विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

पितृपक्ष 2017: हिंदू धर्म में पूर्वजों को याद करने का कितना है महत्व?

पितृपक्ष में भटकती हुई आत्माओं की मुक्ति के लिए पिंडदान करने का प्रावधान किया गया है.

Gyan prakash Singh Updated On: Sep 07, 2017 08:52 AM IST

0
पितृपक्ष 2017: हिंदू धर्म में पूर्वजों को याद करने का कितना है महत्व?

पितृपक्ष अपने पूर्वजों को याद करने का एक पर्व है. पितृपक्ष हमें यह याद दिलाता है कि आज हम जहां है उसके पीछे कौन है. अपनी जड़ों की तरफ देखने का और उनसे जुड़ने का उत्सव है पितृपक्ष. हमारी आगे आने वाली पीढ़ियां भी हमें गर्व से याद करें और अपनी परंपरा से जुड़ी रहें, इस सोच का आधार है पितृपक्ष.

हिंदू धर्म की मान्यता है कि चौरासी करोड़ योनियों में जन्म लेने के बाद मनुष्य का जन्म मिलता है और मनुष्य की योनि में ही मोक्ष संभव है. अगर किसी कारणवश मनुष्य की आत्मा तृप्त नहीं हो पाती है जैसे किसी दुर्घटना में मौत हो जाए तो आत्मा भटकती रहती है. पितृपक्ष में ऐसी आत्माओं की मुक्ति के लिए पिंडदान करने का प्रावधान किया गया है.

पितृपक्ष के समय हमारे पूर्वज हमारे आस-पास आते हैं

गरुड़ पुराण के अनुसार मरने के बाद भी हमारे पूर्वज हमारी चिंता करते हैं और वो चाहते हैं कि हम धरती पर सुख से रहें. पितृपक्ष के समय हमारे पूर्वज हमारे आस-पास आते हैं और चाहते हैं कि हम उन्हें याद करें. कहा जाता है कि जिन लोगों की असामयिक मौत हो जाती है उनकी आत्मा भटकती रहती है. जब उनके परिवार का कोई सदस्य पितृपक्ष में पिंडदान कर देता है तो उस आत्मा को शांति मिल जाती है. जो लोग पितृपक्ष में अपने पूर्वजों की याद में पिंडदान करते हैं, गरीबों को भोजन कराते हैं, उनके पूर्वज खुशी-खुशी देवलोक में चले जाते है.

ज्योतिष शास्त्र में अक्सर पितृ दोष की चर्चा की जाती है. ऐसा माना जाता है कि जिनके पूर्वज की आत्मा किसी कारणवश मुक्त नहीं हो पाती है और जो लोग पितृपक्ष में अपने पूर्वजों को पिंडदान नहीं करते हैं उनकी कुंडली में यह दोष देखने को मिलता है. पितृदोष के कारण जीवन में कई समस्याएं देखने को मिल सकती हैं. ऐसे में इस पर्व का महत्व पूर्वजों के साथ हमारे इस जीवन की सफलता से भी जुड़ा हुआ है.

Gaya Brahmin

पूर्वजों को याद कर गरीबों को श्रद्धापूर्वक भोजन करवाएं

देश में गया, हरिद्वार, नासिक आदि जगहों पर पिंडदान किया जाता है. लेकिन आज के भागदौड़ के समय में अगर आप इन जगहों पर नहीं जा सकते तो आप जहां हैं वहीं से अपने पूर्वजों को याद करें और अपने आस-पास के गरीब लोगों को श्रद्धाभाव से भोजन करा दें. अगर पितृपक्ष में अपने पूर्वजों की याद में वृक्ष रोपण करते हैं तो कहा जाता है कि जैसे-जैसे वो वृक्ष हरा-भरा होता जाता है वैसे ही आपकी भी उन्नति होती जाती है.

रामायण में लिखा गया है कि जब श्रीराम को अपने पिता महाराज दशरथ के मरने का समाचार मिला तो उन्होंने गया में फल्गु नदी के किनारे पिंडदान करने का निश्चय किया किया, जिससे कि उनके मृत पिता की आत्मा को शांति मिल सके. भगीरथ ने तो अपने पूर्वजों की आत्मा को शांत करने के लिए गंगा नदी को ही धरती पर ला दिया था.

यह घटनाएं बताती हैं कि प्राचीन काल से ही हम अपने पूर्वजों को कैसा सम्मान दिया करते थे. आज हमारी यह नैतिक जिम्मेदारी है कि हम भी अपने आने वाली पीढ़ियों को ऐसे संस्कार दें कि वो भी हमें गर्व से याद करें.

अक्सर लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि अगर किसी तीर्थ में न जाकर घर पर ही पिंडदान करना हो तो कैसे करें? अगर घर पर ही पिंडदान करना हो तो जिस तिथि को आपके पूर्वज की मृत्यु हुई हो उस तिथि को पितृपक्ष में स्नान कर के सावां के चावल को दूध में पकाकर, कुश का करधनी (कमर में कुश बांध कर) पहनकर दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके अपने पूर्वजों का ध्यान कर उनको प्रणाम करें. साथ ही जो पकवान बनाया हो वो खाने के लिए उनका आह्वान करें.

pitru paksha

पिंडदान से मृतक आत्मा को मोक्ष मिल जाती है

भगवान विष्णु से प्रार्थना करें कि आपके पूर्वजों की आत्मा को शांति प्रदान करें. जीवन में जब भी अवसर मिले एक बार गया में भी पिंडदान करके अपने पूर्वजों की आत्मा को तृप्त कर सकते है. ऐसा करने से मृतक आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है.

आज जब भारतीय समाज संयुक्त परिवार की महत्ता को भूलता जा रहा है, अवसाद में घिरे एकल परिवार तेजी से बढ़ रहे हैं. बुजुर्ग माता-पिता कहां हैं, इससे आज की पीढ़ी को कोई मतलब नहीं. ऐसे में पितृपक्ष का मानव जीवन में काफी महत्व है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi