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छठ पूजा: कांच ही बांस की बहंगिया, बहंगी लचकत जाय...

छठ-पूजा प्रवास के इस करुण इतिहास से जुड़े पारिवारिक विघटन के प्रतिरोध का पर्व है, शहरीकरण के खिलाफ खेतिहर समाज के प्रतिरोध का पर्व

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Oct 26, 2017 06:11 PM IST

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छठ पूजा: कांच ही बांस की बहंगिया, बहंगी लचकत जाय...

हर बात पर कथा, हर चीज की कथा- भारत सदियों से कथा-प्रेमियों देश है. लेकिन हमारा कथा-प्रेम सिर्फ सुनने-सुनाने के आनंद भर के लिए नहीं है. कथा का उद्देश्य इससे अलग भी है.

किसी चीज की कथा बताती है कि उस चीज के होने का क्या औचित्य है. अगर किसी बात पर कथा कही जा रही हो, तो तय जानिए कि उस बात के शुभ-अशुभ, हानि-लाभ का फैसला भी किया जा रहा है.

कथा किसी बात के प्रसार का माध्यम है और उसके उचित-अनुचित का निर्णय का भी. उसमें अपने दुखों का उलाहना हो सकता है, सुखों का इसरार भी. बीते वक्तों का आस-निरास और आने वाले समय की सारी कामनाएं कथाओं में राजा-रानी, शाप-वरदान, निंदा और स्तुति का रूप लेकर छुपी होती हैं. इसलिए कहते हैं कि कथाओं से ही जन-मानस बनता-बदलता और संवरता है. और ठेठ इसी कारण से आप किसी अंचल में प्रचलित कथा को जानकर उस अंचल के मन-मानस के भीतर झांक सकते हैं.

कथा-कहानियों का पर्व है छठ

अगर ऊपर लिखी बात आपको जंच रही हो तो इस दिल्ली दयार में आ बसे हम ‘पूरब के साकिनों’ को कह लेने दीजिए कि छठ-पूजा की भी एक कथा है या यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि छठ-पूजा की एक से ज्यादा कथाएं हैं. और, इन कथाओं को जानकर ही यह अर्थ खुलेगा कि दिल्ली में दिवाली मनाने के लिए ऐन 20 अक्टूबर तक टिका रहने वाला ‘पटना-रांची-भागलपुर-दरंभगा’ का मानुष 21 अक्तूबर की सबेर से ही दिल्ली से मुंह मोड़कर अपने गांव के सीवान तक जाने वाली रेलगाड़ी पर सवार होने को क्योंकर बचैन है?

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आखिर ऐसी क्या बात है छठ में जो ‘पूरब के देस’ ले जाने वाली दिल्ली की रेलगाड़ियों में पांव रखने भर की भी जगह नहीं है, ऐसा क्यों लगता है साल-दर साल बिहार-झारखंड और पूर्वी यूपी से दिल्ली आ बसे लोगों को छठ-पूजा पर घर गए नहीं गए तो अपना ‘होना और जीना’ कहीं से कुछ कम पड़ गया?

कार्तिक शुक्ल षष्ठी को ही क्यों?

छठ कार्तिक शुक्ल षष्ठी को ही क्यों मनाया जाता है, किसी और दिन क्यों नहीं? छठ-पूजा की कई कथाओं में से एक एक कथा का मूल प्रश्न यह है. इस कथा की मानें तो राजा प्रियंवद को कोई संतान ना थी. महर्षि कश्यप की शरण में गए, पुत्रेष्टि यज्ञ हुआ और यज्ञाहुति की खीर राजा ने पत्नी मालिनी को खिलाई. यज्ञ के पुण्य-प्रभाव से पुत्र तो हुआ लेकिन मृत.

अंत्येष्टि को श्मशान घाट पहुंचे राजा प्रियंवद पुत्र-वियोग में प्राण त्यागने को तत्पर हुए. दैव से यह दुख देखा ना गया. करुणा के वशीभूत एक देवी देवसेना प्रकट हुईं, कहा, ‘सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं. राजन! तुम मेरा पूजन करो, बाकी लोगों को भी प्रेरित करो.’ राजा ने इस देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें संतान की प्राप्ति हुई. कथा के मुताबिक यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी, सो अब तक चलन जारी है.

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दूसरी कथा है कि कृष्ण के वंशज शाम्ब को ऋषि दुर्वासा के श्राप से कुष्ठ रोग हो गया था. शापमुक्ति के लिए उन्होंने सूर्य-पूजा की और निरोगी हुए. यही पूजा आज लोकधर्म में छठ-पर्व के रुप में विख्यात है.

