दमघोंटू दिल्ली: आखिर खुलकर सांस लेने का हक़ क्यों नहीं मांगता यह शहर?

सही कहा था इक़बाल ने कि दिल्ली में जिंदा कौम होने का कोई निशां नहीं है

Sandipan Sharma

शायर इक़बाल ने लिखा- निशां यही है जमाने में जिंदा क़ौमों का कि सब्ह-ओ-शाम बदलती हैं इनकी तक़दीरें! तो फिर ऐसा क्या है जो साल पर साल गुजरते जाते हैं लेकिन दिल्ली की किस्मत बदलती हुई नहीं लगती?

पिछले साल लगभग इसी वक्त दिल्ली को धूल-धुएं और धुंध के घातक घने कोहरे ने घेर लिया था. हवा में कैंसरकारी और जहरीले तत्त्व निर्धारित सीमा से कई गुना ज्यादा थीं. बीते एक साल में कुछ भी नहीं बदला या फिर कुछ बदला है तो ये कि हवा में घुले जहर की मात्रा अब कहीं ज्यादा बढ़ गई है- इस हद तक कि विशेषज्ञ नागरिकों को शहर खाली करने की हिदायत कर रहे हैं.


बुधवार के दिन दिल्ली में हवा बीजिंग की तुलना में दस गुना ज्यादा जहरीली थी जबकि बीजिंग की हवा खुद ही बहुत ज्यादा जहरीली है. फेफेड़े के काफी अंदर तक पहुंचने वाले पीएम-2.5 नाम के महीन कणों की मात्रा 833 पर पहुंच गई जबकि सेहत के लिहाज से अधिक से अधिक यह मात्रा 50 तक होनी चाहिए.

लेकिन सेहत को पहुंचने वाले नुकसान को लेकर नागरिकों में गुस्सा और चिंता कहां है? क्या दिल्ली के निवासी सचमुच इस बात की फिक्र कर रहे हैं कि उनकी सांसों में घुला जहर कैंसर जैसी बीमारी पैदा कर सकता है? अगर ऐसा है तो फिर साफ-स्वच्छ हवा की मांग को लेकर वे क्या कदम उठा रहे हैं? आखिर यह मांग जीवन जीने के अधिकार से जुड़ी है. क्या कहीं कोई धरना, कैंडिल लाइट मार्च या फिर विरोध-प्रदर्शन नजर आ रहा है? क्या हमें कुछ ऐसा नजर आ रहा जो लगे कि दिल्ली के लोग गैस-चैंबर में रह रहे हैं तो उनके भीतर यह चाहत भी है कि सरकार निजात की कोई राह निकाले?

दिल्ली ने प्रदूषण को अपनी नियति माना

दिल्ली तो यों चुप है जैसे उसने मान लिया हो कि यही उसकी नियति है और यह चुप्पी इस तकलीफदेह आरोप को सच साबित करती है कि दिल्ली अपने अधिकारों के लिए उठ खड़ा नहीं हो सकती. ऐसा लगता है दिल्ली शहर नहीं बल्कि अपनेआप पर से अख्तियार खो चुकी मशीनों का शहर है जिसे अपने गिरेबां में एक बार भी झांककर देखने की फुर्सत नहीं कि उसकी नियति क्या है. कभी इस दिल्ली के बारे में कहा जाता था कि यह दिल वालों की है लेकिन आज हालात एकदम ही उलट गए हैं. दिल्ली में अब तो वो दम और दिल बाकी ही नहीं कि खुद अपने वजूद के लिए लड़े. इसका खून पानी बन चला है.

कहां है वो जज्बा जब हमने चलती बस में बलात्कार की शिकार हुई ज्योति सिंह को लेकर दिल्ली को एकदम जागता हुआ देखा था? अन्ना को जेल भेजा गया और दिल्ली एकदम से उबल पड़ी थी. आज वो गुस्सा कहां है? कहां हैं वे लोग जो शहर के हर नुक्कड़-चौबारे से झुंड के झुंड़ निकलकर जंतर मंतर और इंडिया गेट पर आ जमा हुए थे कि ज्योति सिंह के साथ इंसाफ होना चाहिए, इस शहर में महिलाओं के लिए हिफाजती इंतजाम होना चाहिए और भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए एक जनलोकपाल बनाया जाना चाहिए? कहां है वो दिल्ली जो कभी अपने और दूसरों की खातिर लड़ने के लिए उठ खड़ी हुई थी?

आखिर किसी शहर के लोग अपने खुद के वजूद को लेकर इतने ठहरे-ठिठके और बेख्याल कैसे रह सकते हैं ? अपनी जिंदगी को लेकर किसी शहर के लोग ‘चलता है- ऐसे ही चलते रहता है’ जैसा रुख कैसे अपना सकते हैं.? इसकी बस एक ही व्याख्या हो सकती है—शायद दिल्ली के लोगों ने मान लिया है कि धूल-धुएं और धुंध से भरा कोहरा ही अब उनकी नियति है, यह कोहरा उनकी जिंदगी का अटूट हिस्सा बन चला है और चूंकि इससे निजात मुमकिन नहीं सो बस एक ही रास्ता बचता है कि इसे बर्दाश्त किए जाओ. लगता है, बेहतर जिंदगी के अधिकार को दिल्ली के लोगों ने तिलांजलि दे दी है. ऐसा तभी हो सकता है जब असल जिंदगी के सवाल—अपने और अपने परिवार की जिंदगी के सवाल लोगों के लिए अहम ना रह जाएं; जब चीजों के भीतर उतरकर उनकी खूबी-ख़ामी देखने की क्षमता आत्म-परीक्षा के अभाव में कुंद पड़ जाए, जब सियासी जमात के मन-बहलवान जुमलों के जोर के आगे आदमी को लगे कि उसके दुख-दर्द सुन्न पड़ गए, लगे ही ना कि जिंदगी के असल सवालों से भटकाए रखने में सियासी जमात का स्वार्थ छुपा है.

हताशा में एकदम से हथियार डाल देने की ऐसी ही हालत में सियासी जमात अपनी नाकामियों के बाद भी आसन पर जमा रहता है. दिल्ली के लोगों में अपनी जिंदगी के असल सवालों को लेकर अनदेखी का भाव है और इसी कारण दिल्ली की हवा में घुलते जहर की आपराधिक अनदेखी करने वाली सरकारों को क्लीन चिट मिलती रही है. दिल्ली को सरकार और सांसों की हवा चीजों को अनदेखा.करने के उसके मिजाज के माफिक ही हासिल हुई है.

ख़त्म हो चुका है दिल्लीवालों का जज्बा

अगर हेल्थ इमर्जेंसी है तो कायदे से यह वक्त दिल्ली में ‘तहरीर चौक’ (मिस्र) सरीखे जन-आंदोलन का लम्हा साबित होना चाहिए था. लोगों को सड़कों पर निकलकर मांग करना चाहिए था कि उत्तर-भारत के सूबों में पराली जलाना बंद हो, प्रांतीय सरकारें साथ मिल-बैठकर समस्या के स्थायी समाधान के लिए साझा प्रयास करें. शहर को बंद रखने, स्कूलों, दफ्तरों और बाकी सार्वजनिक जगहों पर ताला जड़ने की मांग करने का यह सही वक्त साबित होता. यह एक ऐसा वक्त साबित होता फौरी कार्रवाई की मांग की जाती, कहा जाता कि हमें अभी के अभी राहत चाहिए और आगे के दिनों के लिए कोई दूरंदेशी नीति.

लेकिन दिल्ली में जिंदगी जारी है. लोग जागते हैं और सोते हैं. बीच के वक्त में अपनी नाक और मुंह पर चढ़ी मास्क के पीछे से सर पर मंडरा रहे खतरे को सूनी आंखों से टकटकी बांधकर देखते रहते हैं और जहरीली हवा उनके फेफड़ों के भीतर भरते जाती है, एक ऐसी हवा जो किसी दिन उनको मार डालेगी.

सही कहा था इक़बाल ने. दिल्ली में जिंदा कौम होने का कोई निशां नहीं है. ये तो ऐसी जगह है जहां हर कोई चुप्पी के साथ एक धीमी मौत को गले लगा रहा है.