावी रही. पहला वीरभद्र की सदारत में चुनाव लड़कर उनका नेतृत्व राज्य में जारी रखने का मतदाता को संदेश देना. दूसरा उन्हीं के कंधों पर प्रचार का बोझ डालना. साल 2014 के आम चुनाव के बाद हुए तमाम विधानसभा चुनावों में यह पहला राज्य है जहां प्रधानमंत्री मोदी को किसी मुख्यमंत्री से लोहा लेना पड़ा है. शायद इसी की खिसियाहट मिटाने के लिए वे कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व पर डर के मारे मैदान छोड़ भागने का आरोप लगा गए.

उनकी इस खीझ की वजह वीरभद्र की सभाओं में भी हो रहा लोगों का जमावड़ा और उनके प्रति ठाकुरों की सहानुभूति है. पूर्व मुख्यमंत्री धूमल पर ठकुरिया दांव लगाने की मजबूरी इसी दबाव में से उभरी है. इसीलिए बीजेपी को मोदी की छवि पर चुनाव जीतने की रणनीति बीच राह बदलनी पड़ी. हालांकि वीरभद्र पर भी कांग्रेस ने उत्तराखंड से सबक लेकर मजबूरी में ही दांव लगाया है.

यदि वे चुनाव हार गए तो कांग्रेसी उनसे पिंड छुड़ाने में कतई गुरेज नहीं करेंगे. उत्तराखंड में अपने बेटों के लिए टिकट की मांग ठुकराए जाने पर यशपाल आर्य और विजय बहुगुणा ने उन्हें कमल छाप थमा विधानसभा में पहुंचा दिया. वहां मुख्यमंत्री हरीश रावत सहित कांग्रेस बुरी तरह चुनाव हार गई.

हिमाचल प्रदेश के इस चुनाव की और भी कई विशेषता हैं. भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राज्य में हालांकि 33 फीसद सीट महिला उम्मीदवारों को सौंपने में निकम्मे साबित हुए हैं फिर भी राज्य की छह सीटों पर महिला मतदाता ही निर्णायक हैं. महिला मतदाताओं की संख्या यूं तो कुल 24.5 लाख है मगर जुब्बल कोटखाई, नादौन, बदसर, सुजानपुर, हमीरपुर और लाहौल स्पिति में महिला मतदाताओं की तादाद पुरुषों से अधिक है. वैसे राज्य के कुल 49,88,367 वोटरों में महिलाओं के मुकाबले पुरुष वोटरों की तादाद बस 75,000 ही अधिक है. यह राज्य में पुरुषों और महिलाओं के लिंगानुपात में लगभग बराबरी होने की भी खुशखबरी है.

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वीरभद्र रिकार्ड सातवीं बार मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में हैं. उन्होंने राज्य में जगह-जगह स्कूल, अस्पताल और तहसील खोल दिए हैं. उन्हें राजधानी शिमला के अलावा मंडी, कुल्लू, नाहन, उना, कांगड़ा और विलासपुर आदि कारोबार बहुल जिलों से नोटबंदी एवं जीएसटी की मार के विरुद्ध समर्थन मिलने की उम्मीद है. उनके लिए यह चुनाव राजनीतिक जीवन-मरण का सवाल है, क्योंकि वे अपने बेटे विक्रमादित्य सिंह को अपनी गद्दी सौंपना चाहते हैं.

दूसरी तरफ 73 साल का उत्तरार्ध जी रहे धूमल के तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के आसार बीजेपी की जीत की भविष्यवाणी से बनते लग रहे हैं. इसके बावजूद मोदी-शाह जोड़ी की 75 साल में पद से रिटायर करने की समय सीमा उनके सिर पर शैतान की तलवार की तरह लटक रही है.