एक और कथा है कि लंका विजय के बाद राम की अयोध्या वापसी के दिन दिवाली हुई और इसके छह दिन बाद यानी कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन राम-राज्य की स्थापना हुई. राम और सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की. सप्तमी को विधिपूर्वक पारण कर भगवान सूर्य का आशीर्वाद लिया, तब से रामराज की स्थापना का यह दिवस छठपूजा के रुप में प्रचलित है.

यह रामराज्य क्या है? दैहिक, दैविक और भौतिक दुखों का जहां वास नहीं वही रामराज्य है! तुलसीदास की उक्ति है ना कि- ‘दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज काहू ना व्यापा!’ छठपूजा की चाहे जितनी कथा बना लें, हर कथा के केंद्र में होगी कामनाएं- संतान, निरोगी-निर्मल काया, और अन्न-धन-जन से भरपूर जीवन यानी की राम-राज.

लेकिन नहीं, बात इतना भर कहने से नहीं बनती. दैहिक, दैविक, भौतिक त्रिविध ताप (दुखों) की अनुपस्थिति की प्रार्थना के स्वर वाला ‘छठ’ हम पुरबियों के बीच घनघोर पारिवारिकता का भी पर्व है. इस एक मामले में छठ पूरब में मनाए जाने वाले शेष पर्वों से अलग और विशिष्ट है. याद करें, छठ से तुरंत पहले पड़ने वाले पर्व तीज और जीऊतिया (ज्ञानीगण कहेंगे, जीवितपुत्रिका!) या फिर शारदीय नवरात्र को ही.

Hindu devotee holds coconut while standing in waters of Arabian Sea as she worships Sun god Surya during "Chhath Puja" in Mumbai

जीऊतिया जैसा कि नाम से ही जाहिर है, एक मां के विशिष्ट रुप से अपनी संतान की जीवन-कामना के निमित्त की गई प्रार्थना है. तीज ‘सुहाग’ यानी अखंड दांपत्य-भाव (आप्टे के शब्दकोश में ‘सौभाग्य’ शब्द इसी अर्थ में आता है) के निमित्त मनाया जाता है. नवरात्रि यानि जगदंबा को पूजने की नौ रातें अपने मूल रुप में शरीर-घट में सुप्त शक्ति के जागरण (योग की शब्दावली में कहें तो कुंडलिनी-जागरण) की अराधना है. इसका भाव होता है, जग के कल्याण में अपने कल्याण की कल्पना करना. इन पर्वों में परिवार होता तो है लेकिन हाशिए पर ही. वह सहायक होता है, केंद्र में नहीं होता. तीज, जीऊतिया और नवरात्र- तीनों में साधक के तौर पर व्यक्ति ही प्रधान है.

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परिवार के बिना छठ की कल्पना ही नहीं

लेकिन छठ ? छठ की तो कल्पना ही परिवार के बगैर नहीं की जा सकती. जिसे ‘कोसी भरना’ कहते हैं, उसमें लगने वाली ईख की संख्या (पाँच, सात, नौ) कोसी भराई के क्रम में एक से ज्यादा हाथों की उम्मीद रखती है. और, इस उम्मीद में यह शामिल है कि कोसी भराई को उठे हाथ, अपने घर-आँगन के ही हों. ‘कोसी भराई’ की जितनी ईंख उतने ही घर-आंगन के परिवार-जन होने चाहिए.

कोसी भराई के क्रम में रखने जाने वाले दीपों (कहीं बारह, कहीं चौबीस) को अपेक्षा होती है कि उन्हें एक से ज्यादा हाथों से प्रज्जवलित करने वाले हों. घर बेटा-बहू, बेटी-दामाद, भाई-भतीजा, नाती-पोते से भरा रहे- ‘कोसी भराई’ इस कामना को साकार करती है.

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याद करें छठ के घाट पर प्रथम अर्घ्य के लिए ‘दऊरा’ ले जाने का दृश्य. ‘परवैतिन’ (वह जिसने व्रत किया है) के कंठ से उगने वाले गीतों में कौन सी चिन्ता सबसे पहले फूटती है. यही कि ‘दऊरा के ले के जाय’. अगर दऊरा का छठघाट पर प्रथम अर्ध्य के लिए पहुंचना जरूरी है तो फिर उसके साथ लगी यह चिन्ता भी जरूरी है कि ‘दऊरा’ किसके माथे की शोभा बढ़ाता हुआ छठ-घाट तक पहुंचे. दऊरा को छठघाट तक पहुंचाने वाला माथा भी अपने घर का ही होना चाहिए. अर्घ्य के ‘कोलसूप’ जितने ज्यादा होंगे उतना ही अच्छा और कोलसूप जितने ज्यादा होंगे, दऊरा की संख्या उतनी ही ज्यादा बढ़ेगी. मतलब, अपेक्षा यह है कि घर में ज्यादा से ज्यादा दऊरा ढोने वाले माथे हों.

कभी सोचिएगा कि वह जो ‘कांच ही बांस की बहंगिया’ है, वह बहंगी बांस के कच्चे होने के कारण लचकती है या फिर गीत में यह भी अपेक्षा है कि लचकती हुई यह बहंगी घर की संतानों के मजबूत कंधे पर चढ़कर छठ-घाट तक जाए.

छठी मईया की कहानी

अचरज नहीं कि छठपूजा में ‘परवैतिन’ के गीतों में छठी-मईया की कल्पना एक स्त्री के रुप में है. उनका भी एक ससुराल और मायका है (कहीं-कहीं उल्लेख मिलता है कि संध्या और प्रत्यूषा नाम से सूर्य की दो पत्नियां हैं और पहला अर्घ्य इसलिए संध्या के समय पड़ता है जबकि दूसरा अर्घ्य प्रत्यूषा यानि भोर के पहर) और मान्यता है कि छठी मईया अपने ससुराल से ढाई दिन के लिए मायके आती हैं. भरे-पूरे परिवार वाली छठी मईया से परवैतिनें भरा-पूरा पारिवारिक जीवन ही तो मांगती हैं.

छठ के एक गीत में आता है—

कथिन के ऊ जे शहदरवजवा- कथिन लागे ला केवाड़ ए छठी।

सोने के ऊ जे शहदरजवा, रुपनी लागे ला केवाड़ ये छठी।।

नैहर मांगी ला भाई रे भतीजवा, ससुरा सकल परिवार ये छठी।

अपना के मांगीला अवध सिन्होरवा, जनम जनम अहिवात ये छठी।।

सभवा बैठन के बेटा मांगीला, डोलिया चढ़न के पतौह ये छठी।

रुनुकी झुनुकी एक बेटी मांगीला- घोड़वा चढ़न के दामाद ये छठी।।

( शाह दरवाजा कहते हैं महल के सिंहद्वार को. रुपनी शब्द ‘रुप’ के अर्थ में आया है. पुरानी हिन्दी में रुप कहा जाता था चांदी को. पहले चांदी के सिक्के चलते थे और उन्हें रुपया नाम चांदी से बने होने के कारण भी दिया जाता था. ‘अवध-सिन्होरवा’ अखंड सुहाग के अर्थ में आया है. यह गीत एक भरी-पूरी गृहस्थी की कल्पना करता है, ऐसी गृहस्थी जो किसी राज-व्यवस्था से कम नहीं. शाह दरवाजा, सोना-चांदी, अवध(अयोध्या राज) इसी का संकेत करते हैं. गीत के बाकी शब्दों का अर्थ बड़ा जाहिर है.)

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क्या छठ के इस गीत का अर्थ बस इतने में सिकोड़ दिया जाए कि इसमें कोई खास बात नहीं, सहज और निश्चल गंवई कामना भर है इस गीत में. सो, यह गीत ग्रामीण और खेतिहर अर्थव्यवस्था की जरुरतों के अनुकूल है. न, यह पूर्वांचल के इतिहास से दगा करने जैसा होगा. सैकड़ों साल से पूर्वांचल ‘प्रवास’ शब्द से परिभाषित होता आया है.

Chhath Parva Festival

पूरबियों के घर आने की आस है छठ

असम के चाय बगानों से लेकर मॉरीशस के गन्ना-खेतों तक को हम पूरबियों ने अपनी मेहनत से सींचा है. हमारा इतिहास हमारे परिवार के टूटने चले जाने का इतिहास है. हम पुरबियों को पहले रेलगाड़ी कोलकाता और गुवाहाटी ले जाती थी, आज रेलगाड़ी दिल्ली, बंगलुरु और संगरुर ले जाती है. याद कीजिए वह गीत ‘रेलिया बैरन पिया को लेले जाय रे.’

यह बैरन रेल ही तो है कि आज यह दिन देखना पड़ा- बेटे-बहू, बेटी-दामाद सब परदेसी! घर अपनी वीरानी पर पछताता है. छठ-पूजा प्रवास के इस करुण इतिहास से जुड़े पारिवारिक विघटन के प्रतिरोध का पर्व है, शहरीकरण के खिलाफ खेतिहर समाज के प्रतिरोध का पर्व. हर साल छठ-पूजा पर दिल्ली से स्पेशल रेलगाड़ियां खुलती हैं तो इसलिए कि हजार जोड़ी आंखें रास्ते ताक रही होती हैं कि इन रेलगाड़ियों से हमारे बेटे-बहू, नाती-पोते एक बार फिर से अपने घर लौट आएंगे.

कोसी-भराई के गीतों में यह इंतजार होता है, छठघाट पहुंचने वाले दऊरे में यह इंतजार होता है. इस इंतजार के भीतर होती है एक उम्मीद कि डूबते सूरज की तरह एक सांझ परिवार आंख से ओझल हुआ था तो उगते सूरज की तरह एक सुबह फिर इन आंखों के करीब होगा.

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